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फ़रवरी, 2026 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

सेल्यूट

  सुबह से ही मां का रो रोकर बुरा हाल था।सुमेश को शाम तक बॉर्डर पर पहुंचने का हुक्म आ गया था।सुमेश एक महीने की छुट्टी लेकर घर आया था उसकी शादी जो थी। एक हफ्ते ही तो हुए है शादी के अभी तो नववधू सुलभा  हिल स्टेशन घूमने जाने की तैयारियां कर रही थी। अभी तो सुलभा की दुल्हन वाली झिझक और हाथों की मेहंदी दोनों ही ताजे थे। पूरा घर अजीब से गहरे सन्नाटे में डूबा हुआ था। अपने मेहंदी वाले हाथों में चाय के दो गिलास और नाश्ता लेकर सुलभा आहिस्ता से बैठक कक्ष में आई जहां सुमेश मां के पास बैठ उनका हाथ थाम हिम्मत बंधा रहा था। चूड़ियों की खनखन और पाजेब की रुनझुन उस सन्नाटे के बीच मानो दरवाजे से अन्दर आने की अनुमति मांग रहे थे। लीजिए मां जी चाय पी लीजिए रात से आपने कुछ खाया नहीं है नई बहू की मंद मधुर आवाज सुनते ही मां ने चेहरा ऊपर उठाया और उसका हाथ पकड़ जोरों से रो पड़ी। मेरी सलोनी सी बहू कितनी मनौतियों के बाद तो इस घर में आई है अभी तो इसकी मेहंदी का रंग ठीक से चढ़ भी नहीं पाया है और तेरे जाने की खबर आ गई है । मत जा बेटा कोई भी कारण बताकर मना कर दे।मुझे तो इस सुकुमार बच्ची की  चिंता खाए जा रही...

नमक की नदी

  गाँव के पश्चिम में बहती नदी का नाम था "शुक्रिया"। लोग कहते, यह नदी नमक के आँसू बहाती है, क्योंकि इसके किनारे बसे हर घर की दास्तान में कोई न कोई ऐसा था, जिसने किसी न किसी के नमक का हक चुकाने के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया। आज भी जब नदी की लहरें चाँदनी में नमक की चादर-सी बिछातीं, तो वृद्धा सुमन देवी की आवाज़ गूँजती— "नमक कभी माफ़ नहीं करता... वह तो बस याद दिलाता है।" सुमन देवी का पोता, विहान, शहर की चकाचौंध से थका हुआ गाँव लौटा था। उसकी नज़रें बार-बार नदी के उस पार टूटी हुई झोपड़ी पर टिक जातीं, जहाँ कभी मझुआरे माझी का परिवार रहता था। बारह साल पहले, जब विहान का परिवार बाढ़ में फँस गया, तो माझी ने अपनी नाव से उन्हें बचाया था। उस रात, माझी ने अपने घर का आखिरी चुटकी भर नमक विहान की माँ के हाथ पर रख दिया था— "इसे पानी में घोलकर पिला दो, भूखे बच्चों की जान बच जाएगी।" आज माझी की विधवा पत्नी और बेटी, नदी के सूखते जल को देखकर रोज़ मन्नत माँगतीं। साहूकार ने उनकी ज़मीन हड़प ली थी, और झोपड़ी पर कब्ज़े की मुहर लग चुकी थी। विहान के पास विकल्प था: या तो वह शहर में अ...

