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अक्टूबर, 2025 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

संकट के बाद सवेरा

  समीरा का जीवन अचानक कठिनाइयों से भर गया था। उसके पति अक्षय की नौकरी छूटने के बाद, घर में जैसे आर्थिक तंगी ने डेरा डाल लिया।  अक्षय हर दिन नई नौकरी की तलाश में निकलता, लेकिन बार-बार खाली हाथ लौटता। समीरा देख रही थी कि अक्षय का हौसला धीरे-धीरे टूट रहा है, लेकिन उसने खुद को मजबूत बनाए रखा।   एक दिन जब अक्षय थका-हारा घर लौटा, तो उसके चेहरे पर निराशा साफ झलक रही थी।  समीरा ने हल्के-से पूछा, “आज कुछ नहीं हुआ?”   अक्षय ने गहरी साँस लेते हुए कहा, “नहीं... लगता है गाढ़े दिन खत्म ही नहीं होंगे। कहीं भी उम्मीद नजर नहीं आ रही।”  समीरा ने उसकी तरफ प्यार से देखा और कहा, “गाढ़े दिन हमेशा नहीं रहते अक्षय। ये समय भी बीत जाएगा। रात कितनी भी लंबी हो, सवेरा तो आता ही है।”  अक्षय ने उसकी तरफ देखा, लेकिन कुछ कह नहीं पाया।  समीरा ने महसूस किया कि अब उसे कुछ करना होगा। उसने अपने पुराने शौक और हुनर के बारे में सोचा।  उसे केक और पेस्ट्री बनाना बहुत पसंद था, और शादी से पहले वह इस कला में अच्छी थी।   अगले दिन उसने अपनी सहेली साक्षी से मिलने का फैसल...

एक बेटी ऐसी भी......

  कामता प्रसाद जी अनमने मन से सुबह की चाय पी रहे थे। तब बहू सुनैना ने उनकी ओर देखा तो उनकी आंखें आंसूओ से डबडबाई हुई थी तब वह बोली- पापा क्या हुआ ,आप इतना क्यों दुखी हो ?तब वो बोले- जिस बिटिया को इतना बड़ा किया,उसे सर आंखों बिठाया वो ही अपनी न रही। तब वो पापा से बोली- हां पापा उन्होंने अपनी बिटिया की शादी में न बुलाया तो क्या हुआ उनकी रिया ही आपके और हम सबके आशीर्वाद से वंचित हो गई। उन्होंने न तो रोका में पूछा न ही शादी में ....आपकी उनसे कुछ बहस हुई तो दीदी भी चुप न थी। उन्होंने भी कहा-" देहरी में पैर न रखूंगी, पर एक हाथ से ताली नहीं बजती।" माना कि आपने गुस्से में कुछ सुनाया तो क्या ये पत्थर की लकीर हो गई! उन्होंने तो जीते जी हम सबसे रिश्ता ही तोड़ दिया। तब कामता प्रसाद जी बोले- बेटा जो बेटी मायके का मान न रखे, उससे उम्मीद ही क्या की जा सकती है, जिसे पापा की अहमियत न हो तो ऐसे रिश्ते का टूट ही जाना चाहिए। सबके दिन अच्छे बुरे दोनों आते हैं। एक न दिन उसे निश्चित ही एहसास होगा। हम सबकी कमी लगेगी। पैसे के जोर पर खून के रिश्ते नहीं खरीदे जा सकते हैं।  तब बहू ने कहा- पापा ऐसी बेटी ...

