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अप्रैल, 2026 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

**ख्वाहिशों का आईना: एक अनकही मुलाकात**

  शाम की हल्की गुलाबी ठंडक शहर के उस मशहूर पार्क में उतर आई थी। अपनी उंगलियों में पांच साल के आरव की नन्ही और कोमल उंगलियां फंसाए श्रुति बड़े इत्मीनान से आगे बढ़ रही थी। आरव अपने नन्हे कदमों से उछल-कूद करता हुआ कभी किसी तितली के पीछे भागने की जिद करता, तो कभी रंग-बिरंगे गुब्बारों को देखकर मचल जाता। श्रुति के चेहरे पर एक सुकून भरी थकान थी—वो थकान जो एक माँ को दिन भर की भागदौड़ के बाद अपने बच्चे की हंसी देखकर मिलती है। वह आरव को आइसक्रीम दिलाने के लिए स्टॉल की तरफ मुड़ी ही थी कि अचानक एक जाने-पहचाने चेहरे पर नज़र पड़ते ही उसके कदम ठिठक गए। सामने से लगभग उसी की उम्र की एक बेहद आकर्षक और सलीके से तैयार युवती आ रही थी। उसने आंखों पर महंगे सनग्लासेस लगाए थे और उसकी चाल में एक गजब का आत्मविश्वास था। श्रुति को अपनी याददाश्त पर अधिक ज़ोर नहीं देना पड़ा और उसने तुरंत पहचान लिया कि यह तो राधिका थी। और पहचानती भी कैसे नहीं, राधिका के चेहरे और रूप-रंग में ज़रा भी फ़र्क़ नहीं पड़ा था। वह ठीक वैसी ही दिख रही थी जैसी कॉलेज के दिनों में दिखती थी— बेदाग त्वचा, छरहरा बदन और वही पुरानी चमक। "अरे राधि...

आंगन की छाँव और एक बेटी का फर्ज

  बारिश के बाद की वो धुली-धुली सी सुबह थी। आंगण में लगे नीम के पेड़ से पानी की बूंदें टपक रही थीं। मीनल कई महीनों बाद अपने मायके आई थी। घर की दीवारें अब पहले से ज्यादा जर्जर लग रही थीं, उन पर लगा रंग जगह-जगह से पपड़ी बनकर झड़ रहा था। यह वही घर था जहाँ कभी खूब चहल-पहल हुआ करती थी। लेकिन पिछले दो सालों ने इस घर की सूरत और सीरत दोनों बदल कर रख दी थी। मीनल का बड़ा भाई, माधव, दालान में बैठा एक पुरानी फाइल पलट रहा था। माधव की उम्र अभी पैंतीस साल ही थी, लेकिन उसके बालों में आई सफेदी और चेहरे की गहरी लकीरों ने उसे वक्त से बहुत पहले बूढ़ा कर दिया था। मीनल खामोशी से दरवाजे की ओट में खड़ी अपने भाई को देख रही थी और उसकी आँखों से आंसुओं की धार बह रही थी। माधव एक ऐसा इंसान था जिसने कभी अपने लिए जीना सीखा ही नहीं। वह हमेशा दूसरों की खुशियों के लिए खुद को खपा देने वाला व्यक्ति था। दो साल पहले उनके पिता जी को एक गंभीर बीमारी ने घेर लिया था। इलाज का खर्च इतना था कि किसी भी मध्यमवर्गीय परिवार की कमर टूट जाए। मीनल उस वक्त गर्भवती थी और अपने ससुराल में थी। माधव ने उसे पिता जी की बीमारी की गंभीरता का कभ...

