"साहिल, तुमने कभी उस पुराने खंडहर को ध्यान से देखा है?" नीरा ने अचानक पूछा, अपनी कॉफी का कप टेबल पर रखते हुए।

हम दोनों कैफे की खिड़की के पास बैठे थे। बाहर बारिश हो रही थी, वैसी ही बारिश जैसी उस दिन हो रही थी जब मैं पहली बार नीरा से मिला था। नीरा, जो हमेशा अपनी ही दुनिया में खोई रहती थी, आज कुछ ज़्यादा ही गंभीर लग रही थी।

"कौन सा खंडहर?" मैंने पूछा, हालांकि मुझे पता था कि वह शहर के बाहरी इलाके में स्थित उस पुरानी हवेली की बात कर रही है जिसे लोग 'भूतहा' कहते थे।

"वही... जिसे सब 'शापित हवेली' कहते हैं," नीरा ने धीरे से कहा, उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी। "मुझे लगता है वो मुझे बुला रही है।"

नीरा और मैं पिछले पाँच सालों से दोस्त थे। हम दोनों इतिहास के छात्र थे और पुरानी इमारतों, किंवदंतियों और रहस्यों में हमारी गहरी रुचि थी। नीरा हमेशा से ही थोड़ी अलग थी। वह अक्सर कहती थी कि उसे सपने में पुरानी जगहें दिखाई देती हैं, ऐसी जगहें जहाँ वह कभी गई ही नहीं। मैं उसकी बातों को हँसी में टाल देता था, यह सोचकर कि यह उसकी कल्पना की उड़ान है। लेकिन आज, उसकी आवाज़ में एक गंभीरता थी जिसने मुझे चौंका दिया।

"नीरा, तुम फिर से शुरू हो गईं," मैंने हँसने की कोशिश की। "वो बस एक पुरानी, टूटी-फूटी इमारत है। वहाँ कोई नहीं जाता।"

"इसीलिए तो हमें जाना चाहिए," नीरा ने ज़िद की। "मुझे लगता है वहाँ कुछ है... कुछ ऐसा जो सिर्फ मैं देख सकती हूँ।"

उसकी ज़िद के आगे मुझे झुकना पड़ा। अगले दिन रविवार था, और हमने तय किया कि हम उस हवेली को देखने जाएंगे।

हवेली शहर से काफी दूर, एक घने जंगल के बीच स्थित थी। वहाँ पहुँचते-पहुँचते शाम हो गई। सूरज ढल रहा था और हवेली की परछाईं लंबी और डरावनी लग रही थी। लोहे का जंग लगा गेट हवा में झूल रहा था।

"साहिल, देखो," नीरा ने हवेली की ओर इशारा किया। "ये खिड़कियाँ... मुझे याद हैं। मैंने इन्हें सपने में देखा है।"

हम धीरे-धीरे अंदर दाखिल हुए। हवेली के अंदर धूल और जालों का साम्राज्य था। हर कदम पर लकड़ी के फर्श चरमरा रहे थे। नीरा बिना किसी डर के आगे बढ़ रही थी, जैसे उसे रास्ता पता हो। वह सीधे ऊपर की मंज़िल पर गई और एक बड़े से कमरे के सामने रुक गई।

"ये कमरा..." नीरा ने कांपती आवाज़ में कहा। "यहाँ कुछ हुआ था।"

कमरे का दरवाज़ा आधा खुला था। अंदर एक पुरानी, धूल से भरी पेंटिंग टंगी थी। पेंटिंग में एक खूबसूरत महिला थी, जिसकी आँखें बिल्कुल नीरा जैसी थीं।

"ये कौन है?" मैंने पूछा, पेंटिंग के पास जाकर।

"ये 'रूहानी' है," नीरा ने फुसफुसाते हुए कहा। "इस हवेली की मालकिन।"

मैं हैरान था। "तुम्हें कैसे पता?"

