गुलमोहर विला के लोहे के गेट को खोलते वक्त जो चरमराहट होती थी, उससे कहीं ज्यादा चुभने वाली आवाज़ मिस्टर भार्गव की थी। मोहल्ले के बच्चे उन्हें 'हिटलर' कहते थे और बड़े-बुजुर्ग 'सक्की बुड्ढा'। छह महीने पहले जब विहान इस घर के ऊपरी हिस्से में किराए पर रहने आया था, तो उसे अंदाजा नहीं था कि उसे एक ऐसे मकान मालिक से पाला पड़ने वाला है, जिनके चेहरे पर मुस्कुराहट शायद आखिरी बार तब आई होगी जब देश आज़ाद हुआ होगा।
मिस्टर भार्गव की दिनचर्या घड़ी की सुई से भी ज्यादा पाबंद थी और वे चाहते थे कि दुनिया भी उसी हिसाब से चले। सुबह पांच बजे उठकर अपनी पुरानी एम्बेसडर कार को कपड़े से पोंछना, फिर बगीचे के एक-एक पौधे का निरीक्षण करना जैसे वे सीमा पर तैनात सैनिक हों। अगर किसी पौधे का एक पत्ता भी सूखा दिख जाता, तो माली की शामत आ जाती।
विहान, जो एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर था और जिसकी रातें अक्सर लैपटॉप की स्क्रीन के सामने गुजरती थीं, भार्गव साहब की नजरों में किसी 'आवारा' से कम नहीं था।
"नौकरी करते हो या जुआ खेलते हो? रात के दो बजे तक बत्ती जलती रहती है। बिजली क्या मुफ्त में आती है?" भार्गव साहब अक्सर सुबह-सुबह अपनी बालकनी से नीचे उतरते हुए विहान को टोक देते।
विहान अपनी नींद भरी आँखों को मलता हुआ मन ही मन गालियां देता और बस इतना कह पाता, "अंकल, काम था।"
"काम! हुह! हमारे जमाने में काम दिन में होते थे, रातें सोने के लिए होती थीं। आजकल के नौजवानों ने प्रकृति का नियम ही बदल दिया है," वे छड़ी टेकते हुए आगे बढ़ जाते।
विहान को सबसे ज्यादा बुरा तब लगता जब वह मिस्टर भार्गव को उनकी पत्नी, यानी लता आंटी के साथ पेश आते देखता। लता आंटी बिल्कुल विपरीत थीं—शांत, सौम्य और हमेशा चेहरे पर एक मीठी मुस्कान लिए हुए। वे अक्सर छुपकर विहान के लिए गाजर का हलवा या कड़ी-चावल भिजवा देती थीं।
एक रविवार की सुबह, विहान अपनी बालकनी में बैठा चाय पी रहा था कि नीचे से तेज आवाज़ें आने लगीं। उसने झांककर देखा। भार्गव साहब लता आंटी पर चिल्ला रहे थे।
"तुम्हें हजार बार कहा है कि इन फालतू चीजों में पैसे बर्बाद मत किया करो! यह क्या उठा लाई हो? तुम्हें क्या लगता है, पैसों का पेड़ लगा है आँगन में? जरा सी अक्ल नहीं है तुममें, बुढ़ापा आ गया पर समझ नहीं आई।"
लता आंटी सिर झुकाए चुपचाप सुन रही थीं। उनके हाथ में एक नई शॉल थी। विहान का खून खौल उठा। एक शॉल ही तो थी, उसके लिए इतना हंगामा? वह नीचे जाने ही वाला था कि लता आंटी ने उसे देख लिया और इशारे से रुकने को कहा।
बाद में जब विहान नीचे पानी की मोटर चलाने गया, तो लता आंटी उसे मिल गईं।
"आंटी, आप यह सब सहती क्यों हैं? अंकल का व्यवहार बहुत रूड है। एक शॉल के लिए कोई इतना चिल्लाता है क्या?" विहान ने अपना गुस्सा जाहिर किया।
लता आंटी फीका सा मुस्कुराईं। "बेटा, विहान। जो जैसा दिखता है, जरूरी नहीं वो वैसा ही हो। तुम अभी उन्हें जानते नहीं हो। उनका गुस्सा उनकी जुबान पर है, दिल में नहीं।"
"रहने दीजिए आंटी," विहान ने झुंझलाते हुए कहा। "यह तो टॉक्सिक है। वह आपकी बिल्कुल कद्र नहीं करते।"
विहान ने तय कर लिया था कि वह अगले महीने यह घर खाली कर देगा। ऐसी नकारात्मक ऊर्जा के बीच रहना उसके बस की बात नहीं थी। उसने ब्रोकर से बात भी शुरू कर दी थी।
