"मम्मी... प्लीज़, क्या हम आज रात की बस पकड़कर वापस नहीं जा सकते? मुझे यहाँ एक पल भी नहीं रुकना."
नैनीताल की वादियों में बनी उस पुरानी, औपनिवेशिक शैली की कोठी 'मेघदूत विला' के पीछे वाले बगीचे में खड़े होकर दस साल के विहान ने अपनी माँ, सुमेधा की शॉल का कोना खींचते हुए कहा. उसकी आवाज़ में एक ऐसी थरथराहट थी जो ठंड से नहीं, बल्कि भीतर के किसी गहरे डर से उपजी थी.
सुमेधा ने अपने हाथ में थमे गर्म कॉफी के मग को नीचे रखा और झुंझलाहट भरी नज़रों से बेटे को देखा. सामने लॉन में अलाव (bonfire) जल रहा था. परिवार के करीब बीस लोग—सुमेधा के भाई-बहन, उनके पति-पत्नी और बच्चे—हंसी-ठिठोली कर रहे थे. गिटार बज रहा था और पुराने हिंदी गाने गाए जा रहे थे. माहौल में उत्सव जैसा रंग था.
"विहान, फिर वही रट?" सुमेधा ने अपनी आवाज़ धीमी रखी ताकि पास बैठे मामा जी न सुन लें. "हम यहाँ छुट्टियाँ मनाने आए हैं. पाँच साल बाद पूरा परिवार इकट्ठा हुआ है. नानी कितनी खुश हैं, देख रहे हो? और तुम हो कि दूसरे दिन से ही मुंह लटकाए घूम रहे हो. तुम्हें शर्म नहीं आती? देखो, आरव और पिंकी कैसे एन्जॉय कर रहे हैं. तुम क्यों हमेशा अलग-थलग रहते हो?"
"मम्मी, वो एन्जॉय नहीं कर रहे, वो..." विहान कुछ कहते-कहते रुक गया. उसकी मुट्ठियां भींच गईं. "मुझे घर जाना है. अपने कमरे में. यहाँ सब अजीब हैं."
"अजीब?" सुमेधा की त्योरियां चढ़ गईं. "ये मेरे सगे भाई-बहन हैं, विहान. तुम्हारे मामा-मासी हैं. तुम उन्हें अजीब कह रहे हो? शहर में हम अकेले फ्लैट में बंद रहते हैं, मैं चाहती थी कि तुम संयुक्त परिवार का प्यार देखो, मिलजुल कर रहना सीखो. लेकिन तुम्हें तो बस अपने वीडियो गेम्स और उस बंद कमरे की ही आदत हो गई है. थोड़ा सोशल होना सीखो."
"मुझे नहीं होना सोशल," विहान की आँखों में आंसू तैरने लगे. "प्लीज़ मम्मी..."
सुमेधा ने कठोरता से उसका हाथ झटक दिया. "चुपचाप अंदर जाओ और स्वेटर पहनकर आओ. अभी डिनर का टाइम है. और खबरदार जो सबके सामने मुंह बनाया तो. मुझे तुम्हारी वजह से शर्मिंदा नहीं होना है."
विहान ने एक पल के लिए माँ की आँखों में देखा. उस नज़र में एक हताशा थी, एक शिकायत थी कि उसकी अपनी माँ, जो दुनिया से उसकी रक्षा करने का दावा करती थी, उसे समझ ही नहीं पा रही थी. वह सिर झुकाकर अंधेरे गलियारे की ओर बढ़ गया.
सुमेधा ने गहरी सांस ली और चेहरे पर बनावटी मुस्कान ओढ़कर वापस अलाव के पास जा बैठी.
"अरे सुमेधा, कहाँ गया हमारा 'आइंस्टीन'?" बड़े मामा, राजीव ने ज़ोर से हंसते हुए पूछा. विहान चश्मा लगाता था और कम बोलता था, इसलिए राजीव मामा ने उसका नाम 'आइंस्टीन' रख दिया था. सब हंस पड़े.
"बस, स्वेटर लेने गया है भैया," सुमेधा ने सफाई दी, लेकिन मन ही मन उसे विहान पर गुस्सा आ रहा था. क्यों वह बाकी बच्चों की तरह सामान्य नहीं हो सकता? क्यों वह क्रिकेट नहीं खेलता? क्यों वह बस अपनी नोटबुक में सिर गड़ाए रहता है?
तभी अंदर से ज़ोर की आवाज़ आई, जैसे कांच का कुछ टूटा हो. उसके बाद सन्नाटा छा गया.
सुमेधा घबराकर उठी और कोठी के अंदर दौड़ी. आवाज़ बच्चों वाले कमरे से आई थी. जब वह वहाँ पहुँची, तो नज़ारा देखकर उसके कदम ठिठक गए.
कमरे के बीचों-बीच विहान खड़ा था. उसके पैरों के पास एक टूटा हुआ फ्लावर पॉट पड़ा था. लेकिन सुमेधा का ध्यान पॉट पर नहीं, बल्कि विहान के चेहरे पर था. उसका चेहरा तमतमाया हुआ था, और वह कांप रहा था.