"मुझे सब याद आ रहा है, साहिल," नीरा की आँखों में आँसू थे। "मैं ही रूहानी हूँ।"

मुझे लगा नीरा मज़ाक कर रही है या शायद माहौल का असर है। "नीरा, चलो यहाँ से। ये जगह ठीक नहीं है।"

"नहीं, साहिल। मुझे अपनी कहानी पूरी करनी है," नीरा ने कहा और पेंटिंग के नीचे रखे एक पुराने संदूक को खोलने लगी। संदूक में कुछ पुरानी डायरियां और खत रखे थे। नीरा ने एक डायरी उठाई और पढ़ने लगी।

डायरी 1920 की थी। रूहानी ने उसमें अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी के बारे में लिखा था। वह एक जमींदार की बेटी थी और उसे कविताएं लिखने का शौक था। लेकिन डायरी के पन्नों में एक दर्द भी छिपा था। रूहानी को किसी 'आर्यन' से प्यार था, जो एक साधारण चित्रकार था।

"आर्यन..." नीरा ने नाम पढ़ा और मेरी तरफ देखा। "साहिल, क्या तुम्हें कुछ महसूस नहीं हो रहा?"

मुझे अजीब सा लगा। आर्यन नाम सुनकर मेरे दिल की धड़कन तेज़ हो गई थी।

नीरा ने पढ़ना जारी रखा। रूहानी और आर्यन का प्यार परवान चढ़ रहा था, लेकिन उनके परिवार इसके खिलाफ थे। जमींदार ने आर्यन को शहर छोड़ने की धमकी दी। आर्यन ने रूहानी से वादा किया कि वह एक दिन बड़ा कलाकार बनकर लौटेगा और उसे ले जाएगा।

"लेकिन वो कभी नहीं लौटा," नीरा ने डायरी बंद कर दी। "रूहानी इंतज़ार करती रही। और अंत में, इसी कमरे में उसने अपनी जान दे दी।"

कमरे में सन्नाटा छा गया। बाहर हवा तेज़ हो गई थी और खिड़कियाँ खड़खड़ाने लगी थीं।

"साहिल, रूहानी को लगता था कि आर्यन ने उसे धोखा दिया," नीरा ने मेरी आँखों में देखते हुए कहा। "लेकिन सच कुछ और था।"

उसने संदूक से एक और खत निकाला। यह खत आर्यन का था, जो कभी रूहानी तक नहीं पहुँचा। खत में आर्यन ने लिखा था कि जमींदार के आदमियों ने उसे पकड़ लिया था और उसे जान से मारने की धमकी दी थी। अपनी जान बचाने के लिए नहीं, बल्कि रूहानी की इज़्ज़त और जान बचाने के लिए उसने शहर छोड़ा था।

"साहिल, तुम ही आर्यन हो," नीरा ने अचानक कहा।

मैं सन्न रह गया। "नीरा, ये क्या बकवास है? हम 21वीं सदी में हैं। ये सब पुनर्जन्म की बातें..."

"तो फिर तुम्हें ये जगह जानी-पहचानी क्यों लग रही है?" नीरा ने चुनौती दी। "जब हम अंदर आए, तो तुम सीधे उस सीढ़ी की तरफ मुड़े जो लाइब्रेरी जाती है, जबकि वो अंधेरे में थी। तुम्हें कैसे पता था कि वहाँ लाइब्रेरी है?"

मैं निरुत्तर था। सच में, मुझे हवेली के कोने-कोने से एक अजीब सा जुड़ाव महसूस हो रहा था।

"साहिल, हमें अपने अधूरे प्यार को पूरा करना है," नीरा मेरे करीब आई। "रूहानी को मुक्ति तभी मिलेगी जब आर्यन उसे अपनाएगा।"

मैं डर गया था। नीरा की मानसिक स्थिति ठीक नहीं लग रही थी। "नीरा, चलो घर चलते हैं। हम बाद में बात करेंगे।"

हम हवेली से बाहर निकले। पूरी रात मुझे नींद नहीं आई। आर्यन और रूहानी की कहानी मेरे दिमाग में घूमती रही। क्या सच में पुनर्जन्म होता है? क्या मैं आर्यन हूँ?

अगले कुछ दिनों तक नीरा का व्यवहार बदल गया। वह मुझसे दूर रहने लगी। जब भी मैं उससे मिलने की कोशिश करता, वह टाल देती। मुझे चिंता होने लगी। मैंने उसके घर जाकर उसके माता-पिता से बात करने का फैसला किया।

नीरा के घर पहुँचकर मुझे पता चला कि वह पिछले दो दिनों से अपने कमरे से बाहर नहीं निकली है। उसकी माँ बहुत परेशान थीं।

"साहिल, पता नहीं उसे क्या हो गया है," उसकी माँ ने रोते हुए कहा। "वह बस उस पुरानी डायरी को पढ़ती रहती है और किसी से बात नहीं करती।"

मैं नीरा के कमरे में गया। वह खिड़की के पास बैठी थी, बाहर देख रही थी।

"नीरा," मैंने उसे पुकारा।

वह धीरे से मुड़ी। उसकी आँखों में वो चमक नहीं थी जो हमेशा रहती थी। "साहिल, तुम आ गए।"

"नीरा, ये सब क्या है? तुम खुद को क्यों सज़ा दे रही हो?"

