लखनऊ के एक कार शो-रूम में संध्या नाम की युवती ऑफिस के कोने में बैठी फाइलों में सिर झुकाए काम कर रही थी। गर्मी की दोपहर थी। ए.सी. की ठंडी हवा और बाहर सड़क पर भागती गाड़ियों के बीच वह पूरी तन्मयता से नंबरों और कागज़ों में उलझी थी। संध्या उस दिन कंपनी के लिए आए नए ऑर्डर — “पंद्रह नई गाड़ियाँ” — के सभी दस्तावेज़ तैयार कर रही थी। जिस मोबाइल कंपनी ने यह ऑर्डर दिया था, उसके बड़े अफसर खुद शोरूम में मौजूद थे। वे गाड़ियों की डिलीवरी और रजिस्ट्रेशन की औपचारिकताओं पर नज़र रख रहे थे। उन अफसरों में से एक थे राकेश सिन्हा , एक अनुभवी और तेज़तर्रार व्यक्ति, जिनकी बातों में आत्मविश्वास झलकता था। उन्होंने संध्या को गौर से देखा — तेज़ गति से काम करते हुए, हर नंबर को दो बार क्रॉस-चेक करते हुए, और फिर भी हर आने-जाने वाले ग्राहक को मुस्कुराकर “गुड आफ्टरनून सर” कहते हुए। राकेश ने पास आकर पूछा — “आपका नाम?” संध्या ने सिर उठाया, हल्के से मुस्कुराई — “संध्या शर्मा, सर।” “बहुत ईमानदारी से काम करती हो लगता है।” “जी, कोशिश करती हूँ कि गलती ना हो,” उसने झिझकते हुए कहा। राकेश ने फाइल हाथ में ली और बोला — “...
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