वह रोते रोते अपनी किस्मत को कोसती जा रही थी

 बचपन में ही खुशी का विवाह उसके मां बाप ने परिवार वालों के दबाव में आकर कर दिया था। लेकिन जब खुशी के गौने का समय आया तो उसने इस विवाह को मानने से इनकार कर दिया।


लेकिन फिर एक बार गांव वालो और परिवार के दबाव में आकर उसे ससुराल जाना ही पड़ा। ससुराल में  खुशी को नौकरों की तरह रखा जाता। घर का सारा काम करने के बाद उसे दो वक्त की रोटी नसीब होती।


    ‌  इस सब की शिकायत जब वह अपने मायके करती , तो सब उसे किस्मत की दुहाई देकर, एक दिन सब ठीक हो जायेगा कह कर बात खत्म कर देते। खुशी दिन रात काम करते-रोते रोते अपनी किस्मत को कोसती रहती।


   एक दिन अचानक खुशी की ननद राधा के साथ उसकी सहेली नीलू जो एक एनजीओ में काम करती थी उससे मिलने ससुराल गई । नीलू ने खुशी को देखते ही सारा माजरा समझ लिया। और खुशी को इस दल-दल से बाहर निकालने की ठानी


 नीलू ने महिला आयोग में शिकायत कर कच्ची उम्र में विवाह और जबरन बंधक बनाकर रखने के आरोप में ससुराल और मायके वालों को सजा दिलाई।


  इस घटना के बाद खुशी बिल्कुल बेसहारा थी तब नीलू उसे अपने साथ शहर ले आई ,और उसकी पढ़ाई पूरी करा कर उसे अपने पैरों पर खड़ा कर दिया 


आज खुशी यही सोचती है, कि मां-बाप जन्म देने के बाद भी उसके अपने न हो सके और नीलू दीदी से कोई रिश्ता न हो कर भी उसकी अपनी है।


श्रद्धा खरे ✍️ स्वरचित 

ललितपुर (उत्तर प्रदेश)


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