एक रात की दुल्हन

 मां सारी रात लम्बे-लम्बे दीर्घ श्वास खींचती रहती थी। जिस दिन से सोमेश यानि उसके पिता लन्दन चलेे गए थेे। मां की आंखों की नींद ग़ायब हो गई थी। उसको उसके पिता ने बहुत बड़ा धोखा दिया था। वह मां को बीच मझधार छोड़ कर विदेश चलेे गए थेे। मां इस सदमे से उबर नहीं सकी थी। मायूसी और निराशा ने उसके स्वास्थ्य पर भी गहरा असर डाला था। दिन के समय में भी वह खोई-खोई रहती थी। रात भर जागने के कारण उसकी उलझनें काफ़ी बढ़ती जा रही थी। वह उस विश्वासघाती आदमी को कैसे भुुला सकती थी जिसने उसे पाने के लिए लाख खुशामदें की थी। आगे पीछे एक भंवरे की तरह कली पर मंडराने का संकल्प लिया था। वह मां के आगे-पीछे दीवानों की तरह घूमता। हर वक़्त उसके अग़ल-बग़ल चक्कर काटा करता था। यह रहस्य मां ने ही रजत को बताया था। बात उन दिनों की है जब वह कॉलेज में पढ़ा करती थी। कॉलेज जाने के लिये वह बस अड्डे पर खड़ी होकर बस का इंतज़ार करती थी। सोमेश भी उसके पीछे-पीछे बस स्टैंड पर पहुंच जाता था। वह भी उसके मुहल्ले में रहता था। वह कनखियों से रेशमा की (मां की) सूरत को निहारता रहता था। बस के आते ही मां अपने लिए रखी गई एक ख़ाली सीट पर बैठ जाती थी। सोमेश चाहता था कि वह उसके साथ बस में बैठे परन्तु वह ऐसा नहीं कर सका था। रेशमा के साथ एक अन्य लड़की नेहा ने उसके लिये सीट रखी होती थी। सोमेश हाथ मल कर रह जाता था।

बस से उतर कर भी वह उनके पीछे-पीछे ही चलता रहता था। बातें करते-करते रेशमा और नेहा कॉलेज के आंगन में प्रवेश कर जाती थी।

कॉलेज में जब कभी रेशमा और सोमेश का आमना-सामना होता तो वह रेशमा को कहता आप बहुत सुन्दर लगती हैं। रेशमा कोई जवाब नहीं देती थी। वह अनसुना करके आगे बढ़ जाती थी।

सोमेश की ख़ासियत यह थी कि वह अन्य छात्राओं की मौजूदगी में रेशमा को कुछ नहीं कहता था। जब कभी अकेली होती तो उसकी सुन्दरता को एक परी की संज्ञा देता। उसको मृगनयनी और मेनका कहता। इसके अतिरिक्त वह कोई नई फबती या फूहड़ बात नहीं करता था। एक दिन जब सोमेश ने उसे परियों की रानी कहा तो वह मुस्कुरा पड़ी जवाब में उसने उत्तर दिया कमेेंट के लिये शुक्रिया।

बस फिर उस दिन से मेल-मिलाप होने लगा। रेशमा का दिल पिघल गया था। सोमेश उसे अच्छा लगने लगा था। दोनों एक-दूसरे पर जान छिड़कने लगे। वादों-कसमों के बीच वेे दोनों प्रेम के हिंडोल पर उड़ने लगे।

परिणाम यह निकला कि अब तो दोनों की आंखें एक-दूसरे को देखने के लिये तरसने लगी थी। जिस दिन दोनों में से एक कॉलेज से अनुपस्थित होता दूसरा उसके लिये बेचैन हो उठता था। अब तो दोनों में प्रेम की खिचड़ी पकने लगी थी। दोनों की धड़कनें एक-दूसरे को मिलने के लिये आतुर रहती थी।

परन्तु संयोग की यह क्रिया ज़्यादा दिन नहीं चली। सोमेश ने पॉलिटेक्निक के डिप्लोमा के लिये मैकेनिकल इंजीनियरिंग का फार्म भरा हुआ था। उसकी सिलेक्शन हो गई थी इसलिये वह लुधियाना चला गया था।