तौबा करना

  पति की सर्विस के चलते हमें खूबसूरत स्थानों को देखने का मौका मिला ,हर पांच साल में नई जगह ट्रान्सफर हो जाता था,कभी आसाम ,कभी उड़ीसा ,कभी बिहार तो कभी पंजाब।हर पांच साल बाद सामान की पैकिंग करना अखरता तो जरूर था ,लेकिन कम्पनी की टाउनशिप कॉलोनी में रह े का अप ा ही आनंद था।हर त्योहार पर एक दूसरे े के घर जाना घर में बनाई मिठाई व पकबानों का आदान प्रदान असीम सुख देता था।कयोंकि त्यौहार का मतलब ही है परस्पर मिलना जुलना।हां आज से चालीस साल पहले मार्केट में खाने पीने की इतनी बैराइटी मिलती भी नही थी ,सो त्यौहार के अबसर पर ही अपने पाक कौशल को दिखाने का मौका मिलता था साथ ही अपनी बनाई मिठाई की तारीफ मुंह में मिसरी खोल देती थी। वक्त बदला पति के रिटायर होने के बाद दिल्ली में अपना आशियाना बनाया,जब दीपाली का त्यौहार आया तो हमने अपनी पुरानी आदतानुसार अपनी पडौसिन को अपने हाथों से बनाई मिठाई व पकबान की प्लेट दी तो उनका चेहरा अजीब सा हो गया फिर धीरे धीरे उन्होंने कहा भाभी जी आप तो सब कुछ घर में बना लेती हैं तो कम पैसों में ढेर सारी चीजें बन जाती हैं हम लोग तो हल्दीराम से मिठाई लाते है जो बहुत मंहगी होती...

कहने से पहले परखना

  “ ये क्या कर दिया तुमने रोहित एक बार भी जेहन में ये ख़याल नहीं आया हम लोग इतने सालों से इस कम्पनी के लिए काम कर रहे हैं इनके परिवार को हम कितना सम्मान देते हैं और तुम एक लड़की के लिए अपना ईमान बेच दिए… लानत है तुम पर।” कहते हुए मनोज अपने बेटे को सबके सामने पीटना शुरू कर दिया सामने बड़े मालिक की पोती रीमा अपने तन पर फटे कपड़ों को भरसक छिपाने की कोशिश कर रही थी  “ चलो तुम अंदर कार में बैठो।” कड़क स्वर में राजशेखर जी ने अपनी पोती से कहा पोती के कार में बैठते ही वो रोहित की ओर मुख़ातिब हो ग़ुस्से में आँखें तरेरते हुए बोले,” तुम मनोज के बेटे हो तो ये मत समझना कि हमारे साथ विश्वासघात करने की सजा तुम्हें नहीं मिलेगी ।”  “ मालिक ये आपका गुनाहगार है जो सजा देना हो दे सकते हैं… मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था मेरा ही बेटा ऐसी नीच हरकत करेगा वो भी उनके साथ जिनका हम नमक खाते हैं ।” मनोज नज़रें झुकाकर बोला “ आप सब मुझे ग़लत समझ रहे हैं मैंने ऐसा कुछ भी नहीं किया मैंने कोई ईमान नहीं बेचा ना आपका विश्वास तोड़ा है आप चाहे तो रीमा बेबी से पूछ सकते हैं?” रोहित अपनी बेबसी पर तरस खा उम्...

ज़ख्म पर नमक छिड़कना

  "  बेटी अब वो बड़े वाले महंगे स्कूल में नहीं जाती हो क्या "- पड़ोस की महिला ने,  मोहिनी की बेटी से पूछा " बस भी करिये आंटी! क्यों ज़ख्म पर नमक छिड़क रही हैं?  ये जानते हुए भी कि मेरे पति अब इस दुनिया में नहीं रहे और मेरी आय सीमित है जिसके कारण अब  बेटी महंगे स्कूल में नहीं पढ़ सकेगी, आप ऐसे प्रश्न क्यों कर रही हैं?  वैसे भी स्कूल बड़ा होने से कुछ नहीं होता बल्कि उस स्कूल में मिल रही शिक्षा से बच्चों का भविष्य बनता है और मैं अपनी बच्ची की अच्छी परवरिश करूंगी और उसे एक नेक और शिक्षित इंसान बनाऊंगी। "- मोहिनी ने  करारा जवाब दिया।   समय के साथ, आज मोहिनी की बेटी सफल डाॅक्टर बन गयी। बरसों पुरानी बात याद करते हुए, मोहिनी की आंखों से आंसू आ गये । उसकी परवरिश ने बेटी को आत्मविश्वासी बनाया।  ऋतु रानी