फटे स्वेटर की गर्माहट

  दिसंबर का महीना अपने चरम पर था और शहर में ठंडी बर्फीली हवाएं किसी नुकीले तीर की तरह जिस्म के आर-पार हो रही थीं। शाम गहराने लगी थी और सड़क पर कोहरे की सफेद चादर बिछने लगी थी। मिल की शिफ्ट खत्म होने के बाद दीनानाथ अपने घर की ओर तेज कदमों से बढ़ रहे थे। उनके बदन पर एक पुराना, कई जगहों से घिसा और उधड़ा हुआ स्वेटर था, जिसकी चेन भी महीनों पहले टूट चुकी थी। हवा के झोंके सीधे उनकी छाती से टकरा रहे थे और उनकी हड्डियां ठिठुर रही थीं। लेकिन आज दीनानाथ के चेहरे पर एक अजीब सी संतुष्टि और खुशी थी। उन्होंने अपनी पतलून की जेब के ऊपर हाथ रखा, जहां उन्होंने बड़ी हिफाजत से चार सौ रुपये दबा रखे थे। पिछले तीन महीनों से वह रोज अपनी चाय और बीड़ी के पैसे बचाकर दस-बीस रुपये जमा कर रहे थे। आज आखिरकार वह रकम इतनी हो गई थी कि वह अपने लिए एक अच्छा, मोटा और गर्म जैकेट खरीद सकें। इस बार की ठंड उनके पुराने स्वेटर के बस की बात नहीं रह गई थी। कल ही मिल के मुंशी जी ने उन्हें टोकते हुए कहा था, "दीनानाथ, एक ढंग का स्वेटर ले लो, वरना इस ठंड में निमोनिया हो गया तो दवाइयों में जैकेट से चार गुना ज्यादा पैसा लग जाएगा।...

यादों का सौदा

रात का सन्नाटा गहराने लगा था। घर के बाकी कमरों की बत्तियां बुझ चुकी थीं, लेकिन रमाकांत जी के कमरे में अभी भी एक छोटा सा नाइट लैंप जल रहा था। उनकी पत्नी, जानकी देवी बार-बार करवटें बदल रही थीं। उनकी आँखों से नींद जैसे कोसों दूर जा चुकी थी।  "सुनिए जी..." जानकी देवी ने आखिरकार अपनी चुप्पी तोड़ी। "पिछले कई दिनों से मैं देख रही हूँ कि हमारे तीनों बेटे और बहुएं दालान में बैठकर फुसफुसाते रहते हैं। जैसे ही मैं या आप उनके पास जाते हैं, वे एकदम से चुप हो जाते हैं। मुझे कुछ ठीक नहीं लग रहा है। कुछ पता है आपको कि ये क्या खिचड़ी पक रही है?" रमाकांत जी ने अपनी रामायण की किताब बंद की, चश्मा उतार कर सिरहाने रखा और बहुत ही शांत स्वर में बोले, "जानकी, जब पक्षियों के पंख मजबूत हो जाते हैं, तो वे नया आसमान ढूंढने लगते हैं। तुम ज्यादा मत सोचो, सो जाओ। जब तक मैं तुम्हारे साथ हूँ, तुम्हें घबराने की कोई जरूरत नहीं है।" रमाकांत जी ने करवट ले ली, लेकिन जानकी देवी का दिल अब भी किसी अनहोनी की आशंका से धड़क रहा था। दो दिन बाद, रविवार की दोपहर थी। पूरा परिवार डाइनिंग टेबल पर खाना खा चु...

स्वाभिमान की पगडंडी: एक नई भोर

  रोहन जब इस दुनिया में आया था, तो उसके माता-पिता की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। चांद से रोशन चेहरे और बड़ी-बड़ी कजरारी आंखों वाले उस बच्चे को देखकर पूरे मोहल्ले ने बधाइयां दी थीं। घर में मिठाइयां बंटी थीं और मां ने बड़े लाड़ से उसका नाम 'रोहन' रखा था। लेकिन यह खुशियां बस कुछ ही महीनों की मेहमान थीं। जैसे-जैसे रोहन थोड़ा बड़ा हुआ, एक ऐसी कड़वी सच्चाई सामने आई जिसने उस परिवार के सारे सपने तोड़ दिए। रोहन एक किन्नर शिशु था। समाज के तानों, झूठी लोक-लाज और परिवार के दबाव के आगे माता-पिता का प्यार हार गया। जिस बच्चे को मां ने अपनी छाती से लगाकर रखा था, उसे एक अंधेरी रात में भारी मन और आंसुओं के साथ शहर की किन्नर बस्ती की गुरु 'चंपा माई' को सौंप दिया गया। रोहन का अपना परिवार तो उसी दिन खत्म हो गया था, और अब उसका नया परिवार वह किन्नर बस्ती थी।  किन्नर बस्ती में रोहन का नाम 'रेशमा' रख दिया गया। वहां उसे प्यार तो बहुत मिला, लेकिन वह प्यार उन घुंघरुओं और भड़कीले कपड़ों के बोझ तले दबा हुआ था। रेशमा जैसे-जैसे बड़ी होने लगी, उसने देखा कि उसकी दुनिया के लोग हर सुबह सज-धज कर, र...