विरह वेदना तो सोमेश की भी थी परन्तु रेशमा कुछ ज़्यादा ही व्याकुल थी। दोनों तरफ़ आग के शोले उठ रहे थे परन्तु मजबूरी थी। दोनों ने जीने मरने की कस्में खा रखी थी इसलिए प्यार की प्यास में और इज़ाफ़ा हुआ था।

डिप्लोमा प्राप्ति के बाद सोमेश ने रेशमा के घर वालों से रेशमा का हाथ उसको देने का आग्रह किया था। यह बात सुनते ही रेशमा के मां-बाप भड़क उठे थे। वे सारस्वत ब्राह्मण एक रामगढ़िया लड़के के साथ विवाह कैसे कर सकते थे उन्होंने साफ़ इंकार कर दिया था। सोमेश ने कहा कि वे एक बार रेशमा से पूछ कर देख लें वह इंकार कर देगी तो मैं अपनी ज़िद्द से पीछे हट जाऊंगा।

रेशमा के पिता ने कहा “भला लड़कियों से पूछ कर शादी होती है, शादी का फ़ैैसला तो बुज़ुर्ग करते हैं।”

दाल गलती न देखकर सोमेश गांधीगिरी पे उतर आया। उसने रेशमा के घर के सामने बैठकर भूख हड़ताल शुरू कर दी। शहर में इस भूख हड़ताल की चर्चा होने लगी।

आनन-फ़ानन में रेशमा के पिता ने पुलिस को रिपोर्ट कर दी। थानेदार दो सिपाहियों को लेकर आ धमका। थानेदार ने डंडा लहराते हुये कहा “ओए मजनू की औलाद यहां से उठकर जाता है कि नहीं? या थाने ले जाकर तेरी आशिक़ी का भूत उतारें।”

सोमेश भी उसी आवाज़ में बोला “थानेदार साहिब यदि मुझसे ज़ोर ज़बरदस्ती की तो मैं ज़हर निगल कर आत्महत्या कर लूंगा,” उसने सल्फास की गोलियां जेब से निकालकर थानेदार को दिखाते हुए कहा।

पता नहीं उसमें ऐसी क्या बात थी कि थानेदार पीछे हट गया। उसने रेशमा के पिता को कहा “भई तुम ही संभालो इसे और हो सके तो समझदारी से बात निपटाओ।” वह सिपाहियों सहित वापिस चला गया।

तमाशबीन लोगों के लिये यह तमाशा था परन्तु भीड़ में कुछ भद्र-पुरुष भी थे। उन्होंने सुरिन्द्र नाथ पंडित को समझाया, “यदि लड़के ने आत्महत्या कर ली तो आपको लेने के देने पड़ जायेंगे। जब मियां बीवी राज़ी तो क्या करेगा काज़ी। बेहतरी इसी में है कि दोनों की शादी कर दो। यह जात-पात का कट्टरपन छोड़ो। इसी में आपकी भलाई है।”

न चाहते हुये भी सुरिन्द्र नाथ ने रेशमा का विवाह सोमेश से कर दिया था और सोमेश रेशमा को अपने घर ले आया था।

सोमेश रेशमा को घर क्या लाया उसकी मां को तो सांप ही सूंघ गया था। बिना दहेज के दुल्हन का सत्कार वह कैसे करती। वह तो सोने-चांदी के अतिरिक्त लग्ज़री सामान भी घर आने की आस लगाये बैठी थी। कार, एल.ई.डी का तो आम ज़माना था। वह तो ढेर सारा धन भी चाहती थी।

रेशमा ज्यूं ज्यूं अपना कर्त्तव्य निभाने हेतू घर के सदस्यों का इज़्ज़त मान करने का प्रयत्न करती और गृहकार्य भी स्वयं ही निपटाने का प्रयत्न करती त्यूूं-त्यूूं सासू मां के ताने-मेहने बढ़ते जाते। जब देखो तब बुरा-भला कहती बुुुुुुुुुदबुदाने लगती। एक महीने में ही उसने सोमेश और रेशमा के नाक में दम कर दिया था। पानी सिर से ऊपर जा रहा था इसलिये सोमेश ने शहर में अलग किराये का मकान ले लिया था।

