समय का पहिया

 “भाभी, एक ख़ुशख़बरी है।”

फोन की दूसरी तरफ से कविता की आवाज़ में वही चिर-परिचित खनक थी, जो कॉलेज के दिनों में हुआ करती थी।

प्रभा ने अपने हाथों में लगा आटा पोंछा और फ़ोन को कान से और सटा लिया। “अरे कविता! कैसी हो? ख़ुशख़बरी? कहीं बंटी का एडमिशन तो नहीं हो गया उस विदेशी यूनिवर्सिटी में, जिसकी तुम बात कर रही थी?” प्रभा ने अंदाज़ा लगाया।

“अरे नहीं भाभी, बंटी अभी बच्चा है। बात उससे जुड़ी है, पर थोड़ी अलग है। दरअसल, बंटी की शादी तय हो गई है!” कविता ने एक सांस में कह दिया।

प्रभा का दिल एक पल के लिए धड़का, फिर संभला। होंठों पर मुस्कान आई, पर माथे पर एक अदृश्य चिंता की लकीर खिंच गई। “अरे वाह! यह तो सच में बहुत बड़ी ख़बर है। बधाई हो कविता! लड़का तो अभी छोटा है, इतनी जल्दी?”

“हाँ भाभी, लड़की वाले बहुत अच्छे हैं और बंटी भी सेटल हो गया है। तो हमने सोचा शुभ काम में देरी क्यों? और सुनिए, आपको और भैया को सबसे पहले आना है। मैं कोई बहाना नहीं सुनूँगी। आखिर बंटी के मामा-मामी हो आप लोग। रस्में तो आपसे ही शुरू होंगी।”

प्रभा ने “हाँ” तो कह दिया, लेकिन फ़ोन रखते ही वह सोफे पर निढाल होकर बैठ गई। कमरे में पुराना पंखा घर-घर की आवाज़ करता हुआ चल रहा था, जो उनकी वर्तमान आर्थिक स्थिति का एक संगीत सा बन गया था।

कविता... उसके पति राकेश की छोटी बहन। एक ज़माना था जब प्रभा और कविता सहेलियों की तरह रहती थीं। लेकिन समय का पहिया ऐसा घूमा कि राकेश का जमा-जमाया कपड़े का व्यापार मंदी की भेंट चढ़ गया और उधर कविता के पति का रियल एस्टेट का बिज़नेस आसमान छूने लगा। धीरे-धीरे, न चाहते हुए भी दोनों परिवारों के बीच एक अदृश्य दीवार खड़ी हो गई थी—‘हैसियत’ की दीवार।

शाम को जब राकेश दुकान से लौटा, तो प्रभा ने उसे चाय देते हुए ख़बर सुनाई।

“बंटी की शादी तय हो गई है।”

राकेश के चेहरे पर वही मिश्रित भाव आए जो प्रभा के चेहरे पर थे। ख़ुशी और विवशता।

“कब की है?” राकेश ने पूछा।

“दो महीने बाद की। कविता कह रही थी कि हमें रस्में निभानी हैं। ‘भात’ भरना है।” प्रभा ने धीरे से कहा।

‘भात’—यह शब्द कमरे की हवा में भारी होकर तैरने लगा। भारतीय शादियों में मामा पक्ष की ओर से दिए जाने वाले उपहारों और नकद राशि को सिर्फ़ शगुन नहीं, बल्कि नाक का सवाल माना जाता है। और जब ननद करोड़पति हो, तो एक साधारण मध्यमवर्गीय भाई की चुनौती पहाड़ जैसी हो जाती है।

राकेश ने चाय का घूँट भरा और खिड़की से बाहर देखने लगा। “चिंता मत करो प्रभा। बंटी मेरा भांजा है। हम अपनी हैसियत के हिसाब से जो बन पड़ेगा, करेंगे। कविता समझदार है, वह हमारी स्थिति जानती है।”

प्रभा चुप रही। वह जानती थी कि कविता समझदार है, लेकिन कविता की ससुराल वाले, उनका समाज और वह तड़क-भड़क... वहाँ ‘भावनाओं’ से ज़्यादा ‘लिफाफों’ का वज़न तौला जाता है।

अगले दो महीने प्रभा और राकेश के लिए किसी तपस्या से कम नहीं थे। प्रभा ने अपनी पुरानी साड़ियाँ निकालीं, उन्हें रफू करवाया और ड्राई क्लीन के लिए भेजा। राकेश ने अपनी दुकान के खर्चों में कटौती की। यहाँ तक कि प्रभा ने अपनी वह सोने की चेन बेचने का मन बना लिया, जो उसकी माँ ने उसे दी थी।

“यह क्यों बेच रही हो?” राकेश ने उसे रोका था।

“बंटी की शादी में खाली हाथ जाएंगे तो आपकी नाक कटेगी। और फिर, यह चेन तो अलमारी में ही पड़ी रहती है। कविता ने हमेशा हमारा मान रखा है, हमें भी उसका सिर नीचा नहीं होने देना चाहिए,” प्रभा ने तर्क दिया था।

