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मार्च, 2026 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

जीने की कला

  सतरंगी थीम थी किट्टी में । सबको हँसने हँसाने वाली ऋतु आज किट्टी पार्टी में नहीं आई थी ।सारी सखियाँ उसे याद कर रहीं थीं । किट्टी को रंग देने वाली वाली ऋतु की कमी सबको खल रही थी । फ़ोन लगा कर ऋतु से उसके न आने का कारण पूछा तो ऋतु ने बताया कि उसके पति की तबीयत सही नहीं है, इसलिए उसका आना नहीं हो पाया । सब किट्टी मेंबर्स ने तय किया कि किट्टी के बाद में सब मिलकर ऋतु के पति की तबीयत देखने जाएँगे। किट्टी पार्टी पूरी होने के बाद सबलोग ऋतु के घर गए । ऋतु के घर की स्तिथि देखकर सब दाँतों तले उँगली दबाते रह गए । एक तरफ़ ऋतु की सास बिस्तर पर लेटी थी । वो पूरी तरह अपाहिज थीं, उनको उठाना, बैठना सब ऋतु ही कर रही थी । दूसरी तरफ़ उसके हसबैंड बिस्तर पर लेटे थे, जिन्हें किडनी की परेशानी थी । वो भी काफ़ी कमज़ोर लग रहे थे ,घर की आर्थिक स्तिथि भी कमजोर ही नज़र आ रही थी, जिसके लिए ऋतु ने ऑनलाइन बिज़नेस कर रखा था । इतने विपरीत हालत में सदा खुश दिखने वाली ऋतु का जब परेशानियों का राज़ खुला तो सब सखियाँ ऋतु की जिंदादिली पर नतमस्तक हो रहीं थीं । सब को लग रहा था कि हम,अपनी छोटी छोटी परेशानियों में भी खुश नहीं...

एक आँख न भाना

  राधा और सुषमा एक ही मोहल्ले में रहती थीं। दोनों पहले बहुत अच्छी सहेलियाँ थीं—साथ बाजार जातीं, त्यौहार मनातीं, और हर बात साझा करतीं। पर वक्त के साथ रिश्तों में एक छोटी सी दरार आ गई। हुआ यूँ कि एक दिन राधा की बेटी ने स्कूल प्रतियोगिता में पहला स्थान पा लिया तो सुषमा के मन में ईर्ष्या- ने जन्म ले लिया।सबने उसको बधाई दी, पर सुषमा ने केवल बाहरी मन से शुभकामनाएँ दी, मगर उसके दिल में कुछ चुभ सा गया। धीरे-धीरे वह राधा की किसी खुशी पर खुश न रह पाई। राधा नई साड़ी पहन ले तो सुषमा कहती, “ज्यादा दिखावा मत कर।” राधा घर की सजावट करती तो बोलती, “कहाँ से इतना पैसा आता है?” अब तो राधा का सुख, सुषमा को “एक आँख न भाता” था। राधा समझ नहीं पाई कि उसकी खुशी सुषमा को क्यों चुभ रही है। वह कई बार पास जाने की कोशिश करती, बात करने की कोशिश करती, पर सुषमा की ईर्ष्या-जैसे दोनों सखियों के बीच दीवार बन गई थी। एक दिन राधा बीमार पड़ गई।उसके पति भी उस समय विदेश में थे तो साथ में मदद के लिए कोई न था।सुषमा ने देखा कि राधा अस्पताल में अकेली पड़ गई है।राधा के बच्चों की देखभाल करने वाला भी कोई नहीं है तो उसका मन द्रवित ह...

इतना घमंड अच्छा नहीं

    " नैन-मटक्का करने से फ़ुरसत मिल गई..।कोचिंग के बहाने मैडम खूब गुलछर्रे उड़ा रही हैं।देख लेना राधिका..तेरी ये बेटी एक दिन हम सबका मुँह काला करके ही छोड़ेगी..।" अपनी देवरानी की बेटी तन्वी को कोचिंग सेंटर से वापस आने पर सुगंधा ने उस पर कटाक्ष किया।         धनाड्य परिवार से ताल्लुक रखने वाली सुगंधा को अपने मायके पर बहुत घमंड था।अपनी सास और छोटी ननद के सामने अपने भाइयों की प्रशंसा करने का वो कोई भी मौका नहीं छोड़ती थी।राधिका के पिता अध्यापक थे।वो अपने साथ कोई दहेज़ नहीं लाई थी।इस बात का न तो उसके पति और ना ही सास-जेठ को कोई शिकायत थी लेकिन जेठानी से अक्सर ही उसे उलाहने सुनने पड़ते थे।यहाँ तक कि सुगंधा अपने बेटों की बड़ाई करने और उसकी बेटी के रंग-रूप पर ताने मारने का भी कोई मौका हाथ से जाने नहीं देती थी।पति और स्वभाव से सीधी सास तो सुगंधा की ज़बान पर लगाम लगा नहीं पाते थे लेकिन ननद निर्मला उसे करारा जवाब दे देती थी।      तन्वी मेडिकल की तैयारी के लिए अपने घर के पास वाले कोचिंग इंस्टीट्युट में जाती थी।एक दिन आन...