उसका सितारा अच्छा चल रहा था। सोमेश को शहर की होज़री की फ़ैैक्टरी में इंजीनियर की नौकरी मिल गई थी। यह उसके लिये सौभाग्य की बात थी कि रेशमा को भी आंगनवाड़ी अध्यापिका चुन लिया गया था।

अच्छी खासी गृहस्थी चलने लगी। रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में कोई कठिनाई नहीं थी। घर को ताला लगाकर दोनों अपनी-अपनी ड्यूटी पर चले जाते थे।

समय की गति के साथ दो वर्ष के बाद उनके घर पुत्र रत्न का यानि रजत का जन्म हुआ था। उन्होंने बेटे का नाम रजत रखा था। घर में हर प्रकार की सुविधा के कारण रजत हर्षोल्लास से पलने लगा था। सोमेश अब धनवान होने की लालसा में विदेश जाना चाहता था। उसने एक निजी कम्पनी गैलेेक्सी ऑफ इंग्लैण्ड में आवेदन किया हुआ था। कम्पनी ने उसकी योग्यता को देखते हुए आने का ऑफ़र दे दिया था। सोमेश के लिये इससे अधिक खुशी की बात क्या हो सकती थी। उसने इंग्लैण्ड का वीज़ा लगवा लिया था। वहां जाकर वह अपार धन कमाएगा। कम्पनी ने दो लाख का वेतन मुकर्रर किया था। रेशमा का मानना था कि अच्छी खासी ज़िन्दगी गुज़र रही है विदेश जाने की क्या आवश्यकता है परन्तु सोमेश पर अमीर बनने की धुन सवार थी इसलिये वह रजत और रेशमा को अकेले छोड़ कर चला गया।

कम्पनी की तरफ़ से उसे फ़्री एकमोडेशन मिल गई थी। उसकी आठ घण्टे की ड्यूटी थी इसके अतिरिक्त वह ओवर टाईम भी लगा लेता था। वेतन के इलावा उसकी कमाई में इज़ाफ़ा हो रहा था। जहां वह रहता था वहां जीवन की हर सुविधा विद्यमान थी। टेलीविज़न, कम्प्यूटर, लेपटॉप, टेलीफ़ोन, मोबाइल फ़ोन सब कुछ वह इस्तेमाल कर सकता था।

इसके विपरीत रेशमा बड़े संकट में थी। रजत को संभालना, ड्यूटी पर जाना और घर के अन्य कार्यों में लिप्त रहना बड़ा कष्ट उठाना पड़ रहा था। बेशक उसने रजत की देखभाल के लिए एक आया का प्रबन्ध कर लिया था। परन्तु फिर भी वह अपने आप को मुसीबत में घिरा अनुभव कर रही थी। सोमेश टेेलीफ़ोन द्वारा घर का हाल-चाल पूछ लेता था। रेशमा सकारात्मक ही उत्तर देती थी। पैसे की कोई डिमांड नहीं करती थी फिर भी वह उसके बिन कहे उसे हर एक दो महीने के बाद कुछ विदेशी पौंड भेज देता था जिसे वह भारतीय करंसी में बदल लेती थी।

सोमेश 3 वर्ष के बाद वतन वापिस लौटा था। वह अपने साथ ढेर सारा धन कमा कर लाया था। बढ़िया-बढ़िया पोशाकें तथा रजत के लिये इलेेक्ट्रिक खिलौने लाया था। उसे एक महीने की छुट्टी मिली थी। इस एक महीने में उसने रेशमा को खूब रमणीय स्थानों की सैर करवाई थी। रजत अब चलने फिरने और बातें करने लग गया था। उसे प्री नर्सरी स्कूल में दाख़िल करवा दिया गया था। किराये का मकान छोड़ कर एक पन्द्रह-लाख का छोटा सा फ्लैट भी ख़रीद लिया था। जितने दिन वह घर पर रहा घर में स्वर्ग जैसा माहौल था। छुट्टी समाप्त होते ही उसने इंग्लैण्ड लौटने की तैयारी कर ली थी। एयरपोर्ट तक रेशमा रजत को साथ लेकर उसे विदा करने आई थी। रजत और रेशमा को गले लगाने के उपरान्त उसने फ्लाइट पकड़ ली थी और पलों में रेशमा की दृष्टि से ओझल हो गया जबकि रेशमा अभी भी हाथ हिलाकर उसका अभिवादन कर रही थी। उसको क्या पता था कि जिस पति को वो अपनी जान से अधिक चाहती है वह इंग्लैण्ड जाकर अब उसको अपने ज़ेेहन से निकाल कर दूर फेंक देगा। यह उसकी कल्पना से भी परे की बात थी। परन्तु भलेमानस और जैंटलमैन की जब फ़ितरत बदल जाए तो ऐसा होना अतिशयोक्ति नहीं रहती।