कुछ दिनों बाद, शहर में भयानक वायरल बुखार फैला। विहान भी उसकी चपेट में आ गया। वह अकेला रहता था, परिवार दूसरे शहर में था। दो दिन तक वह बिस्तर से उठ नहीं पाया। तेज बुखार में तपते हुए उसे याद ही नहीं रहा कि कब पानी की बोतल खाली हो गई और कब खाने का डब्बा बाहर ही रखा रह गया।
तीसरी रात, जब उसकी हालत बहुत खराब थी, उसके दरवाजे पर जोर-जोर से दस्तक हुई। विहान में उठने की हिम्मत नहीं थी। दरवाजा खुला था, क्योंकि उसने सुबह दवाई वाले के लिए उसे खुला छोड़ दिया था और बंद करना भूल गया था।
कमरे की बत्ती जली। सामने मिस्टर भार्गव खड़े थे। हाथ में उनकी वही मशहूर छड़ी थी।
"लड़के! दो दिन से नीचे नहीं उतरे। मोटर कौन चलाएगा? हम प्यासे मरेंगे क्या?" उनकी वही कड़क आवाज़ गूँजी।
विहान ने आँखें खोलने की कोशिश की, पर रोशनी चुभ रही थी। "अंकल... तबियत..." वह इतना ही बोल पाया और फिर से बेहोशी छाने लगी।
अगली बार जब विहान की आँख खुली, तो उसने खुद को अपने बिस्तर पर नहीं, बल्कि नीचे वाले घर के गेस्ट रूम में पाया। उसके सिर पर गीली पट्टी रखी थी। कमरे में हल्की रोशनी थी। उसने सिर घुमाया तो देखा कि मिस्टर भार्गव पास ही कुर्सी पर बैठे अखबार पढ़ रहे थे, लेकिन अखबार उल्टा था। उनकी नज़रें बार-बार विहान पर जा रही थीं।
"होश आ गया नवाबज़ादे को?" भार्गव साहब ने अखबार मेज पर पटका। "पता है कितना बुखार था? 104 डिग्री। मर जाते ऊपर तो पुलिस हमें परेशान करती। इसलिए नीचे ले आए।"
विहान ने उठने की कोशिश की, "अंकल, मैं..."
"चुपचाप लेटे रहो!" भार्गव साहब ने डांटा। "लता! ओ लता! ज़रा इधर आना, यह लड़का उठ गया है।"
लता आंटी दौड़ती हुई आईं, हाथ में खिचड़ी का कटोरा था। "कैसी तबियत है बेटा अब? शुक्र है भगवान का। हम तो डर ही गए थे।"
अगले तीन दिन विहान वहीं रहा। इन तीन दिनों में उसने जो देखा, उसने उसके होश उड़ा दिए।
उसने देखा कि 'खड़ूस' भार्गव साहब, जो 10 रुपए की सब्जी के लिए मोलभाव करते थे, डॉक्टर को फीस देते वक्त एक बार भी नहीं हिचकिचाए और डॉक्टर से कड़े शब्दों में कहा, "दवा बेस्ट होनी चाहिए डॉक्टर, पैसे की चिंता मत करना। लड़का ठीक होना चाहिए।"
लेकिन सबसे बड़ा झटका उसे तब लगा जब उसने लता आंटी और भार्गव साहब की असलियत जानी।
दोपहर का वक्त था। विहान को नींद नहीं आ रही थी। भार्गव साहब और लता आंटी की बातें बगल वाले कमरे से सुनाई दे रही थीं।
"महेश, तुमने अपनी एफ.डी. (Fixed Deposit) तुड़वा दी? विहान के इलाज के लिए?" यह लता आंटी की आवाज़ थी।
"अरे तो क्या करता? उसके मां-बाप यहाँ हैं नहीं। पराया शहर है। कुछ हो जाता तो मैं खुद को माफ़ कर पाता क्या? और धीरे बोलो, उसे सुनाई दे जाएगा तो वह एहसान मानेगा। मुझे किसी का एहसान नहीं चाहिए," भार्गव साहब की फुसफुसाहट में भी उनका अक्खड़पन था।
"लेकिन वह एफ.डी. तो तुमने अपने मोतियाबिंद के ऑपरेशन के लिए रखी थी ना?"
"आंखें तो अभी चल रही हैं, बाद में देख लेंगे। जवान लड़के की जान ज्यादा कीमती है," भार्गव साहब ने बात काट दी। "और सुनो, उसे बताना मत। कह देना सरकारी अस्पताल का डॉक्टर था, सस्ता इलाज हुआ।"
विहान की आँखों से आँसू बह निकले। वह जिसे कंजूस और पत्थर दिल समझता था, वह आदमी अपनी आँखों का ऑपरेशन टालकर एक किराएदार का इलाज करवा रहा था।
शाम को जब भार्गव साहब कमरे में आए, तो विहान ने उन्हें देखा। अब उसे उस झुर्रियों भरे चेहरे में कठोरता नहीं, बल्कि एक पिता की चिंता दिखाई दे रही थी।
"अंकल, वो शॉल..." विहान ने अचानक पूछा। उसे वह पुरानी घटना याद आ गई।
भार्गव साहब चौंक गए। "कौन सी शॉल? बुखार में दिमाग चल गया है क्या?"
