सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

जनवरी, 2026 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

गलफुल्लो

  निम्मी बेटा आजा देख थाली लग गई है भूख लगी होगी जिद नहीं करते बेटा जल्दी आ....मां की लगातार आती आवाजों को अनसुनी करती निम्मी अपने कोपभबन से टस से मस नहीं हुई।पहले मुझे नया मोबाइल दिलाओ तभी खाना खाऊंगी गाल फुला कर चिल्ला उठी।अच्छा ठीक है मोबाइल दिला देंगे आज मेरी रानी बिटिया.. अबकी पापा बोल पड़े।नहीं अब्बी चाहिए... निम्मी के गाल और फूल गए। मेरी लाडो मेरी परी के लिए अभी लो मोबाइल चल अब पापा के साथ खाना ले...और तुरंत ही बिटिया रानी हंसती हुई खाने की थाल पर टूट पड़ी। बचपन से गाल फुलाना निम्मी का सबसे असरदार अस्त्र था जो पापा मम्मी को मिनटों में धराशाई कर देता था।सहेलियों के साथ भी किसी भी मनमुटाव पर वह गाल फुला कर बैठ जाती थी सारी सहेलियां तुरंत उसकी बात मान लेती थीं। निम्मी को अपने इस अस्त्र पर इतना भरोसा था जितना .....कृष्ण जी को सुदर्शन चक्र पर था। शादी के समय मम्मी ने समझाया था मेरी गलफूल्लो बिटिया वहां ससुराल में इस तरह बात बात पर गाल ना फुलाना ... जिसे निम्मी के कानों ने सुना तो जरूर लेकिन दिमाग बेअसर ही रहा। ससुराल का पहला दिन सुबह की चाय नहीं मिली निम्मी को।बस गाल फूल गए उसके।...

संघर्ष

  पूरे तीन दिनो बाद फ्लैट का दरवाजा खोला तो देखा, बालकोनी में रखे एक खाली बड़े गमले में कबूतर के दो अंडे रखे हैं। मैंने उन्हें हटाने का पाप नही किया। मैं दिन में एक आध बार बालकोनी में झांक कर देख लेता, जिज्ञासा थी कि अंडो से बच्चे कैसे निकलते है, कैसे लगते हैं। एक दिन देखा कि एक कौवा उन अंडो को अपनी चोंच से तोड़ खाने वाला ही था कि कबूतरी ने आकर उस पर हमला कर दिया। हड़बड़ा कर कौवा हट कर ताक में थोड़ी दूर मुंडेरी पर बैठ गया। कबूतरी ने अपने दोनो पंख फैला कर उन अंडो को ढक लिया। उस दिन वह अपने लिये दाना चुगने भी नही गयी। अब वह दाना चुगने दूर नही जाती थी, आशंकित हो पास ही रहती थी, मैंने बाजरे के दाने उसके लिये बालकोनी में ही डालने प्रारम्भ कर दिये। वह अब निश्चिंत थी, उसके होने वाले बच्चों का उसके होते कोई कुछ नही बिगाड़ सकता। बालेश्वर गुप्ता, नोयडा मौलिक एवम अप्रकाशित।

आत्मसम्मान

  रानू कई दिनों से बहुत परेशान चल रही थी। कारण एक तो घर में काम वाली बाई पिछले 15 दिनों से बीमार होने की वजह से नहीं आ रही थी। घर के सारे काम करके ऑफिस जाना, और ऑफिस में भी जो बॉस थी, वो रोज किसी न किसी बात पर जैसे मानसिक तनाव देती ही थी। रानू और बॉस की काफी अच्छी प्रोफेशनल रिलेशनशिप थी, पर कई दिनों से वो देख रही थी कि बॉस उससे बिना किसी बात के मीटिंग्स में चिढ़ जाती थी। या तो उसके काम को बिना बताए किसी और को दे देना, या पीठ पीछे उसकी बुराई जूनियर्स से करना। ये सब रानू के लिए बेहद परेशान करने वाला था। कभी कुछ काम करके देती तो वो उसमें कमी निकाल ही देती थी। वैसे भी इन दिनों मार्केट डाउन होने से और EMI की वजह से रानू नौकरी छोड़ भी नहीं सकती थी। धीरे-धीरे रानू मानसिक रूप से दबाव महसूस करने लगी। उसने अपने आप पर काम करना शुरू किया । बाहर से एक्सपर्ट की सलाह ली । पर मानो उसकी मैनेजर तो उस से किसी जन्म का बदला निकालने के लिए ही बैठी थी । हद तो तब हुई जब एक मीटिंग में रानू को बुलाकर उसकी काबिलियत पर सवाल उठाए उसकी मैनेजर ने, और बोला कि हमसे हायरिंग में गलती हुई । रानू अंदर तक हिल गई क्योंक...