चेन बिक गई। पैसे इकट्ठे हो गए।

शादी का दिन आया। उदयपुर का एक आलीशान रिसॉर्ट बुक था। प्रभा और राकेश जब अपनी पुरानी मारुति कार से वहां पहुँचे, तो वहां खड़ी महंगी गाड़ियों की कतार देखकर प्रभा को अपनी साड़ी की चमक फीकी लगने लगी।

गेट पर ही कविता खड़ी थी। हीरो का हार, बनारसी साड़ी और चेहरे पर वही पुरानी चमक। उसने दौड़कर राकेश और प्रभा के पैर छुए।

“भैया! भाभी! मैं कब से आपकी राह देख रही थी। आप लोग आ गए, अब जाकर मेरी जान में जान आई।”

कविता का स्वागत इतना आत्मीय था कि प्रभा की झिझक थोड़ी कम हुई। लेकिन जैसे-जैसे रस्में शुरू हुईं, प्रभा का दिल बैठने लगा। कविता की जेठानियाँ और ननदें चर्चा कर रही थीं कि लड़के के मामा क्या लाए होंगे।

“सुना है भाई की हालत थोड़ी पतली है,” एक महिला फुसफुसा रही थी, जिसे प्रभा ने सुन लिया। उसके हाथ में पकड़ा शगुन का लिफाफा पसीने से भीगने लगा।

‘भात’ की रस्म का समय आया। एक बड़े हॉल में सब इकट्ठा थे। ढोल बज रहे थे। राकेश और प्रभा को मंच पर बुलाया गया। राकेश ने एक थाली में साड़ियाँ, कुछ गहने (जो चेन बेचकर खरीदे गए थे) और नकद राशि रखी थी। यह उनकी जमा-पूंजी का एक बड़ा हिस्सा था, लेकिन इस महफ़िल में यह समुद्र में एक बूंद जैसा लग रहा था।

प्रभा ने कांपते हाथों से थाली आगे बढ़ाई। हॉल में सन्नाटा था। सबकी नज़रें उस थाली पर थीं। प्रभा ने अपनी नज़रें झुका लीं, उसे डर था कि कहीं किसी की आँखों में उपहास न दिख जाए।

तभी कविता ने थाली थामी। उसने थाली को माथे से लगाया और माइक हाथ में ले लिया।

“आज... आज मैं आप सबको कुछ बताना चाहती हूँ,” कविता की आवाज़ गूँजी।

प्रभा का दिल ज़ोर से धड़कने लगा। क्या कविता सफाई देगी? क्या वह कहेगी कि ‘मेरे भाई ने अपनी हैसियत अनुसार दिया है’? प्रभा को लगा कि वह शर्म से गड़ जाएगी।

कविता ने बोलना शुरू किया, “आप सब देख रहे हैं कि मेरे भाई और भाभी ने बंटी के लिए क्या लाया है। सोने की अंगूठी, कपड़े, पैसे...। लेकिन मैं आज आपको वह दिखाना चाहती हूँ जो मेरे भैया-भाभी ने मुझे तब दिया था, जब मेरे पास कुछ नहीं था।”

हॉल में पिन ड्रॉप साइलेंस था। कविता ने अपने गले से वह भारी हीरो का हार उतारा और उसे साइड टेबल पर रख दिया। फिर उसने अपने पर्स से एक पुरानी, थोड़ी घिसी हुई एक छोटी सी चांदी की पायल निकाली।

“यह पायल...” कविता की आवाज़ भर्रा गई। “यह पायल मुझे भाभी ने तब दी थी, जब मेरी शादी हो रही थी। तब भैया का बिज़नेस शुरू ही हुआ था। पापा नहीं थे। भैया ने अपनी पढ़ाई बीच में छोड़कर मेरी शादी की ज़िम्मेदारी उठाई थी। और भाभी... जो उस वक़्त खुद नई-नई ब्याह कर आई थीं, उन्होंने अपने मायके से मिली यह पायल मुझे चुपके से दी थी और कहा था—‘कविता, यह पहनकर जाना, ताकि तुझे लगे कि तेरी माँ का आशीर्वाद तेरे साथ है’।”

प्रभा की आँखों में आँसू आ गए। उसे याद भी नहीं था कि कविता ने यह पायल अभी तक संभाल कर रखी है।

कविता ने आंसू पोंछे और मुस्कुराई, “आज मेरे पास बहुत दौलत है। भगवान की दया से किसी चीज़ की कमी नहीं है। लोग कहते हैं कि ‘भात’ में भाई अपनी बहन का घर भरता है। लेकिन सच तो यह है कि मेरा घर तो मेरे भाई ने बहुत पहले ही भर दिया था—अपने त्याग से, अपने प्रेम से।”

फिर कविता मुड़ी और प्रभा के हाथ थाम लिए। “भाभी, मुझे पता है कि आप लोगों ने यह सब इंतज़ाम कैसे किया होगा। मुझे आपकी दी हुई ये महंगी साड़ियाँ और यह सोना नहीं चाहिए। मुझे मेरी वो चेन वापस चाहिए जो आपने इस दिखावे की दुनिया के लिए बेच दी।”

प्रभा सन्न रह गई। कविता को कैसे पता चला?