मैं भगोड़ा नहीं

  आज अदालत में नितिन और रोमी के केस की सुनवाई थी।रोमी की तरफ से पति और ससुराल के ऊपर दहेज के लिए प्रताड़ित करने का आरोप लगाया गया था।एक मध्यम वर्गीय परिवार के इकलौते बेटे ने, शादी के समय कभी सोचा भी नहीं था कि कुछ ही महीनों में उसके परिवार को यह दिन भी देखना पड़ेगा।नितिन तो शादी के पहले ही जब मिला था रोमी से तो खुलकर बोला था"देखो रोमी,मेरे घर में दो ही लोग हैं,एक मैं और दूसरी मेरी मां।बचपन में ही पापा चल बसे थे।मां ने बड़ी मुश्किल से घर पर आटा चक्की डाली,किराने की छोटी सी दुकान चलाई मुझे पालने के लिए।मैं भी उनकी मदद करता था,पढ़ाई के साथ-साथ।हम दोनों के ऐसे कोई शौक भी नहीं हैं कि पैसा लुटाएं।अब तुम आ जाओगी तो यही सोचकर चक्की बंद करवा दिया है।छोटी सी दुकान है, अगर तुम चाहो तो तुम भी मां के साथ दुकान पर बैठ सकती हो।मेरी नौकरी से घर का खर्च अच्छी तरह से चल जाता है।बस मेरी मां ने जो दुख सहें हैं,उनसे अब छुटकारा दिलाना चाहता हूं।रानी की तरह रखना चाहता हूं मां को।तुम भी देखना उनकी बेटी बनकर रहोगी।" रोमी ज्यादा खुश तो नहीं हुई ,उल्टे मुंह बनाकर बोली"मैं घर में पड़े रहकर बोर हो ज...

मां की नसीहत

  ममता जी लाइट बन्द कर सोने ही जा रही थी कि डोरबेल की आवाज सुनकर ठिठक गयी। रात के 11 बजने वाले हैं इस समय कौन...हो.... सकता है। दरवाजा खोला तो सामने रुचि को देखकर हैरान रह गयी। क्या बात है रुचि इस तरह अचानक... और रौनक जी कंहा है मेरा मतलब तुम उनके साथ नही.. सब ठीक तो है न बेटा,  कुछ भी ठीक नही है मम्मी... और क्या मतलब है आपका मैं अकेले अपने घर नही आ सकती क्या ? पापा कंहा है बुलाओ उन्हें,रुचि झुंझलाती हुई बोली। ममता जी रुचि के स्वभाव को भली भांति जानती थी सो बात संभालते हुए बोली- अभी बहुत रात हो गयी है बेटा तेरे पापा सो गए हैं मैं भी सोने जा रही हूं। तू भी कुछ खा ले और आराम कर, सुबह बात करते हैं। मुझे कुछ नही खाना है मां... बस एक कप कॉफी बना दो, रुचि कुछ नरम होते हुए बोली। ममता जी ने फटाफट कॉफी बनाकर दी और सोने चली गई। रुचि ममता और आलोक जी की इकलौती बेटी है, बहुत मन्नतों के बाद रुचि का जन्म हुआ था, माता पिता ने कभी भी किसी प्रकार की रोक टोक या बंदिश नही लगाई थी। कॉलेज पूरा होते होते एक मध्यमवर्गीय परिवार देखकर बहुत धूमधाम से रुचि और रौनक का विवाह हो गया। रौनक के घर मे मां अकेली...

छोटे कदम, बड़ी जीत

  राहुल और निधि का जीवन मध्यम वर्गीय खुशियों से भरा हुआ था। लेकिन जब कंपनी में अचानक छंटनी हुई, राहुल की नौकरी चली गई।  घर की सारी ज़िम्मेदारी अब निधि पर आ गई थी। हालांकि, निधि भी एक प्राइवेट स्कूल में टीचर थी, लेकिन उसकी तनख्वाह से घर का खर्च मुश्किल से चल पाता था।   राहुल को काम ना होने का दुख तो था ही, साथ में वह आत्मसम्मान की लड़ाई भी लड़ रहा था।  दिन भर नौकरी की तलाश में इंटरव्यू देता और खाली हाथ लौट आता। घर लौटते वक्त रास्ते में अक्सर नुक्कड़ की चाय की दुकान पर कुछ समय बिताता, ताकि मन को थोड़ी राहत मिले।  एक दिन वहां बैठा-बैठा वह कुछ खोया हुआ सा था कि एक आदमी उसकी बगल में आकर बैठ गया।  वह भी एक छोटा व्यापारी था, जिसने अपनी छोटी सी किरयाने की दुकान हाल ही में खोली थी।  राहुल से धीरे-धीरे बातों का सिलसिला शुरू हुआ।    व्यापारी ने कहा, “भाईसाहब, कोई ना कोई काम तो चलता रहेगा, लेकिन जब तक कुछ हाथ में न हो, खुद की ताकत पर भरोसा रखना ज़रूरी है। एक छोटा कदम भी बड़ा बदलाव ला सकता है।”   राहुल ने उसकी बात ध्यान से सुनी, लेकिन अंदर ...