ममता का आँचल और इंसानियत का कर्ज

  सर्दियों की एक सर्द सुबह थी। घर के पिछले हिस्से में बैठकर बर्तन मांजती हुई सावित्री के हाथ तो मशीन की तरह चल रहे थे, लेकिन उसका मन कहीं बहुत दूर अपनी उधेड़बुन में उलझा हुआ था। सामने नल से गिरते पानी की आवाज़ में उसे शहनाई की धुनें और ढोलक की थाप सुनाई दे रही थी। अगले ही हफ्ते उसकी इकलौती बेटी, अंजलि का विवाह था। एक गरीब और विधवा माँ होने के नाते, सावित्री ने दिन-रात एक करके, दूसरों के घरों में झाड़ू-पोछा करके पाई-पाई जोड़ी थी। लेकिन किसी ने सच ही कहा है कि गरीब के घर की शादी एक ऐसा कुआं होती है, जिसकी गहराई का कोई अंदाज़ा नहीं लगा सकता। शादी की तारीख जैसे-जैसे नज़दीक आ रही थी, सावित्री की रातों की नींद उड़ चुकी थी। "सावित्री! ज़रा अंदर आना," ड्राइंग रूम से सेठानी वसुंधरा जी की आवाज़ आई। सावित्री ने जल्दी से अपने गीले हाथ साड़ी के पल्लू से पोंछे और सहमी हुई सी अंदर गई। वसुंधरा जी शहर के एक बहुत बड़े व्यापारी की पत्नी थीं, लेकिन उनका स्वभाव उनके रुतबे से बिल्कुल अलग, बहुत ही नरम और दयालु था। पिछले बारह सालों से सावित्री उनके घर का काम कर रही थी।  सावित्री जब अंदर पहुँची, तो उसने देखा क...

ममता का दान: जब एक अनचाहा गर्भ बन गया किसी का संसार

  श्वेता अपने बेडरूम की खिड़की के पास खड़ी बाहर की तेज़ बारिश को देख रही थी, लेकिन उसके मन के भीतर इससे भी बड़ा तूफान चल रहा था। उसके हाथ में प्रेगनेंसी टेस्ट की वह रिपोर्ट थी, जिसने उसकी रातों की नींद उड़ा दी थी। श्वेता और उसका पति सुमित दोनों एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करते थे। उनके पहले से ही दो बच्चे थे—आठ साल का आरव और पाँच साल की रूही। इस व्यस्त और भागदौड़ भरी ज़िंदगी में वे दोनों अपनी पारिवारिक और पेशेवर ज़िंदगी के बीच किसी तरह संतुलन बना पा रहे थे। ऐसे में इस तीसरे बच्चे की खबर उनके लिए किसी झटके से कम नहीं थी। श्वेता ने मन ही मन तय कर लिया था कि वह कल जाकर इस अनचाहे गर्भ को गिरवा देगी।  उसी शाम श्वेता का बड़ा भाई अनुपम और उसकी भाभी अंजलि शहर आए हुए थे। वे दोनों श्वेता से मिलने उसके घर पहुँचे। अंजलि और अनुपम की शादी को पंद्रह साल बीत चुके थे, लेकिन ईश्वर ने उन्हें संतान सुख से वंचित रखा था। उन्होंने न जाने कितने डॉक्टरों के चक्कर काटे, कितने मंदिरों की सीढ़ियाँ चढ़ीं, लेकिन अंजलि की गोद सूनी की सूनी ही रही। इस सूनेपन ने उन दोनों को अंदर से बहुत खामोश और उदास कर दिया थ...

