गड़े मुर्दे उखाड़ना

 दिया की जेठानी गीता जी को गड़े मुर्दे उखाड़ने की बहुत ही आदत थी । जब भी दिया उनसे मिलने जाती, वे कोई ना कोई पुरानी बात निकाल कर बैठ जाती और दिया को नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ती थी।

उनकी इन बातों से रिया का मन बहुत खिन्न हो जाता था। वह जब घर लौटती तो हमेशा उदास रहती थी। इस बात से उसके पति रवि भी बहुत परेशान थे।

इस बारे में उन्होंने अपनी भाभी जी को कई बार समझाने का प्रयास भी किया, तो वह उल्टा रवि को ही दस बातें सुना दिया करती थी और घर की बड़ी होने की वजह से रवि भी उनके सम्मान में चुप रह जाते थे।

इस बार तो उन्होंने अती ही कर दी थी। दिया अपनी मां के साथ उनसे मिलने गई और उन्होंने दिया की शादी में हुई कमियों को लेकर उसकी मां को ही बहुत कुछ सुना दिया। दिया मन मसोस कर रह गई।

उस समय तो दिया वहां से लौट आई, किंतु उसकी मां का हुआ अपमान उसे शांति से जीने नहीं दे रहा था। उसने तय कर लिया था कि इस बार उसे ऐसा कुछ जरूर करना है की जेठानी जी की यह आदत हमेशा के लिए छूट जाए।

अब तक हमेशा उनके सम्मान में वह चुप रहती थी। इस बार उसने रवि से कहा कि अब हमें कुछ ऐसा करना है की जिठानी जी गड़े मुर्दे उखाड़ना हमेशा के लिए छोड़ दें।

कुछ महीनों बाद गीता जी के बड़े बेटे पवन की शादी थी और दिया और रवि ने तय किया कि वही सही वक्त है जब हमें भाभी जी को उनकी गलतियों का एहसास कराना है।

गीता जी के बड़े भाई थे जिनसे कुछ जमीनी वाद- विवाद के चलते गीता जी ने वर्षों से सारे रिश्ते खत्म कर लिए थे। वे गीता जी को बहुत चाहते थे और पवन से भी बहुत प्रेम करते थे। पवन और गीता जी के पति दोनों ही चाहते थे कि वे मामा जी मामी की शादी में जरूर आए। गीता जी के स्वभाव के चलते उनके सामने इस बात को कहने की हिम्मत किसी में न थी ।

गीता जी के पति को उदास देखकर रवि ने उनसे पूछा कि भाई साहब क्या बात है ? शादी है घर में और आप खुश नहीं दिख रहे हैं। तभी उन्होंने सारी बात रवि को बताई। सब बात समझ कर रवि ने कहा कि आप चिंता मत कीजिए भाई साहब सब कुछ अच्छा ही होगा। रवि और दिया को जिस अच्छे मौके की तलाश थी उन्हें वह मिल गया था।

अगले दिन अल सुबह ही रवि और दिया मामा जी मामी जी को लेने निकल पड़े। बहुत मनाने के बाद आखिर प्रेम वश मामा जी मामी जी शादी में आने को मान ही गए।

गीता जी ने अपने भाई के होने की बात अपने समधी समधन को नहीं बताई थी। शादी की सभी रस्में शुरू हो चुकी थी ।जब मायरे की रस्म का वक्त आया तब गीता जी उस रस्म को टालना चाह रही थी। तभी उन्होंने देखा कि ढोल ढ़माको के साथ उनके भाई -भाभी बहुत सारे कपड़े जेवर आदि लेकर आ रहे हैं। साथ में रवि और दिया भी है।

गीता जी बहुत घबरा गई उन्हें लगा कि अब यहां कुछ गढ़े मुर्दे उखड़ने वाले हैं और उनकी बहुत बेज्जती होने वाली है।

मायरे की रस्म बहुत अच्छे से हुई और उनके समधी समधन के जो भी सवाल थे उसके जवाब रवि और दिया ने कुछ इस तरह से दिए की सारी बात संभल गई। गीता जी की जरा भी बेज्जती नहीं हुई। उनकी आंखें भर आईं और उन्होंने आगे बढ़कर रवि और दिया को गले से लगा लिया।

दोनों से कहा कि मुझे माफ करना बच्चों में हर समय तुम्हारा दिल दुखाती आई पर तुमने आज मेरा मान बढ़ाया है।

पवन और गीता जी के पति मामा जी मामी जी के आने से बहुत प्रसन्न थे। दिया और रवि के प्रयासों को मन ही मन सराह रहे थे।

कभी-कभी जीवन में बड़े भी कुछ ऐसी गलतियां कर जाते हैं कि उन्हें सही क्या यह बताने के लिए छोटों को कुछ ऐसे कदम उठाने ही पड़ते हैं।

मित्रों जीवन में गड़े मुर्दे उखाड़ कर पुरानी बातों को बार-बार किसी को कहकर उन्हें आहत करना कोई अच्छी बात नहीं होती‌। बेहतर है कि हम बीती ताहि बिसार दें और आगे की सुध लें ।अपने रिश्तों को बेहतर बनाने के लिए आगे कदम बढ़ाएं।

स्व रचित

दिक्षा बागदरे


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