सोने का हार

 सावित्री दुल्हन बन बैठी अपनी बारात का बेसब्री से इंतज़ार कर रही थी।

शीशे में गौर से अपने को देखा – लाल रंग का शादी का कपड़ा, खुद का सिला हुआ, जिसमें उसने अपने हाथों से सुनहरे बेल-बूटे बनाए थे और गोटे की किनारियाँ लगाई थीं।

पिता सिलाई का काम करते थे, साथ रहकर वह भी सिलाई–कढ़ाई में बहुत निपुण हो गई थी।
बारात आई, सात फेरे हुए, सात वचन लिए और सावित्री दुल्हन बनकर राजेश के घर विदा होकर आ गई।

राजेश के घर उसकी सास का देहांत हो चुका था। राजेश छोटी सी किराने की दुकान में काम करता था। छोटा सा परिवार था, आराम से खर्च चल जाता था।
मुंह दिखाई में चांदी के कंगन पहना दिए।

पड़ोस की बहुत सी महिलाएँ मुंह दिखाई के लिए आई थीं। जैसे ही सीमा भाभी ने सावित्री का घूंघट हटाया, सावित्री की नज़र सीमा भाभी के गले में लटकते ज़ेवर पर गई। उसकी आँखें ठहर सी गईं और उस पर रश्मि होती चली गईं।

पर सावित्री का सुख-चैन तो बस सीमा भाभी के हार के साथ ही चला गया।

शादी को थोड़ा समय गुज़रा। एक दिन मौका देखकर सावित्री ने राजेश से कहा –
“बहुत अकेलापन लगता है। आप मेरे लिए सिलाई मशीन ला दीजिए। मैं अच्छी सिलाई कर लेती हूँ। समय भी कट जाएगा और चार पैसे भी घर में आ जाएंगे।”

पहले तो राजेश ने मना किया, पर सावित्री के बार-बार आग्रह करने पर उसने मशीन लाकर दे दी।
फिर तो सावित्री ने ना दिन देखा, ना रात। मशीन की तरह वह चलती रही।
ना होश था, ना खबर।

बच्चे भी भगवान ने दिए नहीं। कोई इलाज के लिए कहता तो वह पैसा खर्च होने के डर से बहाना बना देती और डॉक्टर के पास नहीं जाती।
सास का भी देहांत हो गया।
वह मशीन के पहिए की तरह घूमती रही, बेखबर।

एक दिन उसने अपनी सारी जमा-पूंजी निकालकर गिने।
गिनने के बाद उसके होठों पर मुस्कुराहट आ गई।
जल्दी से सुनार के पास गई और अपनी पसंद का हार बनवा दिया।

जब तक हार बनकर नहीं आया, उसकी बेकरारी और भी बढ़ चुकी थी।
दरवाजे पर दस्तक हुई।
खोला तो सुनार था – मखमल का लाल डब्बा।

उसके अंदर सोने का चमचमाता खूबसूरत सा लड़ी हार था।
सावित्री की आँखों से खुशी के आंसुओं की बरसात होने लगी।

वह झट पड़ोस में गई और छोटा सा आईना मांग लाई।
राजेश को सामने बिठाया और उसे आईना पकड़ा दिया।
मखमल के डिब्बे को आहिस्ता से खोला, उसमें से हार निकाला और अपने गले में धड़कते दिल से पहन लिया।

“आँखें खोलो, क्यों मज़ाक कर रहे हो आप? आईना मेरे सामने से क्यों हटाया? मुझे मेरा हार देखना है। यह आईना किसे दिखा रहा है?”

राजेश का गला भारी हो गया। उसने आईना सावित्री को पकड़ा दिया और पीठ करके खड़ा हो गया।

सावित्री को कुछ समझ नहीं आया।
उसने अपने को आईने में देखा तो विश्वास नहीं कर पाई और चिल्लाकर ज़ोर से रो पड़ी।

आईने में झुर्रियों से भरे चेहरे वाली, सफ़ेद हो चुके बालों वाली एक वृद्धा दिख रही थी।
विश्वास से उसने राजेश की तरफ देखा।

राजेश ने आँसुओं से भरी आँखों से स्वीकृति में सिर हिला दिया।

पर उम्र जा चुकी थी।
चाहतें थीं, पर वे अब जुनून की हद तक थीं।

“अगर ज़िंदगी रही तो सारी चाहतें पूरी हो जाएँगी…
अगर ज़िंदगी ही नहीं रही, तो…?”


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