ऋण चुकाना

  अर्जुन एक मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी करता था | दिन रात मेहनत करके उसको प्रमोशन  भी मिल गया | उसकी तरक्की देखकर उसके माता पिता  खुश होते और आशीर्वाद देते | माता पिता  अकेले गांव में रहते थे |  धीरे धीरे अर्जुन काम में इतना व्यस्त हो गया कि मां पापा से बात करना कम कर दिया, कभी फोन उठाता कभी नहीं | मां की तबियत बिगड़ी लेकिन अर्जुन ने कहा - मैं प्रोजेक्ट में इतना बिज़ी था और समय भी नहीं मिल रहा,  मैं बाद में आऊंगा | मां  दरवाजे पर बैठ गई,  आंखे कमजोर , लेकिन बेटे की आहट पहचान गई  | पापा भी चुपचाप थे अर्जुन को देखते ही चेहरे पर मुस्कान गई,  उनके पैर छुए और कहा " अब मैं यहां पर ही रहूंगा, जीवन भर तुम्हारा साथ दूगां | आपने मेरा हर तरह से ध्यान रखा अब मेरी बारी है | अर्जुन ने गांव में ही छोटा सा आफिस खोला और काम करने लगा | अब हर रोज़ मां के हाथ का खाना जो बड़ा ही स्वादिष्ट था , चाट चाट कर खाने लगा | पापा की दिलचस्प कहानी सुनता  |  मैनें सोचा कि मां पापा मेरी हर छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी ख्वाइशें पूरी करते थे, अब मेरा फर्ज है कि मै...

नमक का हक अदा करना

  दिल्ली का प्रसिद्ध पब्लिक स्कूल “ब्लू बैल” में एडमिशन प्रतिष्ठा की बात थी,शहर के नामी गिरामी लोगों के बच्चे वहां शिक्षा प्राप्त करते थे और ऊंची पोस्ट तक पहुंचते थे।वहां एक चौकीदार था जिसका नाम था रघुनाथ,बहुत ही सरल,ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ। उसकी सैलरी इतनी नहीं थी जिसमें वो अपने परिवार का भरन पोषण दिल्ली जैसे महानगर में कर सके,बूढ़े मां बाप,अविवाहित बहन भाई,पत्नी और तीन बच्चे।पर स्कूल का कोई भी काम हो ,वो पूरी मुस्तैदी से अपनी ड्यूटी निभाता,किसी बच्चे की कोई चीज खो जाए,किसी टीचर की फाइल या किताब मिस हो जाए,किसी पेरेंट्स को कोई समस्या हो,रघुनाथ हर काम को हल कर देता मानो उसके पास की जादू का चिराग हो। स्कूल के प्रिंसिपल उससे बहुत खुश रहते,एक बार वो अपना बेटा आदित्य स्कूल लेकर आया, कोई सामान्य ज्ञान प्रतियोगिता थी वहां,सारे लोग चकित रह गए उसके बेटे आदित्य की प्रतिभा देखकर। प्रिंसिपल ने उसके बेटे को स्पेशल स्कॉलरशिप पर आदित्य को अपने स्कूल में एडमिशन दे दिया। बिना ट्यूशन और कोचिंग के वो होनहार लड़का टॉप करने लगा।रघुनाथ स्कूल के इस उपकार के लिए कृतज्ञ था। आदित्य इंजीनियर बना और फिर यू प...

ऋण चुका दिया

      शामली का मोबाईल जब रात के दो बजे बजा तो वो समझ गई कि भारत से उसकी परम मित्र रूही का फोन ही होगा। वैसे तो उसे भारत से न के बराबर फोन आते है, कोई है ही नहीं तो फिर फोन कौन करेगा। जो नाममात्र के रिश्ते हैं वो तो बहुत पहले ही छूट चुके हैं। और जो अब अपने स्वार्थ के लिए उससे रिशता रखना चाहते है, उनसे वो नहीं चाहती।           उनींदी से उसने फोन उठाया तो रूही की आवाज सुनाई दी। “ हैलो शामली, सारी , मैं तुम्हें इस समय डिसटर्ब कर रही हूं, पर बात जरूरी थी, इसलिए सोचा तुम्हें बता दूं”          “ हां बोलो, सब ठीक तो है ना” शामली उठ कर दूसरे कमरे में चली गई क्योंकि वहां कबीर और बेबी सान्या भी सो रहे थे।               “ ठीक ही तो नहीं है, वरना मैं इस समय तुम्हें क्यों जगाती। जैसा कि मैनें तुम्हें पहले ही बताया था, तुम्हारी बहन अवनि के लक्षण ठीक नहीं हैं। पढ़ाई लिखाई में तो कभी उसका मन लगा ही नहीं, उपर से आवारा...

