अदिति अपनी सहेली साक्षी के साथ शहर के पॉश कैफ़े से बाहर निकली। सड़क पर हल्की बारिश हुई थी, और हवा में मिट्टी की खुशबू तैर रही थी।
“साक्षी, ज़रा रुको। वो देखो न, मोड़ पर कितना प्यारा सा गुब्बारे वाला खड़ा है। चलो न, एक गुब्बारा ले लेते हैं,” अदिति ने बच्चे जैसी उत्सुकता से कहा।
साक्षी ने भौंहें सिकोड़ लीं—
“अरे अदिति, तुम भी न! सड़क किनारे से कुछ खरीदना? पता है इन लोगों का क्या स्टेटस होता है? गंदगी, बदबू, और धोखा। हम लोग तो मॉल से, शो-रूम से सामान लेते हैं। क्लास का भी तो ध्यान रखना चाहिए।”
अदिति ने पलटकर देखा—बारिश में भीगता वो आदमी, भीगे कपड़ों में भी अपने छोटे बेटे के साथ गुब्बारे फुला रहा था। बच्चे के चेहरे पर मासूम मुस्कान थी, और हाथ में बस एक टुकड़ा रोटी।
“लेकिन साक्षी, देखो कितने बच्चे वहाँ गुब्बारे लेकर खुश हो रहे हैं। हो सकता है उसके गुब्बारे ही सबसे अच्छे हों,” अदिति ने धीरे से कहा।
साक्षी ने हंसकर कहा—
“अरे, बच्चों को तो कुछ भी अच्छा लगता है। असली क्लास तो वहीं है जहां पैकिंग हो, ब्रांड हो। यही हमारी पहचान है।”
अदिति चुप हो गई।
तभी तेज़ हवा चली और साक्षी का महँगा आयातित स्कार्फ़ उड़कर नाले की ओर जा गिरा।
“ओह नो! ये तो पापा दुबई से लाए थे। कितने महँगे दाम का है।”
साक्षी घबराकर इधर-उधर देखने लगी।
तभी वही गुब्बारे वाला नाले की गंदगी में उतर गया। भीगते हुए, कीचड़ से जूझते हुए उसने स्कार्फ़ उठाया और सावधानी से पानी झाड़ते हुए साक्षी को पकड़ाया।
“बहन जी, ये आपका था न? ज़रा गंदा हो गया, लेकिन धुल जाएगा।”
साक्षी कुछ पल तक उसे देखती रह गई। बारिश से भीगे उस चेहरे पर थकान थी, लेकिन आँखों में सच्चाई और आत्मसम्मान चमक रहा था।
अदिति मुस्कुराई और धीरे से बोली—
“देखा साक्षी, क्लास ब्रांडेड कपड़ों या महंगे कैफ़े से नहीं, दिल की सच्चाई और कर्म से झलकती है।”
साक्षी ने चुपचाप स्कार्फ़ लिया। उसका चेहरा लाल हो गया था।
पहली बार उसने बिना झिझके उस गुब्बारे वाले से कुछ गुब्बारे खरीदे और कीमत से ज़्यादा पैसे थमा दिए।
गुब्बारे वाले ने मुस्कुराकर कहा—
“बहन जी, इतने पैसे मत दीजिए। ये देखिए, आपकी नन्ही परी के लिए एक गुब्बारा और।” उसने मुफ्त में एक दिल के आकार का लाल गुब्बारा और पकड़ाया।
घर लौटते समय साक्षी ने धीमे स्वर में कहा—
“अदिति, सच कह रही हो। असली अमीरी तो देने में है, मदद करने में है। इंसानियत सबसे बड़ा ब्रांड है।”
अदिति की आँखों में संतोष चमक उठा।
बारिश थम चुकी थी, लेकिन उनके दिलों में एक नई सोच की बूंदें ज़रूर उतर चुकी थीं।
“असली पहचान कपड़ों, ब्रांड या पैसों से नहीं होती। इंसान की सच्चाई, ईमानदारी और मददगार दिल ही उसकी सबसे बड़ी दौलत है।”
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