खिड़की

    यहां पर बीच में एक कमरा बनवा लेते हैं , इससे हमारा घर बिल्कुल सेपरेट हो जाएगा । आए दिन किच-किच , मनमुटाव और फिर जायदाद बंटवारे के बाद निखिल ने कहा , ठीक है निखिल पर उस ओर एक खिड़की जरूर रखना , नित्या ने सुझाव दिए । क्यों भाभी के बिना तुम्हें भी चैन नहीं है क्या ? व्यंगात्मक हंसी हंसते हुए निखिल ने कहा ।अरे वो ताजी हवा भी तो आएगी ना नित्या ने भी तुरंत जवाब दिया ।         जब भी नित्या उस कमरे में जाती निगाहें खिड़की के उस पार चली ही जाती। आखिर वर्षों से साथ रहे जेठ जेठानी जो उस पार रहते थे । बिल्कुल यही हाल उस ओर भी था कभी-कभी देवरानी जेठानी की नजरें मिल भी जाती, होठों पर हल्की सी मुस्कान भी आ जाती पर किसी ने भी बात करने की तत्परता नहीं दिखाई।        आज निखिल के ऑफिस जाने के बाद जैसे ही नित्या ने खिड़की खोली उसे कुछ आवाज सुनाई दी जेठानी जी फोन पर किसी से बात कर रही थी अखिल (निखिल के बड़े भाई) को खून की जरूरत है कहीं से भी इंतजाम हो पाएगा क्या ? नित्या ने तुरंत निखिल को फोन किया निखिल ने फोन नहीं ...

काकी का परिवार

   सुरभि को रात्रि में ही लेबर पेन शुरू हो गये, यूँ तो मां अभी दो दिन पहले ही कह गयी थी कि बेटा संदीप तू चिंता मत करना,मैं दो तीन दिन में ही गावँ में वहां की व्यवस्था करके आ जाऊंगी।माँ थी नही,और सुरभि के पेन शुरू हो गये, संदीप नर्वस सा हो गया।माँ होती तो सब संभाल लेती,वह कैसे करेगा?सोच सोच कर संदीप परेशान था।फिर भी उसने अपनी समझ से कुछ जरूरी चीजें एक बैग में रखी जो अस्पताल में काम आ सकती थी।सुरभि दर्द के मारे चीखने लगी थी।उसकी समझ नही आ रहा था कि वह अपनी कार भी बाहर कैसे निकाले सुरभि को इस बीच कौन संभालेगा?      सुरभि के कराहने की आवाज  सुनकर पड़ौस से कृष्णा काकी दौड़ी आयी,आते ही सारी स्थिति को समझ उन्होंने सुरभि को संभाल लिया।कृष्णा काकी हमारे साथ ही हॉस्पिटल गयी,सारी रात वही रही,डिलीवरी नॉर्मल ही हुई,पर अगले दिन मां के आने तक कृष्णा काकी सुरभि के साथ ही डटी रही।मां के आने के बाद काकी अपने घर गयी।सुरभि के हॉस्पिटल से घर आने के बाद भी कृष्णा काकी सुरभि के हाल चाल पूछने रोज ही घर आती।      संदीप नोट कर रहा था कि कृष्णा काकी क...

