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नवंबर, 2025 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

संध्या की उड़ान

  लखनऊ के एक कार शो-रूम में संध्या नाम की युवती ऑफिस के कोने में बैठी फाइलों में सिर झुकाए काम कर रही थी। गर्मी की दोपहर थी। ए.सी. की ठंडी हवा और बाहर सड़क पर भागती गाड़ियों के बीच वह पूरी तन्मयता से नंबरों और कागज़ों में उलझी थी। संध्या उस दिन कंपनी के लिए आए नए ऑर्डर — “पंद्रह नई गाड़ियाँ” — के सभी दस्तावेज़ तैयार कर रही थी। जिस मोबाइल कंपनी ने यह ऑर्डर दिया था, उसके बड़े अफसर खुद शोरूम में मौजूद थे। वे गाड़ियों की डिलीवरी और रजिस्ट्रेशन की औपचारिकताओं पर नज़र रख रहे थे। उन अफसरों में से एक थे राकेश सिन्हा , एक अनुभवी और तेज़तर्रार व्यक्ति, जिनकी बातों में आत्मविश्वास झलकता था। उन्होंने संध्या को गौर से देखा — तेज़ गति से काम करते हुए, हर नंबर को दो बार क्रॉस-चेक करते हुए, और फिर भी हर आने-जाने वाले ग्राहक को मुस्कुराकर “गुड आफ्टरनून सर” कहते हुए। राकेश ने पास आकर पूछा — “आपका नाम?” संध्या ने सिर उठाया, हल्के से मुस्कुराई — “संध्या शर्मा, सर।” “बहुत ईमानदारी से काम करती हो लगता है।” “जी, कोशिश करती हूँ कि गलती ना हो,” उसने झिझकते हुए कहा। राकेश ने फाइल हाथ में ली और बोला — “...

तकदीर कर्मों से बनती है

  रमेश का बचपन संघर्ष की धूल में बीता। गाँव के बाहरी हिस्से में मिट्टी और टीन की छत वाले छोटे से घर में वह अपने माता-पिता और तीन छोटे भाई-बहनों के साथ रहता था। पिता खेतों में मजदूरी करते और माँ दूसरों के घरों में बर्तन मांजती थीं। गरीबी इतनी थी कि कई बार शाम की रोटी का भी भरोसा नहीं होता था। पर उन कठिन हालातों में भी रमेश की आँखों में एक चमक थी—कुछ कर दिखाने की, अपनी किस्मत खुद लिखने की। हर सुबह वह फटी बस्ता लेकर गाँव के सरकारी स्कूल जाता, जहाँ टूटी बेंचें और धूलभरी दीवारें उसकी साथी थीं। लेकिन उसकी लगन किसी चीज़ की मोहताज नहीं थी। अध्यापक जब दूसरे बच्चों की कॉपियाँ सरसरी निगाह से देखते, तो रमेश की कॉपी पर कुछ पल ठहर जाते। साफ-सुथरा लेख, मेहनत से हल किए सवाल, और सबसे बढ़कर, आँखों में कुछ सीखने की प्यास। स्कूल से लौटने के बाद वह गाँव के दूधिए की दुकान पर काम करता। शाम को ट्यूशन पढ़ाने जाता ताकि थोड़े बहुत पैसे कमा सके। माँ अक्सर कहतीं, “बेटा, थोड़ा आराम कर लिया कर, तेरे हाथों में छाले पड़ गए हैं।” रमेश मुस्कुरा देता, “अम्मा, अब नहीं रुका तो जिंदगी भर वही छाले रहेंगे।” धीरे-धीरे उसने...

पड़ोसी ही असली रिश्तेदार होते हैं

  राजीव और मीरा नोएडा की एक सोसाइटी में रहते थे — साफ-सुथरी गैलरियाँ, हर फ्लैट में झिलमिलाती रोशनी और हर दरवाज़े पर डिजिटल लॉक। दोनों अपने छोटे से संसार में संतुष्ट थे। रिटायरमेंट के बाद की ज़िंदगी उन्होंने बेहद व्यवस्थित बना ली थी — सुबह की सैर, फिर अख़बार के साथ चाय, दोपहर में मीरा का बागवानी करना, और शाम को छत पर बैठकर ढलते सूरज को देखना। कहने को तो राजीव का भी पूरा परिवार था — दो भाई, एक बहन, और उनका इकलौता बेटा निखिल। पर अब वो सब अपने-अपने संसार में सिमट चुके थे। दोनों भाई नौकरी के सिलसिले में अलग-अलग शहरों में बस गए थे; बहन की शादी जयपुर में हुई थी, और वो वहीं की हो कर रह गई। माँ-बाबूजी कई साल पहले चल बसे थे। निखिल ने इंजीनियरिंग के बाद बेंगलुरु की एक बड़ी कंपनी में जॉब पकड़ी और वहीं का हो गया। कुछ समय बाद शादी हुई, फिर बच्चा हुआ, और अब वो परिवार वहीं सेटल हो चुका था। राजीव और मीरा, डिफेंस कॉलोनी जैसी ही अपनी इस सोसाइटी में, बस एक-दूसरे का सहारा बनकर रह गए थे। उनके सामने वाले फ्लैट में रिटायर्ड एयर फ़ोर्स अधिकारी वर्मा साहब अपनी पत्नी अर्चना और बेटे रोहित के साथ रहते थे। राज...

