आठ आठ आँसू रोना

     माँ! टिफिन जल्दी दो.. मुझे देर हो रही है। गरीबों की बस्ती में घर घर जाकर उन्हें समझाना है.. राधिका टिफिन लेकर जल्दी से स्कूटी पर सवार होकर गंतव्य की ओर बढ़ गई.. इस राधिका पर तो समाज सेवा का भूत सवार है कहते हुए शंकुतला देवी घर के अंदर जाकर कुछ देर कुर्सी पर जाकर बैठ गईं आज उसके विद्यालय में अवकाश था... शांति के पलों में बैठते ही अतीत उनके सामने चलचित्र की तरह घूमने लगा..

        डॉक्टर सेंट के खिलौनों से खेलती हुई दस ग्यारह साल की मासूम राधिका कह रही थी.. पापा! आप ये गुटका, तम्बाकू, सिगरेट क्यों पीते हो ? आपके दांत कितने गंदे लगते हैं और होठ भी काले हैं। बार बार इधर उधर थूकते हो... देखना पापा जब मैं डॉक्टर बनूंगी तो किसी भी पापा को  गुटका सिगरेट, तम्बाकू नहीं खाने दूंगी... तब पापा कांतिलाल कहता- बेटा! तुम्हारा पापा नाइट सिफ्ट में काम करता है। रात भर जगने के लिए यह खाना पड़ता है... शब्दों और सोच के अभाव में नन्हीं राधिका पिता के इस बेबुनियादी तर्क का जबाव न दे पाती... और पिता की तनख्वाह का अधिकांश भाग इन दुर्व्यसऩों पर खर्च हो जाता।एक बार जब कांतिलाल बीमार पडा तब डॉक्टरों ने उसे इन सब दुर्व्यसनों से दूर रहने की सख्त हिदायत दी थी। परिवार में भी सबने बहुत समझाया, पर सब व्यर्थ था..समय बीतता गया..

         कुछ सालों बाद कांतिलाल के मुंह में फोडा हो गया। जांच से कैंसर का पता चला.. आपेरशन किया गया... घर की सारी जमा पूंजी पत्नी की सेविंग, मां बाप की भविष्य निधि, पुश्तैनी जमीन सब कुछ दुर्व्यसनों की बलि चढ़ चुका था। बेटी को  डॉक्टर बनाने का सपना भी  धूमिल नज़र आ रहा था। अस्पताल की खिड़की के कांच में अपना खुला मुंह, लटका मांस, मोटे मोटे होंठों वाला विकृत चेहरा देखकर कांतिलाल के मुख से चीख निकल गई... आठ आठ आँसू रोने के अलावा उसके पास अब कुछ और चारा न था। आज कांतिलाल पश्चाताप की आग जल रहा था .. काश! वह तब अपनी नन्ही बेटी और  डॉक्टरों की बात मान लेता तो उसे यह दिन न देखना पड़ता।

          शाम को राधिका ने चहकते हुए घर में कदम रखा .. माँ! ओ माँ! जल्दी से खाना दो.. जोरों की भूख लगी है... मां बोली -बेटा! तू पढाई करती है। समाज सेवा का  इतना काम क्यों  करती है ? माँ !मैने गरीबों की बस्ती में गुटका, तम्बाकू, सिगरेट पीने से होने वाले दुष्परिणाम का जो अभियान शुरू किया है उसमें मुझे कुछ हद तक सफलता मिलती दिखाई दे रही... मैं नहीं चाहती कि इन कुव्यसऩों के कारण किसी परिवार और बच्चों का भविष्य अंधकारमय हो जाए.. मैं पहले से ही उन्हें इसके दुष्परिणाम के लिए सचेत करना चाहती हूं... मेरे पिता की तरह किसी भी दुर्व्यसनों के आदी पिता को बाद में "आठ आठ आँसू रोना" पड़े... 

  अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद कांतिलाल ने  राधिका से कहा -बेटा! कुछ महीनों में  स्वस्थ होने के बाद मैं भी तुम्हारे इस अभियान से जुड़ना चाहता हूं। मेरा यह विकृत चेहरा देखकर लोगों को कुछ समझ आता है और अभियान में थोड़ी सी भी सफलता मिलती है,तो यह थोड़ा बचा जीवन सार्थक हो जायेगा... मां ! अब मेरे और पापा के जीवन का यहीं उद्देश्य है।डॉक्टर न बन सकी एक समाज सेविका बनकर भी बुरी लतों के दुष्परिणामों से अभिभावकों को सचेत कर सकती हूँ...इन कुव्यसनों के कारण उन्हें "आठ आठ आसूं न रोना" पड़े...


स्वरचित मौलिक रचना 

सरोज माहेश्वरी पुणे ( महाराष्ट्र)


एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