खून के आंसू रुलाना

  आज के समय में जिंदगी की रफ़तार जितनी तेज हो गई  है , उतनी ही मुश्किलें भी बढ़ती जा रही हैं। ऐसी ही एक कहानी है रिद्धि की, जो एक साधारण परिवार से थी, पर उसके सपने बिल्कुल असाधारण थे। वह फैशन डिज़ाइनर बनना चाहती थी, लेकिन हालात ने उसे खून के आँसू रुलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। कॉलेज की फीस भरने के लिए वह सुबह अख़बार बाँटती, दोपहर को ट्यूशन पढ़ाती और रात में ऑनलाइन डिज़ाइन कोर्स करती। कई बार थकान इतनी गहरी होती कि लगता जैसे शरीर जवाब दे देगा, लेकिन मन हार मानने को तैयार नहीं था। उसके घरवालों की सीमित आय और समाज की तानों ने उसे और बाँधना चाहा, पर रिद्धि हर दिन अपने अंदर की आग को और तेज़ करती गई। एक दिन उसके पापा की तबीयत अचानक बिगड़ गई, और घर की सारी बचत इलाज में लग गई। यह वही पल था जब किस्मत ने उसे सचमुच खून के आँसू रुलाए—न पढ़ाई के पैसे, न घर में उम्मीद, और न खुद के लिए समय। लेकिन रिद्धि ने ठान लिया कि वह रुकेगी नहीं। उसने अपने डिज़ाइन बेचने के लिए सोशल मीडिया पर एक छोटा-सा पेज बनाया। धीरे-धीरे उसके काम को सराहना मिलने लगी। लोगों ने उसकी मेहनत को पहचाना, और उसके डिज़ाइन दिल्ली...

हिम्मत

  सुबह-सुबह सूरज़ की किरणों से अंधियारा ज़रुर छँट जाता है…..  लेकिन आत्मा पर छाया अंधियारा शायद इस रोशनी में ऑर गहरा होता जाता है । जहाँ ठंड के मौसम में पक्षी अपनी मधुर ध्वनि में चहचहा रहे थे । वहीं भीनी-भीनी धूप झरोखों से झाँक मेरे पैरों को गरमाहट दे ना उठने का बहाना बनी हुई थी । उसी क्षण बाहर से किसी चीज के गिरने की आवाज़ आती है…..  और मैं धूप को झुठला बाहर जा कर देखती हूँ कि …. नकुल खाना ज़मीन पर फैंक मीरा पर चिल्ला रहा होता है । मैं उसे रोकने के लिए आगे बढ़ती हूँ पर उसकी तेज आवाज़ के कारण बीच में ही थम जाती हूँ । नक़ुल मीरा पर चिल्ला रहा था कि तुमनें मुझे ठण्डा खाना कैसे परोस दिया । ये सुन मीरा बोली मैंने आपको गर्म खाना ही दिया था । लेकिन आपका फ़ोन आ गया और बातों के चक्कर में खाना ठंडा हो गया । अगर आपको ये नहीं खाना तो मैं गर्म बना देती हूँ पर मुझ पर चिल्लाइए मत ! बस मीरा का इतना कहना ही नकुल के सम्मान में विरोध था । जिसे सुन वो मीरा पर कटाश करने लगा ये सब देख मेरे वो सब घाव हरे हो गए जो दिल के किसी कोने में क़ैद थे । वो सब घाव आज उन धुंधली यादों से बाहर निकल सजीव हो ...