दृश्य बदल गया

मेम साब चोरी मैने नहीं की है।विश्वास कीजिए मुझ पर। इतने सालों की मेरी ईमानदारी पर बट्टा मत लगाईए ।कितनी थू थू होगी मेरी। आपको अगर मुझे नौकरी से निकालना ही है तो मैं चली जाऊंगी लेकिन आरोप लगाकर मत हटाइए।मुझे कहीं भी काम नहीं मिल पाएगा। नहीं मोहिनी मेरा बेटा दिलीप कह रहा है तुमने ही चुराए है रुपए अब तो पुलिस आएगी तभी तुम सच बोलोगी। मेम साब दिलीप भैया मुझसे नाराज रहते है ।वैसे तो आप मुझे हटाएगी नहीं इसलिए वह झूठ बोल रहे हैं मोहिनी बार बार विनती कर रही थी मेरे बच्चे भूखों मर जाएंगे पुलिस मत बुलवाइए । लेकिन मेम साब जब तक कुछ कहतीं उनके सुपुत्र दिलीप ने फोन कर पुलिस बुला लिया। जब पुलिस अधिकारी आया तब मोहिनी मेम साब के# पैरों पर नाक रगड़ रही थी बिलख रही थी और मेम साब तन कर खड़ी थीं। चलो तुम्हे थाने लेजाकर ही पूछताछ करनी पड़ेगी।सीधे से तो तुम चोरी कबूलोगी नहीं पुलिस अधिकारी  ने सख्ती से कहते हुए जैसे ही बिलखती हुई मोहिनी की तरफ हाथ बढ़ाया उसकी मुखमुद्रा ही बदल गई। झटके से अपना हाथ छुड़ाते हुए वह बिफर उठी। हां हां थाने भी ले चलो।लेकिन पहले इसके कमरे की तलाशी ले लो चलो कमरे में दिलीप की तरफ ...

लाड प्यार की भी एक सीमा होती है

     इतवार को घर में सब  देर से उठते है तो निशा भी कुछ देर बिस्तर पर पड़ी रही, परंतु नींद तो उसे आ नहीं रही थी, उठ कर बैठ गई। पतिदेव मानव  एक्सियन के पद पर थे, किसी बात की कमी नहीं थी। इकलौता बेटा आर्यन मां बाप की आंखों का तारा,  पढ़ रहा था। उसे पता था कि मानव तो अभी उठेगें नहीं, मेड को चाय के लिए कहकर बाहर लान में चली गई।             बाहर देखा तो एक कार नहीं खड़ी थी। उनके पास दो कारें थी, एक सरकारी और एक अपनी काफी मंहगी गाड़ी थी। आर्यन अभी सतारह वर्ष का था, लेकिन कई बार कार ले जाता। निशा ने कई बार समझाया कि अभी उसकी उम्र नहीं हुई। लाईसेंस भी नहीं, घर में ड्राईवर है, वही उसे ले जा सकता है, लेकिन आर्यन कहां मानता।                अक्सर कहा जाता है कि माएं बेटों को  बिगाड़ती  हैं, ज्यादा लाड प्यार देती हैं, लेकिन यहां मामला उल्ट था। मानव ही बेटे की हर  नाजायज मांग पूरी करते। स्कूल में जब भी लड़ झगड़ कर आता, ...

बेटी होना पाप नहीं

  माँ, पापा कहाँ है, पूछते हुए दामिनी रसोईघर मे घुसी। अरे! यह क्या कर रही है? बाहर से आकर सीधे रसोई मे घुस गईं, और यह क्या ना प्रणाम ना गले लगना,बस आते ही पापा कहाँ है। पहले मुझसे मिल ले फिर पापा की खोज खबर भी ले लेना।अब दामिनी को अपनी गलती का एहसास हुआ।उसे गुस्सा मे इतना ध्यान ही नहीं रहा कि वह सफऱ से आकर सीधे रसोई घर मे घुस गईं है,जबकि माँ ने बचपन से ही यह सिखाया है कि बाहर से आकर पहले हाथ पाँव धोते है फिर जाकर और कोई काम करते है, पर आज दामिनी  इतने गुस्से मे है कि उसे इस बात का ध्यान ही नहीं रहा। ठीक है, मै जाकर ड्राइग हॉल मे बैठती हूँ।ड्राइंगहॉल मे क्यों बैठना है? सफर से आई हो थकी होंगी जाओ जाकर हाथ पैर धोकर कपड़े बदलकर आराम करो। और तुम एकाएक चली आई। किस चीज की छुट्टी है? छुट्टी नहीं है। छुट्टी लेकर आई हूँ। वाह! क्या बात है। मै जब आने को बोलती हूँ तो कहती हो कि छुट्टी नहीं है और आज स्वयं आ गईं। आई नहीं, आना पड़ा, पापा ने जो किया है उसके कारण आना पड़ा। पापा ने क्या किया है। मेरा विवाह पक्का किया है। वो तो तुमसे पूछ कर ही किया है। विवाह न पूछकर तय हुआ है, पर दहेज तो पूछकर नहीं ...