कविता ने इशारे से अपने बेटे बंटी को बुलाया। बंटी एक छोटा सा बॉक्स लेकर आया।

“मामी,” बंटी ने कहा, “माँ ने मुझे बताया था कि आपने अपनी चेन बेची है। मैं ज्वेलर के पास गया था। यह रही आपकी चेन।”

राकेश और प्रभा एक-दूसरे को देखने लगे।

कविता ने माइक पर कहा, “रिश्ते लिफाफों के मोहताज नहीं होते। मेरा भाई आज भी मेरे लिए राजा है, क्योंकि उसका दिल राजा जैसा है। यह ‘भात’ तभी पूरा होगा जब भैया यह वादा करें कि वे मुझसे कभी यह नहीं छिपाएंगे कि वे किस हाल में हैं। अमीरी-गरीबी आती-जाती रहती है, पर खून का रिश्ता व्यापार नहीं होता।”

हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा। जो औरतें कानाफूसी कर रही थीं, वे अब श्रद्धा से राकेश और प्रभा को देख रही थीं।

राकेश की आँखों से आंसू बह निकले। उसने कविता को गले लगा लिया। “पगली है तू... पूरी महफ़िल में रुला दिया।”

कविता हँस दी। “भाभी, अब यह सब छोड़ो। मुझे वो वाली रस्म निभानी है जिसमें भाभी ननद को अपने हाथों से मिठाई खिलाती है। और हाँ, ख़बरदार जो अगली बार ‘नाक’ और ‘इज्जत’ की बात की। मेरी इज्जत आपके बैंक बैलेंस में नहीं, आपके आशीर्वाद में है।”

उस रात रिसॉर्ट के उस आलीशान कमरे में प्रभा को नींद नहीं आ रही थी। उसके गले में वही पुरानी चेन थी। उसे महसूस हुआ कि अमीरी सिर्फ़ पैसों से नहीं होती। आज उसने देखा था कि संस्कारों की अमीरी क्या होती है।

उसने राकेश की ओर करवट ली और धीरे से कहा, “सुनते हैं?”

“हम्म?” राकेश ने नींद में जवाब दिया।

“कविता सच में बहुत बड़ी हो गई है। दौलत में नहीं... दिल में।”

राकेश मुस्कुराया और बोला, “वह तेरी ही तो परछाई है। तूने ही उसे बिगाड़ा है इतना प्यार दे-देकर।”

अगली सुबह विदाई के वक़्त कविता ने प्रभा को एक लिफाफा दिया। प्रभा ने लेने से मना कर दिया।

“यह शगुन नहीं है भाभी,” कविता ने गंभीर होकर कहा। “राकेश भैया को बिज़नेस फिर से शुरू करना है न? यह उस बिज़नेस में मेरी पार्टनरशिप है। मैं निवेश कर रही हूँ। मुनाफ़ा आधा-आधा होगा।”

प्रभा ने कविता की आँखों में देखा। वहां दया नहीं थी, अधिकार था। एक बहन का अपने भाई पर अधिकार।

वापस लौटते वक़्त मारुति कार पुरानी ही थी, कपड़े भी वही थे, लेकिन प्रभा और राकेश का मन बहुत हल्का था। रस्मों के बाज़ार में आज रिश्तों की जीत हुई थी। उन्हें समझ आ गया था कि अपना घर अपना ही होता है, चाहे वह महल हो या झोपड़ी, लेकिन उसे जोड़े रखने वाली ईंटें विश्वास और प्रेम की होती हैं, सोने-चाँदी की नहीं।

रास्ते में प्रभा ने गुनगुनाना शुरू किया। राकेश ने हैरान होकर पूछा, “अरे, आज बहुत खुश हो?”

प्रभा ने खिड़की से आती हवा को महसूस करते हुए कहा, “हाँ, क्योंकि मुझे मेरी पुरानी सहेली वापस मिल गई।”

उस दिन के बाद से प्रभा और कविता के बीच फिर वही घंटों फ़ोन पर बातें होने लगीं। दीवार ढह चुकी थी। अब बात ‘लेन-देन’ की नहीं, बल्कि ‘सुख-दुख’ की होती थी। और रही बात उस ‘भात’ की, तो वह पूरे परिवार के लिए एक ऐसा सबक बन गया कि प्यार को कभी भी तराजू में नहीं तौला जा सकता।

जब हम घर लौटे, तो पड़ोसन ने पूछा, “कैसी रही शादी? क्या दिया ननद ने?”

प्रभा ने अपनी चेन को उंगलियों से छूते हुए गर्व से कहा, “उसने मुझे मेरा अभिमान वापस दिया है।”

वह समझ गई कि असली ख़ुशख़बरी शादी की तारीख नहीं थी, बल्कि वह एहसास था कि रिश्तों में आज भी प्राण बाकी हैं।

लेखिका : रमा मिश्रा


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