कबाड़

  अम्मा अब तो यह अपना नया घर है सब नया सामान आयेगा ये सब पुराना फालतू कबाड़ वहीं किराए के मकान में छोड़ कर आना चाहिए था आप लोगों को.. उफ्फ ये कमरा है या कबाड़ रूम ..!!ऐसा करो शाम को ऑफिस से लौटते समय  कबाड़ी को लेता आऊंगा तब तक आप छांट लो....ये सब कबाड़ उसे दे देना .. विमल ने कहा और कमरे में फैले सामान को चिढ़ कर देखते हुए ऑफिस चला गया । मालिनी जी अपने पति की ओर देख कर चुप रह गईं। ठीक है बेटा धीरे से कह अपने कमरे में रखे सारे सामान को ध्यान से देखने लगीं। ....ये पुरानी मेज ..याद है आपको....आप विमल के पढ़ने के लिए लाए थे जब वह कक्षा पांचवीं में पूरे स्कूल में प्रथम आया था  अपनी गाढ़ी कमाई से कितनी मुश्किल से रुपए जमा कर इसे खरीदा था....ये स्टोव गांव में मुझे चूल्हे  से बचाने के लिए आप लेकर लाए थे... और ...ये लंबी डंडी वाला काला छाता जिसने बरसों बरस पूरी शिद्दत से बारिश से बचाया आपको दफ्तर आते जाते ...मालिनी जी कपड़े में जतन से रखे छाते को छू कर अतीत की पोटलियां खोलने में मगन हो गईं । हां....और....ये तांत वाली कुर्सियां ....जिनमे हम दोनों ने बरामदे में बैठ ना जाने कितन...

सुझाव ही क्यों दिया!!!

  शनिवार की शाम ऑफिस से जैसे ही घर आया देखा तो विजय जी बैठक में बैठे हुए थे।मुझे देखते ही लपक कर खड़े हो गए मैं तुम्हारा ही इंतजार कर रहा था रोहन चलो झटपट मेरे साथ...! अरे अरे अभी तो ऑफिस से आया हूं चाय वाय पी लूं थोड़ा आराम कर लूं कहां ले जा रहे हो मुझे मैने पीछा छुड़ाने की कोशिश की। आज चाय और वाय दोनों मेरी तरफ से है यार कभी तो भाभी जी को चाय से फुर्सत दिया कर क्यों भाभी जी जोर से हंसकर उन्होंने मेरा हाथ ही पकड़ लिया। जाइए ना... भाईसाब कब से बैठे हैं ऑफिस तो रोज ही होता है और ये निगोडी चाय से तो आपको कभी फुर्सत नहीं मिलती वैसे भी कल सन्डे है श्रीमती जी की तरफ से मदद मिलने की सारी उम्मीदों पर झाड़ू फिरती नजर आ गई थी मुझे। मरता क्या ना करता चल पड़ा बलि के बंधे बकरे की तरह विजय जी के साथ चाय वाय की आस लिए..! कॉलोनी के हॉल में बैठक चल रही थी मेरे पहुंचते ही समीर ने जोर से कहा लो भाई हमारे प्लानर आ गए आओ रोहन तुम अपने सुझाव बताओ। कौन से सुझाव समीर...! मै हतप्रभ था इस आकस्मिक आक्रमण से। अरे वही जो तुम उस दिन बता रहे थे कॉलोनी की साफ सफाई और  दुर्गा पूजा आयोजन के संबंध में समीर ने ...

*उलझन*

        अरे रमेश इतने दिन बाद दिखाई दिये हो,कहाँ थे?        सुरेश तुम,वास्तव में भाई काफी दिनों में मुलाकात हुई है।असल  मे भाई मैं बेटे के पास  विदेश चला गया था।इसी कारण मुलाकात नही हो पायी थी।खैर अब मिलते रहेंगे।        रमेश और सुरेश बचपन के मित्र थे।रमेश के एक बेटा था जो अमेरिका में जॉब कर रहा था,इधर सुरेश के एक ही बेटी थी जिसने अपनी एजुकेशन पूरी कर ली थी और सुरेश आजकल अपनी बेटी की शादी के लिये अच्छे लड़के की तलाश में थे।अंदर की बात ये थी कि सुरेश अपनी बेटी की शादी उस लड़के से नही करना चाहते थे जिसे उनकी बेटी प्रियंका प्यार करती थी। अपनी बेटी को उन्होंने साफ मना कर दिया था।        बात बात  में सुरेश ने अपनी बेटी के लिये किसी योग्य लड़के के बारे में पूछा,तो रमेश ने कहा कि वह जरूर बताएंगे,आखिर प्रियंका उनकी भी बेटी जैसी है। प्रियंका रमेश जी को जानती ही थी क्योंकि वह उनके घर आते जाते रहते थे।प्रियंका को जब पता लगा कि रमेश अंकल आये हुए हैं...