बस हो गया

  “ कैसी हो सरला चाची….घूम आई बेटा बहू का विदेशी घर …. फिर भी मुँह लटका रखा है… बहुत याद आ रही है क्या बेटा बहू की?” पड़ोस में रहने वाली मंजू ने कहा  “ क्या देश क्या विदेश मंजू  सब जगह की एक ही कहानी है… कहते हैं ना घाट घाट का पानी पी लिया तब समझ आया कहा का पानी रास आया….बस हो गया अब कही ना जाना यही पड़ी रहूँगी जब तक ज़िन्दगी बाकी है।” सरला चाची की आवाज़ में अब पहले सी खनक नहीं लग रही थी जो चार महीने पहले विदेश जाने को लेकर हो रही थी  “ ऐसा क्यों कह रही हो चाची… विपुल तो तुम्हारा सबसे चहेता लाडला छोटा बेटा था… माँ को यहाँ वहाँ घुमाने की कितनी बातें करता था फिर अब आप कह रही हो बस अब कही नहीं जाना?” मंजू ने पूछा  “ हाँ बेटा सही कह रही हूँ जो मान सम्मान बड़ी बहू करे है… जितनी मेरी सेवा वो करे है उतनी तो कोई भी बहू किसी जन्म में ना कर सकें…उधर गई तो एक दिन तबियत नासाज़ हो गई..एक बार उठ कर बाथरूम जा ही रही थी कि वही बिस्तर के पास हो गया…छोटी बहू ने जो सुनाया मत ही पूछो और यहाँ जब कभी हालत ख़राब होती बड़ी बहू नाक मुँह बिना सिकोड़ें सब कर देती बता ऐसे में यहाँ ना रहूँ ...

मेहनत का श्रेय

  “ सर ये क्या हुआ…आपने तो कहा था इस बार तुम ही विजेता हो और जल्द ही तुम्हें ट्रॉफ़ी और सर्टिफिकेट दिया जाएगा पर आपने मेरी जगह किसी और का नाम सजेस्ट कर दिया?” चेहरे पर दुख के भाव लिए निशांत ने अपने मैनेजर से कहा  “ हाँ निशांत सोचा तो यही था इस बार जब एचीवमेंट अवार्ड दिए जाएँगे तो सबसे पहले तुम्हारा ही नाम रहेगा पर अब उपर मैनेजमेंट ने तुम्हारी जगह कृतिका का नाम सजेस्ट कर दिया तो मैं क्या कर सकता हूँ… मैं तो अभी भी कह रहा हूँ तुम ही उस अवार्ड के काबिल हो।” मैनेजर ने कहा और वहाँ से चला गया  निशांत सोचने लगा… जब भी किसी को ज़रूरत पड़ती है मुझे ही बुलाते हैं हर काम ठोक बजाकर सारा समय देकर मैं ही करता हूँ पर वाहवाही ये कृतिका ले जाती है…मैनेजर भी अपना काम निकलवा कर सामने तारीफ़ों के पुल बाँध देता पर कही ना कही वो भी कृतिका से मिला हुआ है ताली कभी एक हाथ से तो बजती नहीं…दोनों हमेशा एक दूसरे को गलत ठहराने पर लगे रहते हैं पर अंदर ही अंदर मिले हुए है और इन सब में पिस रहा हूँ मैं… क्या ही फ़ायदा ऐसे काम का जब सब कुछ करने के बाद भी आपको सराहाना ना मिले? अगली बार से निशांत ने अपने काम...