बस...बहुत हो गया

  " दीदी...इस बार माफ़ कर दो..आगे से आपको मुझसे कोई शिकायत नहीं होगी।" हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाते हुए मनीष अपनी बड़ी बहन मालती से बोला तो वो बोली," बस...बहुत हो गया...अब तू यहाँ नहीं रह सकता.. तेरी हरकतों से मुझे समझ आ गया कि चिकने घड़े पे पानी नहीं ठहरता।" कहते हुए मालती ने उसका सामान बाँधकर उसे वापस गाँव जाने को कह दिया।       मालती का पति दिल्ली में नौकरी करता था।शादी के बाद कुछ महीने अपने सास-ससुर के पास रहकर वो दिल्ली चली आई और अपनी गृहस्थी को सजाने-सँवारने लगी।दो साल बाद वह एक बेटे मनु की माँ बनी और उसी के पालन-पोषण में वो व्यस्त हो गई।          उसके मायके में माँ और एक छोटा भाई मनीष था जो नौवीं कक्षा में पढ़ता था।उसी समय मालती के पिता की एक हादसे में मृत्यु हो गई। मालती ने कुछ दिन वहाँ रहकर मनीष को समझाया कि देख, पापा तो अब रहे नहीं..माँ की ज़िम्मेदारी तेरे पर ही है, इसलिए मन लगाकर पढ़ाई करना।लेकिन पिता के न रहने पर तो वो बेलगाम हो गया..स्कूल के बहाने इधर-उधर घूमता रहता और अक्सर ही अपनी माँ से झगड़ पड़ता ...

आईना

  ...सुन बहुरिया अपनी सास की इतनी खिदमत ना कर वर्ना दस दिनों में जाने की जगह यहीं ठौर बना लेंगी तो तू कर चुकी अपनी नौकरी ... सहेली सविता की सास ने गरम फुल्के ले जाती नेहा से फुसफुसा कर कहा। आंटी.. आप चिंता ना करिए जैसे मेरी सहेली आपके साथ अपनी नौकरी कर रही है वैसे ही मैं भी कर लूंगी.. मुस्कुराती नेहा ने दरार #बनाने को उत्सुक आंटी के मन की दरारों को आइना दिखा फुल्के अपनी सास की थाली में परोस दिए। लतिका श्रीवास्तव

नारी का पुरुषार्थ

  रवि,क्या मेरी एक बात मान लोगे? बोलो ना,सुमन तुम जो कहोगी मैं करूँगा। देखो मैंने ये प्राइवेट रूप में इंटर करने के लिये फॉर्म मंगवाया है, इसे भर कर भेजना है।सब पुस्तके मैं मंगवा दूंगी, पर पढ़ना तो पड़ेगा।बाद में एग्जाम होंगे।देखना तुम निश्चित रूप से सफल होंगे।फिर मैं हूँ ना।      क्या तुम चाहती हो अब शादी के बाद मैं पढूं,लोग क्या कहेंगे?       रवि,लोग तो अब भी क्या क्या कह रहे है,ताना कसते हैं।हमें उन तानों का जवाब देना है, रवि।         साधारण परिवार में जन्मी सुमन,प्रारम्भ से ही कुशाग्र बुद्धि की थी,पढ़ाई लिखाई में अव्वल तो घर के कामकाज में, माँ का हाथ बटाने में भी अव्वल।सुंदर सलोनी सुमन का दुर्भाग्य था तो बस ये कि उसके पिता के पास देने को दहेज न होने के कारण उसके योग्य कोई वर नही मिल पा रहा था।एम ए कर चुकी सुमन के उसके पिता गिरधारी उसके हाथ पीले करना चाहते थे,पर करे तो कैसे करे,यही सोच उन पर हावी थी।सुमन ने कहा भी पापा क्यो परेशान होते हो,आपने जब मुझे पढ़ाया है तो मैं क्या आप पर बोझ बनूंगी,...