उसके सामने, बिस्तर पर सुमेधा की बड़ी बहन का बेटा, कबीर (जो उम्र में विहान से तीन साल बड़ा था) और दो अन्य चचेरे भाई-बहन खड़े थे. कबीर के हाथ में एक नीले रंग की डायरी थी—विहान की पर्सनल डायरी.
"क्या हो रहा है यहाँ?" सुमेधा ने कड़क आवाज़ में पूछा.
कबीर थोड़ा हड़बड़ाया, लेकिन फिर अपनी ढिठाई वापस लाते हुए बोला, "कुछ नहीं मासी, वो तो बस विहान का पैर लग गया तो गमला टूट गया. हम तो बस इसकी ये 'शायरी' पढ़ रहे थे. मासी, आपको पता है आपका बेटा छुप-छुप के कविताएं लिखता है? सुनिए ज़रा..."
कबीर ने डायरी खोली और नाटकीय अंदाज़ में पढ़ना शुरू किया, "मैं बादलों के पार जाना चाहता हूँ, जहाँ शोर न हो, जहाँ कोई मुझ पर हंसे नहीं..."
"बंद करो!" विहान चीखा. वह कबीर की तरफ लपका, लेकिन कबीर ने डायरी हवा में ऊंची कर दी और बाकी बच्चे विहान को धक्का देकर हंसने लगे.
"अरे, आइंस्टीन तो फाइटर भी है!" कबीर ने व्यंग्य किया.
सुमेधा ने देखा कि विहान की आँखों से आंसुओं की धार बह निकली थी. वह अपनी ही चीज़ वापस पाने के लिए गिड़गिड़ा रहा था, और उसके अपने ही भाई-बहन उसका तमाशा बना रहे थे. और सबसे बुरी बात—सुमेधा को याद आया कि कल शाम को उसने खुद कबीर और बाकी बच्चों से कहा था, "अरे, विहान तो बोरिंग है, तुम लोग ही इसे थोड़ा छेड़ा करो, शायद खुल जाए."
सुमेधा ने अनजाने में ही भेड़ियों के सामने मेमने को डाल दिया था.
"कबीर! डायरी अभी वापस करो," सुमेधा की आवाज़ में एक ऐसी दहाड़ थी कि कमरे में सन्नाटा छा गया. कबीर ने डरकर डायरी बिस्तर पर फेंक दी.
सुमेधा आगे बढ़ी, विहान का हाथ पकड़ा और उसे खींचते हुए अपने कमरे में ले आई. उसने दरवाजा अंदर से बंद कर लिया.
विहान बिस्तर के कोने में दुबक कर बैठ गया. वह रो नहीं रहा था, बस शून्य में घूर रहा था.
"बेटा..." सुमेधा ने उसके पास बैठकर उसके कंधे पर हाथ रखा.
विहान ने झटका देकर उसका हाथ हटा दिया. "आपको लगता है मैं नाटक कर रहा हूँ, है न मम्मी? आपको लगता है कि मैं जिद्दी हूँ? आप तो खुश थीं न? आप भी तो कल हंस रही थीं जब राजीव मामा ने मुझे 'गूंगा' कहा था."
सुमेधा को लगा जैसे किसी ने उसे तमाचा मारा हो.
"विहान, मैं..."
"नहीं मम्मी, आप सुनिए," विहान पहली बार चिल्लाया नहीं, बल्कि एक अजीब सी परिपक्वता के साथ बोला. "आप जिसे 'प्यार' कहती हैं, वो मेरे लिए टॉर्चर है. सुबह जब हम क्रिकेट खेल रहे थे, तो कबीर भैया ने मुझे जानबूझकर बॉल मारी थी. सब हंसे थे. आपने भी कहा था 'अरे, लड़का है, इतनी चोट तो लगती रहती है'. दोपहर को जब मैं ड्राइंग कर रहा था, तो पिंकी दीदी ने मेरे रंगों में पानी मिला दिया. और अभी... अभी वो मेरी डायरी ज़ोर-ज़ोर से पढ़कर सुना रहे थे."
विहान की आवाज़ भर्रा गई. "मम्मी, घर वो जगह होती है जहाँ हम सुरक्षित महसूस करते हैं. अगर नानी का घर मेरे लिए सुरक्षित नहीं है, तो यह मेरा घर नहीं हो सकता. मुझे अपने उस छोटे से फ्लैट में जाना है जहाँ कोई मुझे जज नहीं करता, जहाँ कोई मेरा मज़ाक नहीं उड़ाता. आप कहती हैं मैं वहाँ अकेला हूँ, लेकिन यहाँ इतनी भीड़ में मैं जितना अकेला हूँ, उतना कभी नहीं था."
