दिल्ली निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन पर आकृति का पूरा परिवार खड़ा ट्रेन का इंतजार कर रहा था.... आकृति सोच रही थी ....कल दिवाली है पूरे कॉलोनी के घरों में गोबर की लिपाई , लड़ियों की सजावट , रंगोली...... पर मेरा घर सूना सूना होगा......। आकृति पिछले दिवाली की याद कर रही थी....
बाप रे.. इतना सा गोबर लगाने का ₹200 लेगी.... तू भी ना मुन्नी बाई..... मालकिन दिवाली का त्यौहार है इसमें तो लूंगी ही..... मुन्नीबाई से हर वर्ष इसी तरह की मीठी नोकझोंक होती थी...।
इस वर्ष ठीक दिवाली से पहले आकृति का ओपन हार्ट सर्जरी हुआ और दिवाली के दो दिन पहले ही मेदांता से छुट्टी मिली ......रास्ते भर अपने घर की सुनी सुनी सी दिवाली के ख्यालों में खोई आकृति जैसे ही घर पहुंची और देखा .......आंगन गोबर से लिपापोता साफ सुथरा और कुछ दीये भी रखे थे...... आकृति आश्चर्य से देख रही थी.... तभी कॉलोनी वालों ने बताया.... मुन्नी बाई ने सबसे पहले कॉलोनी में आपके घर की सफाई कर गोबर लगाया है.... आकृति ने सोचा बिना नोकझोंक ...स्वार्थ रहित सहायता ....... वह भी मेरे ना रहने पर.... वाकई मुन्नी बाई का दिल मुझसे भी बड़ा निकला.... मन कृतज्ञता से तो भर गया पर कहीं ना कहीं ...हर वर्ष के मोल भाव वाले प्रसंग पर बहुत लज्जित भी हुई...!
श्रीमती संध्या त्रिपाठी
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