सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

दिसंबर, 2025 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

अगले चांद के इंतजार में

  अब इस उम्र में मुझसे नहीं सही जाती ये सारी चौचले बाजी !! सजना संवरना... सत्तर साल की उम्र हो गई है पर क्या मैं.. झूठ बोल रही हूं और श्रीमान जी, आज भी मुझे उसी तरह देखना चाहते हैं जैसे, ब्याह कर लाए थे बुजुर्ग हो गए हैं पर.. शर्म भूल रहे हैं... भला बताओ? नाती पोतों के सामने मैं लाल रंग की साड़ी पहनें कैसी नजर आऊंगी? इस उम्र में हाथों में चूड़ियां पहने ... व्रत रखने के बाद.. हे भगवान! और अब तो व्रत भी रखे नहीं जाते, डॉक्टर ने ही मना कर दिया है सुलोचना जी धीरे से बडबडा रही थी तभी पतिदेव के हंसने की आवाज से वो मुस्कुरा कर वापस बीती यादों में खो गई सच ही तो था, फिर भी वो बहू के साथ सुबह सुबह बैठ जाती थी सरगी खाने!! कि उसे अकेला ना लगे! लाल चुनरिया ओढ़ जब वो सरगी खाती, तो अपने बीते दिन याद आ जाते थे और वहां पर्दे की ओट से आज भी मेरे बूढ़े बुजुर्ग पति... जब मुझे झलक भर देखते तो में चश्मा उचका कर आंखों से और उंगली से दोनों से इशारा कर बैठती !! एक समय था जब हम दोनों साथ में बैठकर सरगी खाया करते थे करवा चौथ बीत गया.. लेकिन कई दिन की थकावट दे गया डॉक्टर ने मना किया था पर उनके मना करने के बा...

माँ का कर्ज़

  एक शाम का समय था। कमरे में हल्की सी चाय की खुशबू और बाहर बारिश की बूँदों की टप-टप आवाज़ चल रही थी। अंकित , जो अब एक जवान और जिम्मेदार लड़का बन चुका था, अपने कमरे से नीचे आया। उसकी मां, स्नेहा मैडम , अपने किचन में खड़ी थीं। अंकित की आंखों में हल्की झुंझलाहट थी। उसने गहरी सांस ली और अपनी मां से कहा— “मां, तू हमेशा यही कहती रहती है कि मां का कर्ज़ कभी नहीं उतर सकता। अब मैं तंग आ गया हूं यह सब सुनकर। आज मैं तेरे अगले-पिछले सब कर्ज़ चुका दूंगा। बता, कितना कर्ज़ है तेरा? तुझे क्या चाहिए—रुपया, सोना, चांदी अथवा और कुछ? बता मां, ऐसा क्या दूं जिसे तेरा कर्ज़ उतर जाए?” स्नेहा मैडम ने बेटे की आंखों में गंभीरता देखी। वह मुस्कुराईं, लेकिन उनके चेहरे पर अनुभव और गहराई झलक रही थी। उन्होंने आराम से कहा— “बेटा, रुपये-पैसे, सोने-चांदी से तो मेरा कर्ज़ नहीं उतर सकता। अगर तुझे मेरा कर्ज़ उतारना है तो एक काम कर—आज रात तू मेरे कमरे में मेरे पास सो जा। अगर तू एक रात मेरे पास सो जाएगा तो मैं समझूंगी कि तूने मेरा कर्ज़ उतार दिया।” अंकित थोड़ी देर चौंका। उसे समझ नहीं आया कि मां ऐसा क्यों कह रही हैं। लेक...

क्षति-पूर्ति

  ”देख लेना, गीता तो पहले ही मनमानी कर हमारी नाक कटा चुकी, अब नीता की बारी है। दोनों लड़कियाँ हमें मॅंुह दिखाने लायक नहीं छोडें़गी।“ आखिरी बात कहते-कहते मम्मी का गला भर आया था। हमेशा की तरह पापा मॅुह नीचा किये मम्मी की बात सुनते रहे। जीवन के बाइस बरस उन्होंने मम्मी के आक्षेप सुनते ही काटे हैं। विदेश में पापा ने उनके लिए सारी सुख-सुविधाएँ जुटा दीं, पर मम्मी अपने निर्वासन का रोना ही रोती रहीं। कभी दोनों बेटियों ने मिलकर मम्मी को समझाना चाहा, तो वह बिसूरना शुरू कर देतीं- ”तुम लोग क्या जानो, अकेलापन तो मुझे डसता है। तुम सबकी अपनी-अपनी दुनिया है। रह गयी मैं अकेली, तो तुम्हें मेरे मरने-जीने से क्या?“ ”पर मम्मी, ये अकेलापन तो आपका अपना ही ओढ़ा हंअम है न! यहाँ ढेर सारी आंटी लोग भी तो भारत से आयी थीं, उन्होंने अपने को कितनी अच्छी तरह एडजस्ट कर लिया है। आप भी क्यों नहीं उनकी तरह…“ गीता की बात काट, मम्मी नाराज हो उठती, ”रहने दे और आंटियों की बात। अगर उनकी तरह किटी पार्टियों में जाकर मजे उड़ाती, तो आज तुम दोनों अनाथ की तरह पलतीं।“ ”अच्छा होता, उनकी तरह हम भी खुली हवा में साँस तो ले पाते। क्या कमी...