रिश्ता _नहीं _सौदा _था

  लडके के पिता ने पंडित जी को एक लडकी देखने को कहा ! पण्डित जी बोले हाँ एक लडकी है. अभी कुछ दिनों पहले उसके पिता ने भी एक लडका देखने को कहा था.             एक दिन तय हुवा और शादी हो गयी. सब कुछ ठीक चल रहा था कि कुछ महीनो बाद. लडका लडकी मे आये दिन.झगडा होने लगा.             वह लडका रोज नशे में घर आता और पत्नी से मारपीट करता वह उसे शारीरिक और मांसिक रूप से परेशान करता...         वहीं बहू भी न सास देखती न ससुर अपने पति के जाते ही अपने स्कूल के एक मित्र के साथ फ़ोन पर लग जाती और भूल जाती की वह अब किसी की पत्नी किसी की बहू है.         एक दिन उन दोनों के बीच झगडा शुरू हुआ और दोनों एक दूसरे पर आरोप लगाने लगे. गुस्से में आकर लडकी ने आत्महत्या कर ली. लडके को पुलिस ले गयी.         अब दोनों घरो के लोग एक दूसरे को गाली देने लगे खानदान को गरियाने लगे मामला कोर...

बेनाम रिश्ता

  सुबह सुबह जैसे ही  वट्स ऐप खोला तो सबसे पहला मैसेज यही दिखा...  "हर इंसान की ज़िंदगी मे एक इंसान ऐसा जरूर होता है जो किस्मत में नही होता लेकिन दिल और दिमाग मे पूरी ज़िन्दगी रहता है।' और वो मैसेज पढ़ते पढ़ते उस को लगा कि जैसे किसी ने ये मैसेज सिर्फ उसी के लिए ही भेजा है हालांकि ये मैसेज उसने पचास लोगों के ग्रुप में  देखा था। और आंखें बंद करके नीरजा फ़्लैश बैक में चली गयी। क्या दिन थे वो भी जब राजीव उस से पहली बार मिला था। उसकी पहली नज़र ही उसको सम्मोहित कर गयी।उस पहली नज़र में ही दोनो एक दूसरे को अपना दिल दे चुके थे।  लेकिन वक़्त और हालात की आंधी कुछ ऐसी चली कि दोनो के रास्ते जुदा हो गए और दोनो अपनी ज़िंदगी मे एक नए हमसफ़र के साथ आगे बढ़ गए। ईमानदारी से अपने रिश्तों और जिम्मेदारियों को निभाते रहे लेकिन दिल से उस मीठी याद को मिटा नही पाए। एक बार कहीं पर पढ़ा था कि वक्त का पहिया गोल है।इंसान जहां से चलता है एक बार वहां वापिस जरूर आता है और वक्त का पहिया कुछ ऐसा घूमा कि उसने एक बार फिर से दोनो को एक दूजे के सामने ला कर खड़ा कर दिया। और आज ऐसा लगता है कि जैसे पतझड़ के बाद ज़िन्दग...

औकात

  वरुण भाई, आपकी बिटिया के लिए एक बहुत अच्छा संबंध मिला है। अपने ही शहर के रहने वाले हैं। हैं तो मिडिल क्लास लेकिन परिवार बहुत अच्छा है। बहुत अच्छी बात है। बेटी की इस साल शादी करनी ही है। लेकिन नीलेश भाई, लड़का क्या करता है? लड़का अभी अभी नौकरी में लगा है। बस्तर में पोस्टिंग है, लोअर डिविजन क्लर्क है। आप सरकारी नौकरी वाला लड़का ही ढूंढ रहे हैं न। इसलिए मुझे लगा आपको बताऊं। ओह। क्लर्क है लड़का। जी। पिताजी भी सरकारी नौकरी में रहे हैं। अधीक्षक होकर पिछले साल ही रिटायर हुए हैं। ये बड़ा लड़का है छोटा अभी चेन्नई में इंजीनियरिंग पढ़ रहा है। यार नीलेश भाई! क्लर्क है तो अभी पगार भी कम होगी। वहां अकेले रहेंगे तो खर्च कैसे चलेगा? मकान का किराया, घर के खर्चे, अपने खर्चे, बचा क्या पाएंगे? वरुण भाई, एक बात पूछूं, बुरा तो नहीं मानेंगे?