इस बार जब सोमेश इंग्लैण्ड गया तो उसकी सोफिया से आंखे चार हो गई। सोफिया कमाल की खूबसूरत हसीना थी। श्वेत वर्ण हसीना गोरे सेब जैसे गाल, उभरता वक्ष, सुराहीदार गर्दन, पतली कमर और मोटी-मोटी आंखे जिसमें मदिरा झलकती थी सोमेश पर जादू करने के लिये काफ़ी थी।

सोमेश सोफिया के अपार्टमैंट में एक शर्ट ख़रीदने के लिये गया था। उस अपार्टमैंट में और भी कई अन्य लड़कियां थी मगर अपनी मैनेजर की चारों तरफ घूमने वाली चेयर पर बैठी सोफिया उसके मन को भा गई थी। बातों-बातों में उससे मुलाक़ात क्या हुई कि सोफिया सोमेश की जवानी पर फ़िदा हो गई। मिलने-जुलने का सिलसिला ऐसा बढ़ा कि हर पार्क, होटल और क्लब के हाल में वे थिरकते हुए दिखाई देने लगे। जब आदमी की मति भ्रष्ट होती है तो वह सारे रिश्ते-नातों को ताक पर रख देता है। वह इश्क में अन्धा हो चुका था। मस्तिष्क का प्रयोग करने की बजाए मन के घोड़े पर सवार हो चुका था। इस मन के घोड़े की सवारी का परिणाम यह हुआ कि सोफिया और सोमेश ने एक चर्च में जाकर शादी कर ली। वह यह भूल गया कि वह पहले ही शादी-शुदा है और उसका एक फूल जैसा बच्चा भी है। वह सोफिया के प्रेमपाश में ऐसा फंसा कि उसको रेशमा और रजत की परवाह तक नहीं रही। वह दिन रात सोफिया की बाहों में खोया रहता। सोफिया भी सोमेश से चिपक गई थी।

उसने रेशमा और रजत को विस्मृत कर दिया। वह सिर्फ़ और सिर्फ़ सोफिया की रंगीन दुनियां में खो गया। उसने अपने घर न कोई पत्र डाला न फ़ोन किया। और न ही कुछ प्रेषित किया। एक वर्ष, दो वर्ष, पांच वर्ष और इसी तरह 18 वर्ष बीत गये सोमेश का कोई संदेश नहीं आया। घर की सुध लेने की उसने ज़रूरत ही नहीं समझी। वह सोफिया के साथ अपना नया घर बसा चुका था। इन 18 वर्षों में उसे इंग्लैण्ड की नागरिता भी मिल गई थी। वह इंग्लैण्ड का स्थायी नागरिक बन गया था।

इधर सोमेश का इंतज़ार करते-करते रेशमा की आंखें पक गई थी। उसका चेहरा मुरझाने लगा था। सिर के बालों में कहीं-कहीं सफेदी झलकने लगी थी। वह जुदाई और तन्हाई में टूटने लगी थी। उसे सोमेश से ऐसे विश्वासघात की उम्मीद नहीं थी इसलिए वह अन्धेरे दुख की छाया में डूबने लगी थी। हालांकि उसका रजत 21 वर्ष का होकर एक सरकारी स्कूल में क्लर्क हो गया था जो उसकी दिन रात सेवा में लगा रहता था। फिर भी पति की बेवफाई और बेहयाई अन्दर ही अन्दर खाये जा रही थी। इस अधेड़ उम्र में उसे पति की ज़रूरत थी पर वह तो रेशमा के प्यार से मुंह मोड़ चुका था। रजत से मां का दर्द देखा नहीं जा रहा था। वह कुछ नया सोच रहा था। सोमेश को सबक सिखाने के लिए, जैसे को तैसा करने के लिए और इसके साथ ही समाज को नई दिशा प्रदान करने का सोच रहा था। उसने सोचा क्यूं न मां की दूसरी शादी कर दी जाए? यही उचित रहेगा। और फिर उसने अपने मन की मंशा मां को प्रकट कर दी थी।

मां सुनकर हक्की बक्की रह गई। उसने डांटते हुए कहा “अरे निर्लज्ज यह सोच तुम्हारे दिमाग़ में आई कैसे? समाज में मेरी नाक कटवानी है क्या?”

