“माँ जल्दी से अस्पताल आ जाओ… दादी की तबियत बहुत ख़राब है… वो बार बार तुम्हें याद कर रही है ।” कृति ने जैसे ही फ़ोन पर ये कहा नताशा जल्दी से अपना मोबाइल और बैग हाथ में लेकर कृति के अस्पताल की ओर भागी
अस्पताल के बिस्तर पर मनोरमा जी असहाय नज़र आ रही थी… क्षमा याचना उनके चेहरे पर व्याप्त था पर नताशा आज भी तटस्थ थी।
टूटे हुए शब्दों में मनोरमा जी नताशा से कहने लगी,” बहु अब ना बचूँगी… पर मुझे मुक्ति तब तक ना मिलेगी जब तक तू मुझे माफ ना करेगी…कृष और कृति में हमेशा पक्षपात करती रही काश जीते जी दोनों को एक आँख से देखती तो ना कृति से ना तुझसे नज़रें चुराने की ज़रूरत पड़ती… तुमने आज तक एक शब्द पलट कर ना कहें मुझसे पर आज तू बोल बहू नहीं तो मेरी आत्मा मुझे हमेशा झकझोरती रहेंगी ।”
“ क्या कहूँ माँ जी… सच तो यही है आपके उस व्यवहार ने मेरी बेटी को डॉक्टर बना दिया… पति के गुजर जाने पर मैंने हिम्मत कर काम पर निकलना शुरू किया…आज आपके उसी पक्षपात ने हमारी ज़िंदगी तो संवार दी पर कृष को देखो आपने क्या बना दिया ।” कमरे में एक कोने पर खड़े कृष की ओर देखती नताशा ने कहा जो नज़रें झुकाएँ खड़ा था
कमरे में उसके अलावा जेठ जेठानी भी थे जो आज नताशा से नज़रें नहीं मिला पा रहे थे ।
“ बहू ये पकड़…।” कहते हुए तकिये के नीचे से एक लिफ़ाफ़ा नताशा को देते हुए मनोरमा जी ने हमेशा के लिए आँखें मूँद ली
सब काम क्रिया सम्पन्न होने के बाद नताशा ने वो लिफ़ाफ़ा खोल कर देखा एक चिट्ठी लिखी थी..
“ बहू मुझे पता है तू मुझे कभी माफ़ नहीं कर पाएँगी… मैंने काम ही वैसे किए…मेरे दो ही बेटे….जब बड़े के बेटा हुआ मैं बहुत नाची….खुश थी मेरे घर का चिराग़ रौशन करने वाला आ गया… पर जब तेरे बेटी हुई… मानो मुझ पर व्रजपात हुआ… कृति के जन्म के साल भर बाद मेरा बेटा सड़क दुर्घटना का शिकार हो चल बसा… अब जो भी था वो कृष ही था…मुझे उससे ख़ास लगाव रहने लगा.. कृति और तू मुझे फूटी आँख ना सुहाती थी… उपर से तेरी जेठानी कान भरने में माहिर … मैं बस बहकावे में आती चली गई और उसको ही सर्वेसर्वा मान लिया…और परिणामस्वरूप तुम्हें घर से निकाल दिया… पर देख ना क़िस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था… कृष के कुकृत्य ख़त्म नहीं होते और कृति दिन पर दिन अपने स्कूल कॉलेज का नाम रौशन करने लगी….जब तबियत बिगड़ी सबने अस्पताल लाकर छोड़ दिया… यहाँ कृति मिली जिसने अपनी दादी की जी भर सेवा की… तू सामने नहीं आती थी पर मुझे पता है कृति से मेरी हर पल की खबर लेती थी… बहू मुझे माफ़ करना…।”
नताशा चिट्ठी एक तरफ़ रख कर बोली,” माँ मैंने आपको तभी माफ़ कर दिया था जब मैं घर से निकली … क्योंकि उस देहरी के भीतर आपने मेरा बुरा सोचा पर उसके बाहर निकल कर मैं खुद को साबित कर पाई उसके लिए कहीं ना कहीं आपको धन्यवाद देती हूँ …आप जहाँ रहे ख़ुश रहे मेरी तरफ़ से मन में कोई मलाल ना रखें।
स्वरचित
रश्मि प्रकाश
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