"वही, जिस पर आप आंटी को डांट रहे थे।"
भार्गव साहब कुछ पल चुप रहे। फिर कुर्सी खींचकर बैठ गए। उनकी आवाज़ थोड़ी नरम पड़ गई।
"तुम्हें लगता है मैं राक्षस हूँ, है ना? लता को अस्थमा है। उसे ऊनी रेशों से एलर्जी है। डॉक्टर ने सख्त मना किया है कि वह सस्ते ऊनी कपड़े न पहने, वरना अटैक आ सकता है। वह जो शॉल लाई थी, वह बहुत ही घटिया क्वालिटी की थी, जिससे उसे सांस लेने में दिक्कत हो सकती थी। मैं उसे खोना नहीं चाहता, बेटा। इसलिए डांट दिया। प्यार से समझाता हूँ तो वह सुनती नहीं है, 'पैसे बचेंगे' कहकर अपनी सेहत से खिलवाड़ करती है। इसलिए मुझे विलेन बनना पड़ता है।"
विहान स्तब्ध रह गया। उस दिन उसे समझ आया कि भार्गव साहब का गुस्सा उनकी ढाल थी। वे एक ऐसे नारियल की तरह थे जो बाहर से इतना सख्त था कि उसे तोड़ने के लिए हथौड़े की जरूरत पड़े, लेकिन अंदर का पानी उतना ही मीठा और पवित्र था। उनका कंजूस होना मजबूरी थी, क्योंकि वे अपनी पत्नी के भविष्य के लिए एक-एक पैसा जोड़ रहे थे, और उनका चिल्लाना उनका सुरक्षा कवच था, जिससे वे अपनों को गलतियों से बचाना चाहते थे।
लता आंटी ने उस दिन ठीक कहा था—कुछ लोग प्रेम करना जानते हैं, लेकिन जताना नहीं।
विहान पूरी तरह ठीक हो गया। उसने घर बदलने का फैसला रद्द कर दिया। अब सुबह जब भार्गव साहब उसे डांटते थे—"देर तक सोते हो, उठकर कसरत किया करो"—तो विहान को बुरा नहीं लगता था। वह मुस्कुराकर जवाब देता, "जी अंकल, कल से पक्का।"
एक शाम विहान ऑफिस से लौट रहा था। उसने देखा कि भार्गव साहब गेट पर खड़े हैं और किसी फेरीवाले से बहस कर रहे हैं।
"अरे भाई, दस रुपये ज्यादा ले रहा है तू! लूट मचा रखी है क्या?"
विहान पास गया और देखा कि भार्गव साहब एक बहुत ही सुंदर, महंगी और एलर्जी-फ्री पशमीना शॉल खरीद रहे थे।
"अंकल, यह तो बहुत महंगी है," विहान ने धीरे से कहा।
भार्गव साहब ने उसे घूरकर देखा और अपनी मूंछों पर हाथ फेरते हुए बोले, "चुप रह। लता का जन्मदिन आ रहा है। उसे बताना मत कि यह महंगी है। कह देना सेल में मिली थी। वरना वह ओढ़ेगी नहीं।"
फिर वे अपनी जेब से मुड़े-तुड़े नोट निकालकर गिनने लगे। विहान ने देखा कि उनका हाथ थोड़ा कांप रहा था, लेकिन चेहरे पर एक संतोष था।
विहान अपनी हंसी छुपाते हुए अंदर चला गया। उसे अब यकीन हो गया था कि दुनिया में "खड़ूस" लोग नहीं होते, बस कुछ लोग ऐसे होते हैं जिन्होंने अपनी भावनाओं को इतनी गहराई में छुपा रखा होता है कि उन्हें ढूंढने के लिए आपको थोड़ा धैर्य और बहुत सारे विश्वास की जरूरत होती है।
उस रात विहान ने अपनी डायरी में लिखा:
"किरदार को कपड़ों से नहीं, नीयत से परखना चाहिए। कभी-कभी सबसे कड़वी जुबान के पीछे सबसे मीठा दिल धड़कता है। और हाँ, मेरे मकान मालिक हिटलर नहीं, बल्कि एक ऐसे हीरो हैं जो बिना केप के अपनी छोटी सी दुनिया को बचा रहे हैं।"
बाहर भार्गव साहब फिर किसी बात पर माली को डांट रहे थे। विहान ने खिड़की बंद नहीं की, बल्कि मुस्कुराकर उस आवाज़ को सुना, क्योंकि अब उसे उस शोर में संगीत सुनाई देने लगा था।
लेखक : मनोज सिंह
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