फेवरीट वुमन

  महीने का आखिरी रविवार अर्थात किटी पार्टी का दिन।श्रीमती यादव के यहाँ कम से कम बीस से पच्चीस महिलाएं जमा थीं। तरह तरह का नाश्ता और जूस उपलब्ध था। कई तरह के गेम्स भी खेले जा रहे थे। एक प्रश्न गूँजा, "हू  इज़ योर फेवरीट वुमन? " आशा के विपरीत एक उत्तर आया, "  मेरी मदर इन लॉ " यह आवाज़ थी श्रीमती कौशल की। कुछ ने  ठहाका लगाया वहीं कुछ महिलाओं की आँखें आश्चर्य से दोगुनी बड़ी हो गईं। वे श्रीमती कौशल के इस कथन को पचा नहीं पा रहीं थीं। इस बात श्रीमती कौशल संजीदा हो गईं। हाँ, मेरी सासु माँ मेरी पसंदीदा महिला हैं। ज़ब मेरा बेबी इस दुनिया में आया मेरी माँ बहुत दूरी पर नहीं थीं पर फिर भी कुछ परिस्थितियों के चलते मेरे पास नहीं आ सकी लेकिन मेरी सासु माँ पूरे  समय मेरे साथ रहीं। मेरा दर्द उनका दर्द था। " मेरी माँ ने मुझे एक छोटा पौधा बनाया, सासु माँ ने मुझे विशाल वृक्ष बनाया। माँ ने सुख में जीना सिखाया, सासु माँ ने दुख में भी ख़ुशी से जीना सिखाया।" सन्नाटा छाया रहा तीस सेकंड तक। अचानक तालियाँ बजने लगीं और अगले एक मिनट तक बजती रहीं। थैंक यू फ्रेंड्स! मेरी सासु माँ वह बैंक हैं ...

भाभी

  भाई की शादी से नन्ही आस्था बेहद खुश थी। सभी कह रहे थे कि भाभी के आने से बिन माँ की आस्था को माँ जैसा प्यार मिलेगा और उसके नन्हे कंधे पर से घर के कामों का भी बोझ कम हो जाएगा। माँ की मृत्यु के पश्चात घर के अधिकतर कामों की जिम्मेदारी उस पर ही आ गई थी। 12 साल की उम्र में वह बेहद समझदार एवं जिम्मेदार लड़की बन गई थी। उसकी उम्र के बच्चे खेलकूद में मस्त रहते थे और वह घर के कामों में उलझी रहती थी। उसकी भी इच्छा होती थी कि वह भी उनके साथ खेले, पर वह खेल नहीं पाती थी। सुबह नाश्ता ,खाना बना कर ,अपना और अपने भैया का टिफिन पैक करके,वह स्कूल भागती थी। लेकिन लाख कोशिशों के बावजूद भी वह समय पर स्कूल नहीं पहुँच पाती और रोज उसे अपनी टीचर से डांट मिलती थी । भाई की शादी के बाद सभी कह रहे थे कि अब तो आस्था के मजे ही मजे हैं ।अब उसे खाना नहीं बनाना पड़ेगा ।उसे तो अपना टिफिन भी पैक मिलेगा। अब वह रोज स्कूल समय पर जा पाएगी।  सुबह-सुबह वो आँगन में बैठी यह सब सोच सोच कर मुस्कुरा रही थी। तभी भैया आए और उससे चाय बनाने को कहा। " भाभी कहाँ है?... वह पूछ बैठी । "अभी वह सो रही है।" आस्था जल्दी से दो कप...

दूध का वो एक गिलास

  इन छुट्टियों में जब मैं घर गया हुआ था तो एक दिन सुबह सुबह लॉन में बैठा पेपर पढ़ रहा था,तभी एक  बीस बाईस साल का नवजवान आया और मेरे पैर छूकर खड़ा हो गया। मैंने सिर उठा कर पहचानने की कोशिश की,मुझे एकदम से वो पहचान नहीं आया।"भैया मैं सुनील,माया मेरी मम्मी ,आपके घर काम करती थीं"।      सुनील के इतना कहते ही मुझे सारी बातें याद आ गईं,पापा का कुछ ही दिन पहले लखनऊ से बनारस  ट्रांसफर हुआ था  और हम नए नए ही बनारस पहुंचे थे।मैं 15 साल का था और मेरा नवीं कक्षा में एडमिशन हुआ था।घर का काम करने के लिए जल्दी ही माँ को माया मिल गई थी।माया अपने साथ चार-पाँच साल के सुनील को भी ले आती थी, वो बहुत ही दुबला पतला और बीमार सा दिखता था, बिलकुल चुपचाप रहता और रसोई के दरवाजे के पास जहाँ उसकी माँ बैठा देती बैठा रहता था। मम्मी मुझे रोज़ सुबह नाश्ते के साथ एक गिलास दूध का भी देती थीं, नाश्ता तो मैं कर लेता लेकिन दूध नहीं पीता था। मम्मी को कहता तो डाँट पड़ती इसलिए मैं चुपचाप दूध के गिलास को किचन के सिंक में डाल देता था, ऐसा करते हुए सुनील मुझे एकटक देखता रहता था।यहाँ तक तो ठ...

