सोनल चाची जब शादी के बाद दुल्हन बनकर विदा होकर ससुराल आईं, तब मैं तो उनके चारों तरफ लट्टू-सी घूम रही थी।
टीनएज में प्रवेश करती लड़की के लिए दुल्हन का श्रृंगार आकर्षण का केंद्र होता ही है।
मुझे भी सोनल चाची के हाथ में ढेर सारी चूड़ियाँ, सोने के कंगन, कानों में झुमके, गले में हार और रोज़ बदल-बदल कर पहनी जाने वाली गोटा लगी साड़ियाँ बहुत पसंद थीं।
वो मेरी सगी चाची नहीं थीं।
पड़ोस वाले परिवार में बहू बनकर आई थीं।
मैं उनकी सास को ताई जी कहती थी क्योंकि हमारा और उनका परिवार वर्षों से अगल-बगल रह रहा था।
सोनल चाची को मैंने असली चाची की तरह ही माना क्योंकि मेरे पापा घर में सबसे छोटे थे और मेरी कोई चाची नहीं थी।
धीरे-धीरे मैंने देखा कि सोनल चाची जो पहले सज-धज कर रहती थीं, अब सामान्य और फिर बहुत साधारण वेशभूषा में रहने लगीं।
कारण साफ था – उनके घर के सारे काम वही करती थीं।
ताई जी की उम्र ऐसी नहीं थी कि कोई काम न कर सकें, पर उन्होंने लंबी-चौड़ी स्वस्थ बहू को देखते ही खुद को घर के कामों से रिटायर मान लिया।
आयुष चाचा गंभीर स्वभाव के थे।
पता चला कि वे अपनी पसंद से दूसरी जाति की लड़की से शादी करना चाहते थे, पर ताई जी नहीं मानीं।
इसका गुस्सा उन्होंने पत्नी को कभी प्यार और महत्व न देकर निकाला।
चाची की अपनी इच्छा घर में नहीं चलती थी।
अगर ताई जी या चाचा समझते तो उनके लिए नए कपड़े ला सकते थे, पर उन्होंने कभी ज़रूरत ही नहीं समझी।
इसलिए चाची पुरानी साड़ियों से काम चला रही थीं।
सुबह से शाम तक वे लगातार काम में लगी रहतीं।
चाचा को मशीन में धुले कपड़े पसंद नहीं थे, इसलिए चाची हाथ से कपड़े धोतीं।
ताई जी कहतीं –
“जब उनके कपड़े हाथ से धो रही हो तो सबके कपड़े हाथ से ही धो लिया करो।
बिजली-पानी भी बचेगा।”
भोजन के भी चटोरे थे चाचा।
दिन-भर तरह-तरह के व्यंजन बनते रहते।
चाची सुबह उठकर किचन में चली जातीं और सबको नाश्ता कराने के बाद ही खुद खातीं – तब तक 11 बज जाते।
न सफाई, न कपड़े धोने का काम खत्म होता और शाम के नाश्ते की तैयारी शुरू हो जाती।
नाश्ता भी कभी साधारण नहीं होता – कभी कचौरी, कभी पकौड़ी।
यहां तक कि घर में इतना सब कुछ पकने के बावजूद अगर चाची के मायके वाले आ जाते तो ताई जी का मुंह बन जाता और आयुष चाचा उनसे सीधे मुंह बात तक नहीं करते।
चाची उन्हें नाश्ता करातीं तो ऐसे लगता जैसे चोरी कर रही हों।
मुझे तो सबसे ज्यादा आश्चर्य तब हुआ जब एक दिन मोहल्ले के नल से पानी लाना पड़ा।
सोनल चाची ही बाल्टियाँ लेकर पानी ला रही थीं।
ज्यादातर घरों से पुरुष पानी ला रहे थे, पर आयुष चाचा सड़क से पानी लाना अपनी “शान” के खिलाफ समझते थे।
बाज़ार से राशन-पानी लाने की जिम्मेदारी भी उन्हीं की थी।
गर्मियों में छत पर चारपाई ले जाना, बारिश पड़ने पर नीचे उतारना – सब चाची ही करती थीं।
लगातार काम और आराम न मिलने से उनका शरीर कमजोर हो गया।
जब मायके वाले मिलने आए और डॉक्टर ने आराम करने को कहा, तो ताई जी बोलीं –
“हमने तो आपकी बेटी से शादी इसलिए की थी कि लंबी-चौड़ी है, मजबूत है।
पर वो तो इतनी कमजोर निकली।
बच्चा भी नहीं जचा सकी।
हमारा वंश भी नहीं बढ़ा सकती।
अब आप अपनी बेटी को ले जाइए।”
और फिर ताई जी ने जोड़ दिया –
“पर यहाँ का काम कौन करेगा?