हम गरीब लोग हैं, पर एक-दूसरे के दुख बाँटकर ही तो जीते हैं

  रेखा रसोई में दोपहर का भोजन बना रही थी। गैस पर दाल पक रही थी और सामने कटी सब्ज़ियाँ रखी थीं। तभी दरवाज़े पर धीमी दस्तक हुई। उसने एप्रन उतारकर दरवाज़ा खोला तो सामने उसकी नौकरानी सरिता खड़ी थी — घबराई हुई, चेहरे पर पसीना और आँखों में झिझक। “क्या हुआ सरिता, तबीयत तो ठीक है?” रेखा ने पूछा। “दीदी… मुझे थोड़े पैसों की बहुत ज़रूरत है,” सरिता बोली, “अगर आप दस हज़ार रुपये उधार दे दो, तो मैं धीरे-धीरे आपके काम से काट दूँगी।” रेखा ने हैरानी से कहा, “लेकिन सरिता, अभी तो सात तारीख ही है, और तुम पिछले महीने के पूरे पैसे ले चुकी हो।” “हाँ दीदी, पर मामला बहुत ज़रूरी है, तभी तो हिम्मत करके आपके पास आई हूँ,” सरिता बोली, उसकी आवाज़ काँप रही थी। रेखा ने थोड़ा सख़्त स्वर में पूछा, “ऐसा क्या हो गया कि महीने के शुरू में ही पैसे की इतनी जरूरत पड़ गई? पिछली बार भी तुमने एडवांस लिया था।” सरिता कुछ पल चुप रही, फिर बोली, “दीदी, मुझे तो नहीं चाहिए पैसे… दरअसल, मेरी बगल में जो किरन रहती है ना, उसे बहुत ज़रूरत है। वही कह रही थी कि अगर मैं कुछ मदद कर सकूँ तो…” रेखा ने बीच में टोका, “मतलब, ये किसी और के लिए माँग...

घर की बातें घर में ही रहें तो बेहतर होता है।

  रवि जैसे ही ऑफिस से लौटा, उसके चेहरे पर ग़ुस्से की लकीरें साफ़ दिख रही थीं। कमरे में घुसते ही उसने ब्रीफ़केस मेज़ पर पटक दिया और ऊँची आवाज़ में बोला — “नेहा! तुमसे कितनी बार कहा है कि मोहल्ले की महिलाओं की उन गपशप बैठकों में मत बैठा करो, लेकिन तुम्हें किसी की बात समझ में ही नहीं आती!” रसोई से धीमी आवाज़ आई — “क्या हुआ रवि? ऐसा क्या हो गया?” रवि ने जवाब नहीं दिया। वह सीधे सोफ़े पर बैठ गया, माथे पर हाथ रखे कुछ सोचता रहा। फिर अचानक बोला — “तुम्हें क्या पता है, आज मिसेज़ त्रिपाठी ने ऑफिस में मुझे किस लहजे में बात की! बोलीं — ‘आपकी पत्नी तो बहुत बातें करती हैं, सबको पता है कि आपकी बहन का पति बेरोज़गार है।’ अब बताओ, उन्हें यह बात पता चली कैसे?” नेहा का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। उसने थरथराते स्वर में कहा — “मैंने तो बस इतना कहा था कि रिया के जीजाजी की नौकरी चली गई है… वो भी इसलिए कि सब हालचाल पूछ रहे थे।” “हालचाल पूछ रहे थे या तुम्हें खुद बोलने का बहाना चाहिए था?” रवि ने तेज़ आवाज़ में कहा। “कितनी बार कहा है, अपने घर की बातें बाहर मत किया करो। पड़ोसियों से रिश्ता नमस्ते तक ठीक है, पर तुम...