"साहिल, रूहानी को शांति नहीं मिली," नीरा ने कहा। "उसे लगता है कि आर्यन अभी भी उससे दूर है।"

"नीरा, मैं यहीं हूँ," मैंने उसका हाथ थाम लिया। "अगर मैं आर्यन हूँ, तो मैं वादा करता हूँ कि मैं तुम्हें कभी छोड़कर नहीं जाऊंगा।"

नीरा की आँखों में आंसू आ गए। "सच?"

"हाँ, सच।"

उस दिन के बाद, हमने उस हवेली और रूहानी की कहानी को पीछे छोड़ने का फैसला किया। लेकिन नीरा पूरी तरह से ठीक नहीं हुई थी। उसे अक्सर दौरे पड़ते थे, जिसमें वह रूहानी की तरह बातें करती थी। डॉक्टर्स ने इसे 'डिसोसिएटिव आइडेंटिटी डिसऑर्डर' बताया। उनका कहना था कि नीरा ने रूहानी के किरदार को अपने अंदर इतना गहरा उतार लिया है कि वह उसे अपनी सच्चाई मानने लगी है।

मैं नीरा के साथ रहा। उसके इलाज के दौरान, मैंने महसूस किया कि चाहे हम आर्यन और रूहानी हों या साहिल और नीरा, हमारा प्यार सच्चा है। मैंने इतिहास और पुरानी कहानियों से दूरी बना ली। हम दोनों ने नई यादें बनाने की कोशिश की।

एक दिन, नीरा ने मुझे एक पेंटिंग दिखाई जो उसने बनाई थी। उसमें वही हवेली थी, लेकिन अब वह खंडहर नहीं थी। वह नई और सुंदर लग रही थी। बगीचे में फूल खिले थे और रूहानी और आर्यन हाथ में हाथ डाले खड़े थे।

"साहिल, अब रूहानी खुश है," नीरा ने मुस्कुराते हुए कहा। "उसे अपना आर्यन मिल गया।"

मैंने नीरा को गले लगा लिया। मुझे नहीं पता कि पुनर्जन्म सच है या नहीं, लेकिन मुझे इतना पता था कि मैंने अपनी नीरा को वापस पा लिया था। उस पुरानी हवेली का रहस्य चाहे जो भी हो, उसने हमें एक-दूसरे के करीब ला दिया था।

कुछ सालों बाद, हमने शादी कर ली। हम शहर छोड़कर एक शांत जगह बस गए। हमने उस हवेली की तरफ मुड़कर कभी नहीं देखा। लेकिन कभी-कभी, जब बारिश होती है और बिजली चमकती है, तो मुझे लगता है कि रूहानी और आर्यन हमें देख रहे हैं, मुस्कुरा रहे हैं, क्योंकि उनकी अधूरी कहानी को हमने पूरा कर दिया था।

हमारा जीवन सामान्य हो गया था, लेकिन वो अनुभव हमेशा हमारे साथ रहा। नीरा अब भी कभी-कभी पुरानी कविताओं को गुनगुनाती थी, जो रूहानी लिखा करती थी। पर अब उन कविताओं में दर्द नहीं, बल्कि सुकून था। हमने सीखा कि प्यार समय और काल से परे होता है। चाहे सदी कोई भी हो, प्यार की भाषा वही रहती है।

और वो डायरी? वो आज भी हमारे घर की अलमारी के सबसे ऊपरी रैक पर रखी है, धूल खा रही है। शायद किसी और जन्म में, कोई और प्रेमी जोड़ा उसे खोजेगा और अपनी कहानी उससे जोड़ेगा। तब तक के लिए, हम साहिल और नीरा बनकर अपनी ज़िंदगी जी रहे हैं, हर पल को खूबसूरती से संजोते हुए।

लेखक : मुकेश पटेल