एक नजरिया यह भी

   सुनो,मनोज बेटा देखो कुछ मजदूर नेता मजदूरों को भड़का रहे हैं,तुम मजदूरों से बात करके,उन्हें हड़ताल करने से रोकने का प्रयास करो।तुम्हे मेरी ओर से फ्री हैंड है।बस हड़ताल नही होनी चाहिये।       मैं पूरी कोशिश करता हूँ बाबूजी।          मनोज के पिता स्वयं मजदूर थे,इस कारण उसे मजदूरों के मनोविज्ञान की जानकारी थी,साथ ही उसके मजदूर वर्ग में सम्बन्ध भी थे।उसी  आधार पर मनोज ने सेठ जी और मजदूरों की सीधी वार्ता कराकर समझौता करा दिया।         सेठ बनारसी दास जी यह एक बड़ी सीमेंट की फैक्टरी थी।जिसमे मनोज पार्ट टाइम कार्य करता था,जिससे वह अपनी पढ़ाई का खर्च निकाल सके। असल मे मनोज और सेठ बनारसी दास के बेटे सुनील दोनो ग्रेजुएशन में सहपाठी थे।मनोज बिज़नेस मैनेजमेंट में आगे पढ़ना तो चाहता था पर उसकी आर्थिक स्थिति ऐसी नही थी जो वह आगे पढ़ सके।सुनील मनोज की स्थिति को समझता था, उसने अपने मित्र की सहायता के लिये अपने पिता से बात की।सेठ बनारसी दास जी ने अपने बेटे की बात सुनकर पहले तो चुप र...

रूह का सुकून है सच

  बात उन दिनों की है जब सुषमा ने हिन्दी अध्यापिका की नौकरी के लिए साक्षात्कार देने जाना था। वह एक बहुत ही सम्मानित प्राइवेट स्कूल में साक्षात्कार देने गई थी। उसकी लिखित परीक्षा बहुत अच्छी हुई थी और उसने कक्षा में भी बच्चों को बहुत अच्छे से पढ़ाया था। फिर उसे बहुत डर लग रहा था क्योंकि साक्षात्कार के समय कुछ पी.एच.डी. एवं कुछ बहुत ही अनुभवी लोग आए थे और उसका अनुभव सिर्फ़ दो वर्ष था और उसे अंग्रेजी भी बोलनी नहीं आती थी। जब सुषमा को साक्षात्कार के लिए बुलाया गया तो उसने हिन्दी से सम्बन्धित जितने भी प्रश्न पूछे गए, सबके उत्तर बहुत ही अच्छे से दिए और विषय से हटकर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर भी दिए पर एक प्रश्न का उत्तर देने से पहले उसके मन में एक विचार आया कि "साँच को आँच नहीं।" मुझे उनके द्वारा पूछे प्रश्न का उत्तर सच बोलना है अब चाहे नौकरी मिले या नहीं। वह प्रश्न था कि "आप हमारे द्वारा पूछे गए सभी प्रश्नों के उत्तर हिन्दी में क्यों दे रहे हो?" तब सुषमा का उत्तर था," मैं यहाँ हिन्दी अध्यापिका के साक्षात्कार के लिए आई हूँ। मुझे अपनी हिन्दी भाषा से प्यार है और मैं अच्छी त...

*खरा विश्वास*

     सुनो जी,आज तो 8 बज गये, दूध वाला दूध नही दे गया है, मालूम तो करो,आयेगा भी नही?         रोज दूध समय पर ही आता था,आज क्यो हुआ जानने को मैंने अपने यहां दूध की डिलीवरी करने वाले को फोन लगाया।        उधर से आवाज आयी, अरे बाबूजी आपको पता भी है,अपनी सोसायटी में एक मेड का मर्डर हो गया है,उसकी डेड बॉडी भी नही मिल रही,सब गेट बंद कर दिये गये हैं, दूध इसीलिए नही आया है, आप चाहो तो गेट पर दूध दे सकता हूँ।        स्वाभाविक रूप से घटना की जानकारी करने की उत्सुकता में मैं गेट की ओर बढ़ गया।सोसायटी में यह हो गया तो चिंतनीय था ही।पूरी सोसायटी में अफ़रातफ़री का माहौल था।टी. वी.चैनल्स की वैन प्रेस रिपोर्टर्स की भीड़ सोसायटी में भरी पड़ी थी।      एक नेवी अफसर के यहां एक मुस्लिम मेड थी,वह पिछली रात्रि से घर नही पहुची थी।सोसायटी से बाहर जाने की उसकी एंट्री भी नही थी।इसका मतलब हुआ कि वह सोसायटी में ही गायब हुई है।उसके ख़्वाविन्द ने बताया कि रुकसाना का फोन रात...