अंगारे उगलना

  "पढ़ाई अच्छी थी तेरी… पर अब तो बस घर संभालना है," शादी के बाद यही बात बार-बार सुनने को मिली। माँ बनना एक सौभाग्य था — पर दो बच्चों की परवरिश में खुद को कहीं पीछे छोड़ देना पड़ा। हर सुबह घड़ी से पहले उठना, बच्चों की देखभाल, सबकी ज़रूरतें पूरी करना, घर संभालना — जैसे मेरी खुद की ज़रूरतें कभी थीं ही नहीं। दिन भर सबके लिए जीती रही… और खुद के लिए बस रात की थकान बचती थी। धीरे-धीरे यह सब एक आदत बन गई। लेकिन फिर एक दिन, किसी शांत दोपहर में अचानक मन ने सवाल किया — "अब मैं कौन हूँ?" "मैं क्या चाहती हूँ?" शायद जवाब आसान नहीं था, लेकिन सवाल सच्चा था। किसी ने कहा, "कुछ नया सीखो, कुछ अपने लिए करो!" मैंने किताब उठाई, पढ़ना चाहा — पर शब्द जैसे धुंधले हो गए। याददाश्त धोखा दे रही थी। डॉक्टर ने कहा, “थोड़ी मेमोरी कमजोर हो गई है।” लेकिन जो असली तकलीफ़ थी, वो दिल और आत्मा की थी — लोगों की नज़रों और लहजों में अक्सर अंगारे उगलते ताने थे। जैसे हर कमज़ोरी पर उन्हें एक तंज़ मारना हो। आईने में जो चेहरा दिखता, वो कभी मेरी अपनी पहचान थी — अब किसी और की तरह लगता था। वो हँसत...

मिसरी सी बतियां

  मां ये करेले का जूस वैसा ही पड़ा है।इसको कौन पियेगा।सुबह से झक मार रही हूं मैं।जूस निकालने में कितनी मेहनत और समय लगता है आप क्या जाने बैठे बैठे पीने को मिल जाता है फिर भी पिया नहीं जाता आपसे..निमी की तीखी आवाज से मां जी झट से बिस्तर पर उठ कर बैठ गईं । बहू तेरी करेले से भी कड़वी जबान सुनने से तो अच्छा है कि जूस पी लूं शामली जी ने जल्दी से जूस का गिलास उठाते हुए कहा। हां हां तो अब मैं इस घर में आ गई हूं ।रोज पी ही लिया करिए क्योंकि मैं तो ऐसा ही बोलूंगी चाहे करेला लगे चाहे नीम। शुगर है आपको मिसरी घोल के बोलूंगी तो और बढ़ जाएगी समझी आप ।अब पैर पसार के पड़े मत रहिए बिस्तर पर उठिए और कल माली गुलमोहर के चार पौधे लाया है बगीचे में रखे हैं जाइए और उन्हें मिट्टी खोद कर लगा दीजिए अबकी बार निमी उनके सर पर खड़े होकर बोलने लगी। ओफ्फो तुझे  हर वक्त जुबान से अंगारे उगलना ही आता है क्या ।मेरी तबियत इतनी ज्यादा खराब है बिस्तर से उठा नहीं जाता और तू इतना सुनाती रहती है।क्या करूं...शामली जी ने बड़बड़ाते हुए समर्थन के लिए आंसू भर कर  पतिदेव सौरभ जी की तरफ देखा लेकिन वे तो अनसुनी और अनदेखी...