धमकी

  रजत की आदत थी कि पूजा से जरा सी नोंकझोंक हुई नहीं कि वो घर छोड़ने की धमकी देता था। एक रात वो झगड़ कर कुछ घंटों के लिए घर से चला भी गया था, बस पूजा की हालत खराब हो गई थी। अब वो उसके सामने मुंह खोलने से भी डरती थी कि कहीं वो हमेशा के लिए ही न चला जाए। अगर ऐसा हुआ तो वो अपने छोटे छोटे बच्चों को कैसे पालेगी। यूं ही दस साल बीत गए। दोनों के बीच पति पत्नी का नहीं बल्कि बॉस और एम्प्लॉय का रिश्ता सा बन गया था। पूजा को अपने बच्चों के लिए भी बहुत बुरा लगता था क्योंकि इस माहौल का उनकी परवरिश पर बुरा असर पड़ रहा था। पर एक दिन रजत जब बहुत ज्यादा चीखने चिल्लाने लगा तो पूजा से बर्दाश्त नहीं हुआ, वो भी उसे जवाब देने लगी। रजत ने उसे चुप करने लिए पुराना हथकंडा अपनाया कि ज़्यादा बकवास की तो मैं मैं घर छोड़ कर चला जाऊंगा । हिम्मत करके पूजा बोली, "बहुत हुआ , रानी का महल तो एक दिन गिरना ही है, तुम्हें जहां जाना है जाओ, मैं पढ़ी लिखी महिला हूँ, अपने बच्चों को नौकरी करके पाल लूंगी।" रजत को पूजा से इस जवाब की उम्मीद नहीं थी, वो समझ गया कि अब ये धमकी काम नहीं करेगी। क्योंकि वो अच्छी तरह जानता था कि प...

निर्णय

  "अम्मा का तीसरा महीना पूरा हो गया ,अब इन्हें , बड़े भैया के यहाँ छोड़ आओ।" " क्यों...... अगर यहीं बनीं रहें तो क्या होगा ?" "होगा क्या ..... देख तो रहे हों ,कितनी बेगार लगी रहती है सुबह से । मैं तो बंधुआ सी हो गई हूँ ।" " क्या .... बेगार .. ।   मैं कहीं नहीं जाता छोड़ने । इस उम्र में कहाँ पटक आऊँ उन्हें। शहर है  ,हारी बीमारी में चाक चौबंद सभी व्यवस्थायें तो बन जाती हैं यहाँ । वहाँ गाँव में कितना परेशान होते हैं भैया । " "तय तो यही हुआ था । तीन - तीन महिने दोनों जगह रहेंगी अम्मा ।" "तय भी तुम्हारी बजह से ही हुआ था । तुम नाटक न करतीं तो कुछ नहीं होता । कितनी बदनामी हुई थी  बाद में ,बो भी तो देखो ।" "हमें कुछ नहीं देखना ,पहले आप ये बताओ सोने की चूड़ी कहाँ कर दी अम्मा ने ?  न सोना , न   चाँदी ,न खेती बाड़ी से कुछ मिलना । ये भ्रात भक्ति अपने समझ नहीं आई। " "तुम कुछ समझती क्यों नहीं ,आज हम जो कुछ हैं भाई साहब की बजह से ही हैं । उन्होंने ही मुझे आगे पढ़ाने पिता जी को समझाया था ।,आज उनके लड़के की फीस के लिए अम्मा ने हमसे पूछ...