सुबह के 4:00 बज गए थे। मैना देवी बिस्तर पर बैठकर मन ही मन भगवान का नाम ले रही थीं। उन्हें नींद भी बहुत कम आती थी। पति की मौत ने उन्हें गहरे दुख में डाल दिया था। उनके तीन बेटे थे, परंतु तीनों ही अलग-अलग घरों में रहते थे। मैना देवी अपने मंझले बेटे के पास रहती थीं। अपने पोते-पोतियों को देखकर वह अपना ग़म भुलाने की कोशिश करती थीं। कभी लाखों रुपये अपने हाथों में रखने वाली मैना देवी के पास आज संपत्ति के नाम पर बस थैले में रखे दो जोड़ी कपड़े ही थे। पति की मौत के बाद तीनों बेटों ने उनकी कमाई, दौलत और ज़मीन-जायदाद आपस में बाँट ली थी। बेटों और बहुओं ने इसे “जश्न” की तरह मनाया। मैना देवी को यह भी पता नहीं था कि उनके बेटों ने उनसे पूछे बगैर उनका भी बंटवारा कर दिया है। किसी ने यह तक नहीं सोचा कि पति की मौत का ग़म क्या होता है। वह रोज़ की तरह देर तक गर्म चाय का इंतज़ार कर रही थीं। सोच रही थीं कि गरम चाय पीकर जब शरीर में थोड़ी ताक़त आएगी, तो हीटर पर सिकाई कर लेंगी। परंतु तभी उनकी बड़ी बहू पूनम गुस्से से कमरे में आई और बोली – “जल्दी से बिस्तर से उठो, चलो बाहर घूमकर आते हैं।” इतना कहकर उसने मैन...
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