कुछ दिनों पहले की बात है।मेरी सहेली रश्मि अपने बेटे से मिलने बैंगलुरु आई हुई थी।मुझे फ़ोन करके बोली," कब आऊँ? " तब मैंने हँसते हुए कहा," आजा, लंच साथ करते हैं..हाॅस्टल वाली आलू-दही की सब्ज़ी बनाती हूँ।"
" अरे वाह! नाम सुनते ही मुँह में पानी आ गया।" वो चहक उठी थी।
चावल पकते ही कुकर की सीटी बजी और वो आ धमकी।दोनों सहेलियाँ गले मिले...विडियो काॅल पर तो एक-दूसरे को देखते ही रहते थे लेकिन सामने देखकर तू मोटी हो गई...तू स्लिम-ट्रीम ' यही कहकर अपनी खुशी ज़ाहिर की।पानी का गिलास उसे थमा कर मैं कुछ पूछती, उससे पहले ही वो फट पड़ी," यार..ये कैसी ठंड है जो लिंग-भेद करती है।"
" ठंड..लिंग-भेद...ये तू क्या कह रही है?" मैंने आश्चर्य-से पूछा।
तब वो बोली," कल मेरे बेटे का एक दोस्त मिलने आया था।कुछ परेशान था तो मैंने कारण जानना चाहा।तब बोला," आंटी..मेरी एक फ्रेंड है..उसे बहुत हेडेक( सिर में दर्द) हो रहा है..।" इत्तेफ़ाक़ से उस वक्त मेरे पर्स में सेरिडाॅन की दो टेबलेट थी। मैंने कहा," चलो..तुम्हारी फ़्रेंड को दवा दे आती हूँ और उसका हाल-समाचार भी पूछ लूँगी।"
" हाँ-हाँ चलिए आंटी..।" वो बहुत खुश हो गया था।मैं भी उत्साहित थी लेकिन जब उसे देखा तो...।"
" तो क्या? बहुत बीमार थी या...।" मैंने घबराते हुए पूछा।
" अरे नहीं...मैं तो उसके कपड़े देखकर दंग रह गई।उस लड़की ने ऊपर तो जैकेट पहन रखा था और नीचे हाफ़ पैंट। मुझे समझ नहीं आया कि ये कैसी ठंड है जो केवल शरीर के ऊपरी हिस्से में ही लगती है।वहीं मेरे बेटे का दोस्त फुल पैंट में था।यार..ये ठंड भी भेदभाव करती है क्या? लड़कों को लगती है और लड़कियों को नहीं..।मैंने तकरीबन सभी लड़कियों को ऐसे ही पहनावे में देखा है।कुछ तो...।" वो अपनी धुन में बोलती जा रही थी और मैं चुपचाप सुन रही थी।कैसे कहती कि ऐसे नज़ारे तो मैं रोज ही देखती हूँ।पहले अजीब लगता था लेकिन अब मेरी आँखें आदी हो गईं हैं।उसने पहली बार देखा, इसलिए चकित होना स्वाभाविक ही था।
उसका मन हल्का हुआ तब मैंने खाना परोसा और स्कूल टाइम की बातें छेड़ दी।फिर तो वो हँसते हुए उन्हीं दिनों की यादों में खो गई।
विभा गुप्ता
स्वरचित, बैंगलुरु
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