“भाड़ में जाए समाज। समाज का इसमें क्या नुक़सान होता है? पुरुष एक दो तीन जितनी मर्ज़ी बीवियों को तलाक़ दे डाले और नया विवाह करवा ले तब कहां होता है समाज? औरत पर पाबन्दी क्यूं है? क्यूं वह घुट-घुट कर मरती है? मैं आपका दु:ख नहीं देख सकता इसलिये आपको मेरी बात मानकर पुनर्विवाह करना होगा।”

“नहीं हरगिज़ नहीं? ऐसा ख़्याल मन में फिर मत लाना रेशमा ने क्रोधित होकर कहा।”

बात बनती न देखकर रजत ने अपने दोस्त अमर से बात की कि वह मां को समझाए। अमर पहले तो मुकर गया परन्तु जब रजत ने बार-बार ताकीद की तो वह मान गया।

उसने रेशमा को कहा “आंटी अब रजत अपने पांव पर खड़ा हो गया है। वह शादी करके अपना घर बसा लेगा। आपको अपने बारे में सोचना चाहिये। बुढ़ापे में पति-पत्नी एक दूसरे का सहारा होते हैं। बीमार होने की स्थिति में एक-दूसरे से बेपर्दा सिर्फ़ आपस में ही हो सकते हैं। इसलिए रजत की बातों में दम है, प्लीज़ मान जाओ।”

“ओए बेईमानों, गर्क जानियो यह मुझसे तुम क्या कह रहे हो।”

“जो ठीक है वो ही करवाना चाह रहे हैं।” और आख़िरकार उनकी कोशिश रंग भी ले आई।

“मान गई अम्मा मान गई,” वे दोनों घर से बाहर निकल गये थे।

रजत ने अख़बार में विवाह के लिए मैट्रिमोनियल दिया था। एक 48 वर्षीय महिला जिसको उसका पति छोड़कर इंग्लैण्ड में बस गया है, एक भद्र पुरुष जिसकी आयु 50 वर्ष हो तथा उसका कोई बच्चा न हो शीघ्र शादी की ज़रूरत है।फ़ोन ……..पर सम्पर्क करें।

रेलगाड़ी के हादसे में जीवन का सारा परिवार मारा गया था। वह क़िस्मत से बच गया था। वह अब अकेलेपन का दर्द भोग रहा था। अख़बार के विज्ञापन को पढ़कर उसने टेलीफ़ोन पर अपनी स्वीकृति दे दी थी। और फिर इस तरह बात आगे बढ़ी थी। कुछ ही मुलाक़ातों के बाद बात पक्की हो गई थी।

फिर क्या था रजत ने विवाह के लिये निमंत्रण पत्र छपवा लिये थे। रेशमा वेडस जीवन।

अब वह निकट सम्बंधियों और जाने पहचाने लोगों को मिठाई के डिब्बों सहित निमंत्रण पत्र दे रहा था। पहले तो लोग यह समझ रहे थे कि उसके विवाह का न्यौता होगा परन्तु कार्ड पर छपे नाम को देखकर वे बुरी तरह से चौंके थे।

इस विवाह की शहर में खूब चर्चा हुई। किसी बेटे ने मां की शादी पहली बार रचाई थी। आलोचना समालोचना लोग करते रहे। मंत्रोच्चारण हुआ सात फेरों के उपरान्त रेशमा और जीवन विवाह बन्धन में बंध गये।

विदाई के समय रजत फूट-फूट कर रोया था परन्तु उसे सन्तोष था कि उसकी मां सुख-भोग की ओर बढ़ रही है।

-गोपाल शर्मा फिरोज़पुरी


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