**सूनी चौखट और एक माँ का संकल्प**

  अस्पताल से घर तक का वो आधे घंटे का सफर देविका को किसी अंतहीन और भयानक सज़ा की तरह लग रहा था। कार की पिछली सीट पर बैठी देविका की गोद में एक गुलाबी रंग के तौलिए में लिपटी उसकी नवजात बच्ची सो रही थी। देविका के शरीर का पोर-पोर दर्द से चीख रहा था। बारह घंटे की भयंकर प्रसव पीड़ा और उसके बाद हुए ऑपरेशन के टाँकों का दर्द अभी भी ताज़ा था। लेकिन उस शारीरिक दर्द से कहीं ज्यादा बड़ा दर्द उस खामोशी का था, जो इस कार के अंदर और उसके पति विकास के चेहरे पर पसरी हुई थी। विकास जो ड्राइविंग सीट पर बैठा था, उसने पूरे रास्ते एक बार भी पीछे मुड़कर अपनी बेटी का चेहरा तक नहीं देखा। उसकी आँखें सड़क पर थीं, लेकिन माथे पर पड़ी सिलवटें बता रही थीं कि वह किसी गहरी निराशा में डूबा है।  गाड़ी उनके पुश्तैनी घर के दरवाज़े पर आकर रुकी। देविका ने बहुत मुश्किल से अपने कांपते हुए पैरों को ज़मीन पर रखा। बच्ची को सीने से लगाए हुए वह धीरे-धीरे घर की चौखट की तरफ बढ़ी। उसकी उम्मीदों के विपरीत, दरवाज़े पर न तो कोई आम के पत्तों की बंदनवार बंधी थी, न ही कोई थाली सजी थी, और न ही परिवार का कोई सदस्य खुशी से उनका इंतज़ार क...

**ममता के दो आँचल: एक अनकही दास्तान**

  कमरे की दीवारें हल्के गुलाबी और नीले रंगों से सजी थीं। खिड़की से छनकर आती सुबह की धूप उस छोटे से पालने पर पड़ रही थी, जिसे पिछले ही हफ्ते बड़े अरमानों से खरीदा गया था। पालने के पास बैठी शालिनी के हाथों में ऊन के छोटे-छोटे मोजे थे, जिन्हें वह अपनी उंगलियों से सहला रही थी। उसकी आँखों में एक तरफ माँ बनने की असीम खुशी थी, तो दूसरी तरफ एक ऐसा गहरा खौफ था, जो उसे अंदर ही अंदर खोखला कर रहा था। दस साल की लंबी प्रतीक्षा और कई डॉक्टरों के चक्कर काटने के बाद, शालिनी और उसके पति विक्रम ने सरोगेसी (किराए की कोख) का सहारा लिया था। अब बस कुछ ही हफ्तों में उनके घर वो नन्ही किलकारी गूंजने वाली थी, जिसका उन्होंने बरसों इंतजार किया था। तभी विक्रम ऑफिस जाने के लिए तैयार होकर कमरे में आया। उसने शालिनी को यूं गुमसुम और चिंतित देखा तो उसके पास आकर बैठ गया। उसने शालिनी के हाथ से वो मोजे लिए और उसके माथे को चूमते हुए कहा, "क्या हुआ शालिनी? अब तो खुशियों के आने का वक्त है। घर में बच्चे की किलकारियां गूंजने वाली हैं और तुम इस तरह उदास बैठी हो? क्या सोच रही हो इतनी गहराई से?" शालिनी ने एक गहरी सांस ली...

**एक छत, अनेक रिश्ते: पति या पूरी ससुराल?**

  *शादी से पहले हर लड़की सपनें बुनती है कि बड़े शहर में पति के साथ आज़ादी की ज़िंदगी जिएगी, पर क्या होता है जब उसी पति के भीतर सास, ननद और जेठानी का अक्स नज़र आने लगे? यह कहानी उस अनकहे सच की है, जो हर बंद दरवाज़े के पीछे कहीं न कहीं सांस लेता है...* "दीदी, मुझे तो समझ ही नहीं आता कि मैं क्या करूँ! बाहर से देखने में इतने शांत और सुलझे हुए लगते हैं तुम्हारे जीजाजी, पर घर के अंदर आते ही इनका एक अलग ही रूप सामने आ जाता है।" काव्या ने फोन पर अपनी बड़ी बहन नीता से झुंझलाते हुए कहा। नीता ने हंसते हुए पूछा, "अरे, अब क्या नया फरमान जारी कर दिया विकास ने?" "नया क्या दीदी, यह तो रोज़ का ही नाटक है। जो बनाकर सामने रख दो, उसमें कोई न कोई कमी निकालनी ही है। सुबह अगर मेहनत करके परांठे बनाऊँ, तो कहते हैं कि आज तो मुझे कुछ हल्का खाना था, पोहा क्यों नहीं बनाया? और जिस दिन पोहा बना दूँ, उस दिन कहेंगे कि ऑफिस जाने वाले इंसान को नाश्ते में कुछ पेट भरने वाला देना चाहिए। खाने को लेकर इतने नखरे तो शायद कोई सास भी न करती हो।" काव्या की आवाज़ में खीझ साफ झलक रही थी। उसने आगे कहा, ...