काफी वर्षो बाद अचानक ही मनोज,राकेश के घर आया।राकेश पहले तो पहचान ही नही पाया,लगभग 25 बरष बाद दोनो ने एक दूसरे को देखा था।एक दूसरे के गले मिल दोनो विद्यार्थी जीवन के संस्मरण साझे करने लगे,इतने में मनोज की पत्नी मालती दोनो के लिये चाय ले आयी। कई घण्टे दोनो अपने मे ही मशगूल रहे।मालती को मनोज बताता तो रहता था कि उसका खास दोस्त राकेश रहा है, जो नेवी में चला गया था,फिर उससे मुलाकात ही नही हुई।आज उसे सामने देख उसकी प्रसन्नता का कोई ठिकाना नही रहा था।
मनोज एक सम्पन्न परिवार का बेटा था,विद्यार्थी जीवन मे ही उसे खूब जेब खर्च मिलता।खर्च करते समय उसने कभी भी राकेश को जेब मे हाथ नही डालने दिया।खुद ही खर्च करता।वैसे भी राकेश अपने अध्यापक चाचा के पास रहकर पढ़ रहा था।उसके पिता की आर्थिक स्थिति ठीक नही थी,सो राकेश के चाचा उसे अपने पास ले आये थे।मनोज जानता था,उसके चाचा राकेश को पढ़ाने के बदले उसे एक घरेलू नौकर की तरह लाये थे।घर का हर तरह का काम करना ही उसकी नियति थी।मनोज कभी भी राकेश को किसी भी चीज का अभाव नही रहने देता था। वो तो ईश्वर की अनुकंपा हुई कि वह नेवी मर्चेंट में नियुक्त हो गया।अब उसका संबंध अपने शिप से रह गया था,शेष जहान से उसका संबंध ही विच्छेद हो गया था।
इतने दिनों बाद राकेश, मनोज के पास आया तो सब पुरानी बातें ताजा हो गयी।बातचीत में ही पता चला कि नेवी से उसका कॉन्टैक्ट खत्म होने के बाद अब वह सोनीपत में एक बीयर फैक्टरी में मैनेजर है।चूंकि सोनीपत और मेरठ के बीच कुल 70-80 किलोमीटर की ही दूरी है सो वह मनोज से मिलने आ गया था।शाम को वापस जाते समय वह भरपूर आग्रह सोनीपत आने के लिये करके गया था।
मनोज के पिता तो नही रह गये थे,सो उसे अपने पिता का ही कारोबार संभालना पड़ा।मनोज ने जब व्यापार संभाला तो पता चला कि पिता की कंपनी तो लगभग दिवालिया हो चुकी है,कर्ज बैंक आदि के अतिरिक्त व्यक्तिगत भी काफी चढ़ा हुआ है।काफी प्रयत्नों के बाद भी मनोज कंपनी संभाल नही पाया।उसने घर छोड़कर समस्त संपत्ति को बेचकर काफी हद तक कर्ज से छुटकारा पा लिया।लेकिन बेरोजगार मनोज के सामने अब आजीविका का संकट था,जिसके लिए उसके पास न तो कोई योजना थी और न ही साधन।
एक दिन मालती ने जिद करके भगवान कृष्ण और सुदामा का उद्धाहरण देकर मनोज को राकेश के पास सोनीपत भेजा, इस आशा के साथ कि शायद वह कोई राह सुझा सके,कोई मदद कर सके।मनोज ने सदैव ही राकेश की सहायता की थी, सो मनोज की झिझक स्वाभाविक थी।मालती की जिद और अपनी बेबसी के कारण मनोज सोनीपत चला ही गया।राकेश उसको सामने देख गद गद हो गया।राकेश उसे अपने आलीशान ऑफिस में ले गया।बहुत देर बातचीत के बाद धीरे धीरे मनोज ने अपनी स्थिति से और अपने बेरोजगारी से राकेश को अवगत कराया।उसने यह भी कहा कि उसकी आर्थिक स्थिति इतनी खराब है कि यदि वह अपनी इस फैक्टरी में वह किसी भी छोटी से छोटी नौकरी दिला देगा तो उसे भी स्वीकार कर लेगा।
सब सुनकर राकेश ने कहा कि वह उसकी समस्या के बारे में सोचेगा।इतना कहकर राकेश ने इस टॉपिक पर बात ही बंद कर दी।राकेश निराशा से घिर गया,उसे शर्मिंदगी के कारण उठना ही भारी हो रहा था।किसी प्रकार मनोज राकेश से हाथ मिलाकर वापस आ गया।अपनी बेबसी और राकेश के द्वारा उपेक्षित किये जाने के कारण उसकी आँखों में आंसू आ गये।
घर वापस आकर मनोज पस्त हो अपने बिस्तर ओर पसर गया।मालती घबरा गयी, पता नही क्या हो गया है?पूछने पर मनोज बोला मालती जमाना बदल गया है,आज अपनी बदहाली और बेबसी बताते बताते मैं तो खुद ही अपने मे गिर गया था,पर राकेश ने तो जरा हाथ भी नही लगाया,बस एक वाक्य में सब कुछ खत्म कर दिया,देखूंगा क्या हो सकता है।असल मे दुनिया रो कर पूछती है और हंस कर उड़ाती है।अब बता किसी के घड़ियाली आँसुओ से कही पेट भरता है।मालती तो शॉक्ड हो गयी फिर भी मनोज को ढाढस देने लगी,भगवान जरूर हमारी सुनेगा।
एक सप्ताह बाद मनोज को राकेश की एक चिठ्ठी प्राप्त हुई।अनमने भाव से उसने चिठ्ठी खोलकर पढ़ी।उसमें लिखा था,भाई अपने संकट में मुझे शामिल किया यह मेरे लिये गर्व की बात है।मेरठ में मैंने कंपनी की ओर से एक खाली प्लाट लीज पर लिवा लिया है,बियर बनने के बाद जौ की भूसी जो निकलती है उसकी पशुचारा के रूप में बहुत डिमांड है।उस प्लाट में नियमित रूप से भूसी आती रहेगी,आप उसे बिक्री करेंगे और मुनाफे के 25 प्रतिशत लाभ के अधिकारी होंगे।यह कार्य कल से ही आप प्रारम्भ कर दे।भाई क्या मैं तुम्हे नौकरी करने देता?अरे नही मनोज तूने जो मेरे लिये किया है,वह कर्ज तो मैं सात जन्म नही उतार सकता।भाई नयी जिन्दगी शुरू कर,आगे भी चिंता मत करना,तेरा ये दोस्त,भाई जिंदा है।
मनोज राकेश का पत्र पढ़ता जा रहा था और आंखों से आँसू अपने आप बहते जा रहे थे।भावातिरेक में मनोज चिल्ला पड़ा-मालती ओ मालती देख री अपने राकेश ने कोई घड़ियाली आंसू नही बहाये थे,वो तो इस सुदामा का कृष्ण ही निकला री।
बालेश्वर गुप्ता,नोयडा
मौलिक एवम अप्रकाशित।
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