साँच को आँच नहीं

  अक्सर बचपन में सुनी कहानियाँ और सीख जीवन में काम आती हैं।मनुष्य को सरल और सहज जीवन के लिए हमेशा सत्य का साथ देना चाहिए। कहा भी गया है'सत्यमेव जयते!'अर्थात् हमेशा सत्य की जीत होती है।सत्यवचन से सम्बन्धित प्रस्तुत कहानी पंचतंत्र से ली गई है।पंचतंत्र  विष्णु शर्मा की  कहानियों का संकलन है।पं विष्णु शर्मा ने अपनी कहानियों में मनुष्यों के अलावा पशु-पक्षी को भी अपनी कहानी का पात्र बनाया है।अपनी कहानियों के माध्यम से उन्होंने शिक्षाप्रद बातें कही हैं। प्रस्तुत कहानी एक सत्यवादी लकड़हारे की है।प्राचीनकाल में एक सत्यवादी ,ईमानदार और गरीब लकड़हारा रहता था।वह रोज सुबह समीप के जंगल  में नदी किनारे  जाकर  लकड़ियाँ काटता और उसे बेचकर अपने परिवार का जीवन-यापन करता।इस प्रकार  उसकी जिन्दगी गुजर रही थी।एक दिन जंगल में लकड़ियाँ काटते समय अचानक से उसके हाथ से कुल्हाड़ी गिरकर नदी में जा गिरी। देखते-देखते गहरी नदी में उसकी कुल्हाड़ी गुम हो गई। नदी में कुल्हाड़ी गिरकर जाने से लकड़हारा काफी दुखी हो गया।वह सोचने लगा कि बिना कुल्हाड़ी के मैं अपने परिवार का जीवन-यापन कैसे करुँ...

संकल्प

    रामप्रसाद एक सामान्य से व्यक्ति थे।नगर निगम में क्लर्क की नौकरी करते थे।एक ही बेटा था,हरीश।उनका सपना था कि बेटा अच्छा पढ़ लिख जाये और अच्छी नौकरी प्राप्त कर ले तो उनके दिन भी बुहर जाये।इसलिये उनके केंद्र में हरीश ही रहता था।उनका पूरा ध्यान,ऊर्जा और अधिकतर धनराशि हरीश की पढ़ाई लिखाई पर ही होती। हरीश ने भी अपने पिता को निराश नही किया।मेधावी छात्र निकला।मेडिकल प्रतियोगिता में सफल रहा,तो रामप्रसाद की खुशी का कोई ठिकाना नही रहा।बेटा उनके रिटायरमेंट से पहले ही डॉक्टर बन जायेगा।आजकल तो डॉक्टर लोगो की आमदनी का कोई ठिकाना नही,सोच सोचकर रामप्रसाद प्रफुल्लित होते रहते।निर्धनता की जिंदगी में कम से कम बुढापे में तो छुटकारा मिलेगा।उन्होंने अपने को पूरी तरह से हरीश को डॉक्टर बनाने में झोंक दिया।घर मे हर तरह की किल्लत सहते पर हरीश को किसी तरह की कमी न रह जाये,इसी के जुगाड़ में लगे रहते।      आखिर वह दिन भी आ गया जब उनका हरीश डॉक्टर बन ही गया।रामप्रसाद जी ने अपने ऑफिस में तथा मुहल्ले में मिठाई बांटी।हरीश ने डॉक्टरी की पढ़ाई तो कर ली थी,पर इन्ही दिनों उसके दृष्टिको...