इसलिए उसकी जगह नौकरानी भेज दीजिए।”
मैं गुस्से से भर गई।
पर मम्मी ने शांत किया और समझाया कि सोनल चाची का मायका बहुत रूढ़िवादी है।
वे लड़कियों के ससुराल में दखल नहीं देते।
अच्छे पैसे वाले हैं, चाहें तो बेहतर रिश्ता कर सकते थे, पर उन्होंने जाति-पांति देखकर ही शादी कराई।
बेटी को मायके में रखना उनकी “बदनामी” मानी जाती।
चाची मायके जाकर स्वस्थ हुईं और फिर लौट आईं।
उन्होंने फिर सब काम संभाल लिया।
इस बार भगवान ने दया की और बेटे को जन्म दिया।
ताई जी बहुत खुश हुईं, दावत दी गई।
पर निराशा हुई जब देखा –
इतने बड़े मौके पर भी चाची ने अपनी शादी की पुरानी साड़ी ही पहनी थी।
बेटा होने से उनका महत्व थोड़ा बढ़ा, पर हालात जस के तस रहे।
रात भर बच्चा रोता तो उन्हें डांट पड़ती –
“इसे बाहर ले जाओ, मेरी नींद खराब हो रही है।”
एक दिन चाची के भाई आए।
वे बिज़नेस कर रहे थे और खूब तरक्की कर चुके थे।
सबके लिए ढेर सारे कीमती तोहफे लाए।
ताई जी और आयुष चाचा उनकी तारीफ करते नहीं थक रहे थे।
कुछ ही समय बाद चाचा ने फ्लैट खरीदने का मन बनाया।
उन्होंने चाची से कहा –
“अपने भाई से जाकर रकम माँगो।”
चाची ने इंकार किया तो बोले –
“तुम तो मामूली शक्ल-सूरत की लड़की हो।
नाजुक भी नहीं हो।
मैं कितनी मजबूरी से तुम्हें निभा रहा हूँ।
मुझे भी बदले में कुछ मिलना चाहिए।”
चाची को जैसे काट खा गया।
अब तक जी-जान लगाकर उन्होंने ससुराल निभाया था।
आज पति के मुँह से सुनना पड़ा कि वे सिर्फ मजबूरी से निभाई जा रही हैं।
वे पहली बार चीख पड़ीं –
“आप से शादी करके मैंने अब तक सिर्फ समझौते किए हैं और आगे भी कर लूँगी।
लेकिन अपना आत्मसम्मान बेचने के लिए तैयार नहीं हूँ।
आप जाकर खुद माँग लीजिए, पर मैं अपने भाई के सामने हाथ नहीं फैलाऊँगी।”
उनकी तेज आवाज सुनकर ताई जी भी आ गईं।
मम्मी और मैं भी वहाँ पहुँच गए।
सोनल चाची जोर-जोर से रो रही थीं।
सालों का दबा दर्द आंसुओं से फूट पड़ा था।
आज ताई जी और चाचा के चेहरे से “सभ्य, संस्कारी और कुलीन” होने का पर्दा हट चुका था।
सोनल चाची के पापा ने अपनी बेटी का विवाह “कुल-गोत्र” देखकर किया था,
पर आज सबको साफ हो गया कि असल मायने तो बेटी की खुशी और इज्ज़त के होते हैं।
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