शाम की हल्की गुलाबी ठंडक शहर के उस मशहूर पार्क में उतर आई थी। अपनी उंगलियों में पांच साल के आरव की नन्ही और कोमल उंगलियां फंसाए श्रुति बड़े इत्मीनान से आगे बढ़ रही थी। आरव अपने नन्हे कदमों से उछल-कूद करता हुआ कभी किसी तितली के पीछे भागने की जिद करता, तो कभी रंग-बिरंगे गुब्बारों को देखकर मचल जाता। श्रुति के चेहरे पर एक सुकून भरी थकान थी—वो थकान जो एक माँ को दिन भर की भागदौड़ के बाद अपने बच्चे की हंसी देखकर मिलती है। वह आरव को आइसक्रीम दिलाने के लिए स्टॉल की तरफ मुड़ी ही थी कि अचानक एक जाने-पहचाने चेहरे पर नज़र पड़ते ही उसके कदम ठिठक गए। सामने से लगभग उसी की उम्र की एक बेहद आकर्षक और सलीके से तैयार युवती आ रही थी। उसने आंखों पर महंगे सनग्लासेस लगाए थे और उसकी चाल में एक गजब का आत्मविश्वास था। श्रुति को अपनी याददाश्त पर अधिक ज़ोर नहीं देना पड़ा और उसने तुरंत पहचान लिया कि यह तो राधिका थी। और पहचानती भी कैसे नहीं, राधिका के चेहरे और रूप-रंग में ज़रा भी फ़र्क़ नहीं पड़ा था। वह ठीक वैसी ही दिख रही थी जैसी कॉलेज के दिनों में दिखती थी— बेदाग त्वचा, छरहरा बदन और वही पुरानी चमक। "अरे राधि...
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