सुमेधा की आँखों से आंसू बह निकले. वह जिसे अपनी 'छुट्टी' और 'मायके का सुख' समझ रही थी, वह दरअसल उसके बेटे के आत्मविश्वास की बलि देकर मिल रहा था. वह अपने रिश्तेदारों को खुश करने में और 'अच्छी बेटी-बहन' बनने में इतनी व्यस्त हो गई थी कि एक 'अच्छी माँ' बनना भूल गई. उसने विहान के संकेतों को नज़रअंदाज़ किया, उसकी खामोशी को बदतमीज़ी समझा, और उसके डर को नखरे.
उसने विहान को गले लगाया. इस बार विहान ने उसे नहीं धकेला, बल्कि टूटकर उसके सीने से लग गया और फूट-फूट कर रोया.
"आई एम सॉरी, विहान. आई एम सो सॉरी," सुमेधा सिसक उठी. "मुझे लगा... मुझे लगा तुम बस एडजस्ट नहीं कर पा रहे. मैंने देखा ही नहीं कि वो लोग तुम्हारे साथ क्या कर रहे थे."
थोड़ी देर बाद, जब विहान शांत हुआ, तो सुमेधा उठी. उसने अपना सूटकेस निकाला और कपड़े पैक करने लगी.
"हम क्या कर रहे हैं?" विहान ने पूछा, उसकी आँखों में एक उम्मीद की किरण थी.
"हम घर जा रहे हैं," सुमेधा ने कहा.
"अभी? रात को? लेकिन नानी क्या कहेंगी? मामा जी नाराज़ हो जाएंगे..." विहान अब खुद संकोच कर रहा था.
सुमेधा ने विहान के गालों को चूमा. "उन्हें जो कहना है, कहने दो. अगर मेरा परिवार मेरे बेटे की इज़्ज़त नहीं कर सकता, तो मुझे उनकी मेज़बानी नहीं चाहिए. रिश्ते खून से बनते हैं, लेकिन निभाए सम्मान से जाते हैं. और जहाँ सम्मान नहीं, वहाँ सुमेधा नहीं."
सुमेधा ने रिसेप्शन पर फोन करके टैक्सी मंगवाई. जब वह विहान का हाथ पकड़कर और सूटकेस लेकर नीचे हॉल में आई, तो सन्नाटा छा गया. संगीत बंद हो चुका था. नानी, मामा, मासी सब हैरान होकर उन्हें देख रहे थे.
"अरे सुमेधा, यह क्या? इतनी रात को कहाँ जा रही हो?" नानी ने पूछा. "पागल हो गई है क्या?"
"नहीं माँ, अब तक पागल थी जो सब देख कर भी अनदेखा कर रही थी," सुमेधा ने शांत स्वर में कहा. उसकी नज़र कबीर और राजीव मामा पर गई. "मेरा बेटा 'आइंस्टीन' हो या न हो, पर वह किसी के मनोरंजन का खिलौना नहीं है. कबीर ने आज जो किया, वह शरारत नहीं, बदतमीज़ी थी. और भैया, आपने जो कल कहा था, वह मज़ाक नहीं, अपमान था."
"अरे, बच्चों की बातों का बुरा मान गई?" राजीव मामा ने बात संभालने की कोशिश की. "हम तो बस उसे मज़बूत बना रहे थे."
"अपमानित करके कोई मज़बूत नहीं बनता भैया, सिर्फ टूटता है," सुमेधा ने कड़े शब्दों में कहा. "मैं नहीं चाहती कि मेरा बेटा यह सीखे कि परिवार के नाम पर बेइज्जती सहना ज़रूरी है. हम जा रहे हैं."
किसी में कुछ बोलने की हिम्मत नहीं हुई. सुमेधा का यह रूप उन्होंने पहले कभी नहीं देखा था—वह हमेशा दबने वाली, समझौता करने वाली सुमेधा थी. लेकिन आज, एक माँ खड़ी थी.
टैक्सी के ठंडे शीशे के पीछे बैठकर विहान ने राहत की सांस ली. गाड़ी पहाड़ियों के घुमावदार रास्तों से नीचे उतर रही थी. पीछे 'मेघदूत विला' की रोशनियां धुंधली होती जा रही थीं.
विहान ने धीरे से अपनी जेब से अपनी डायरी निकाली और उसे सीने से लगा लिया. फिर उसने सुमेधा का हाथ थाम लिया.
"थैंक यू, मम्मी," उसने फुसफुसाया.
सुमेधा ने उसके बालों को सहलाया. "सॉरी बेटा, मुझे समझने में देर हो गई. लेकिन वादा करती हूँ, अब कभी तुम्हें वहां नहीं रुकने दूँगी जहाँ तुम्हारी कद्र न हो."
विहान मुस्कुराया. अंधेरे रास्ते पर गाड़ी चल रही थी, लेकिन उसके मन में अब उजाला था. उसे पता चल गया था कि दुनिया चाहे उसके खिलाफ हो जाए, उसकी माँ की ढाल अब हमेशा उसके साथ रहेगी. और सचमुच, 'घर' वही था जहाँ वह सुकून से सांस ले सके—चाहे वह एक आलीशान कोठी हो या चलती हुई टैक्सी की पिछली सीट.
मूल लेखिका
हेमलता गुप्ता
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