दहेज

  सबोथ अपने लेखन कार्य मे व्यस्त थे कि उन्हें मालती के बड़बड़ाने की आवाज़ सुनाई दी, रोज़ मालती का अपनी किस्मत के लिए रोना उन्हें परेशान करने लगा था। मालती से उनका विवाह चार वर्ष पहले हुआ था,वे  एक आदर्श वादी परिवार से थे,दहेज लेना उनके सिद्धांतों के विरुद्ध था, अत: सवा रुपया और नारियल से उनका विवाह हुआ था,मालती एवं उसका परिवार भी बिना दहेज के विवाह से बहुत खुश था।सुबोध ने भी अपनी सीमित आमदनी में से मालती को हर प्रकार की सुख सुविधा देने की कोशिश की थी,अभी तक सब अच्छा चल रहा था, परन्तु एक वर्ष पहले जब मालती की छोटी बहन का विवाह खूब भव्य हुआ, दान दहेज खूब दिया गया तो मालती असंतुष्ट रहने लगी, वह रोज़ उन्हें दहेज न लेने के लिए कोसने लगी, सुबोध मालती के तानों से तंग आकर रोज़ खून के आंसू बहाते, सुबोध समझ नहीं पा रहे थे कि दहेज़ लेने के लिए हमेशा लड़के वालो को ही क्यों दोषी ठहराया जाता है। ऋतु दादू 

खून के आँसू रोना

  उदय जब दस साल का था,तो प्रसव के समय उसकी माँ का अचानक निधन हो गया।उदय का जन्म उसकी माँ की शादी के बारह वर्ष बाद हुआ था,इस कारण उदय माँ के जीवन का सूर्य था।पूरा परिवार उससे अत्यधिक प्रेम करता था,विशेषकर दादा जी और माँ की आँखों का तारा था। माँ के निधन से अचानक से उदय के जीवन में अंधकार का डेरा पसर गया। कुछ ही समय  बाद  घर में विमाता आ गई। थोड़े समय तक तो  सब कुछ ठीक-ठाक रहा,परन्तु उसके सौतेले भाई विनय के जन्म के बाद एक बार  फिर से उसकी खुशियों के ग्रहण लग गए। विनय के जन्म के बाद उसकी विमाता के तेवर बदल गए। अब  विमाता को उदय में केवल खामियाँ ही नजर आती थीं।विमाता के साथ-साथ उसके पिता भी मानो सौतेले हो गए। उसके पिता भी आँखें मूँदकर पत्नी की बातों पर ही भरोसा करते थे। अचानक से बदली हुई परिस्थितियों और माता-पिता के उपेक्षित व्यवहार के कारण उदय रोज खून के आँसू रोता था।उसके जीवन के एकमात्र सहारा उसके दादाजी उसके आँसू पोंछते हुए कहते -" बेटा! तुम इन सब फालतू बातों पर ध्यान न देकर पढ़ाई में मन लगाओ।काबिल बनने पर यही विमाता तुम्हारी अहमियत समझेगी।" समय के साथ उदय जह...

अमावस

  रिद्धि घर से निकलते समय अपने गहने साथ नहीं लाना चाहती थी,पर सौरभ ने जोर देकर कहा था लाने को।आदत नहीं थी मम्मी की आलमारी खोलने की,तो जैसे ही लॉकर खोलने गई धड़ाम से आवाज आई।सकपका कर जल्दबाजी में गहनों का बक्सा निकालकर अपने कॉलेज के बैग में डालकर पलटी ही थी कि मम्मी भागती आई और पूछा"क्या हुआ बेटा?यह आवाज कैसी?अरे!तुझे कोई साड़ी चाहिए क्या कल पहनने को?" रिद्धि डर गई थी,लगा चोरी पकड़ी गई।सहमकर बोली"अरे मम्मी!मैं क्यों साड़ी पहनूंगी?करवा चौथ तो आप करेंगी कल,मैं थोड़े ही करूंगी।मैं तो आपकी साड़ी देखना चाहती थी,सब मैचिंग है कि नहीं।" मम्मी ने सर पर हांथ फेरकर कहा"बस -बस,यह साल आखिरी है तेरा।डिग्री मिलते ही लड़का देखना शुरू कर दूंगी।ब्याह के बाद करना नौकरी।पापा के रिटायर होने से पहले तेरे हांथ पीले कर दूं, तो शांति मिलेगी मुझे।देखना तेरे पहले करवा चौथ में तेरे लिए क्या-क्या तैयारी करूंगी।चांद के साथ तेरी सुंदरता ही चमकेगी पूरे आसमान में।पूनम का नजारा होगा। " "धत्त!!!!!"कहकर रिद्धि ने नज़रें झुका लीं। मम्मी हंसती हुई कमरे से निकल गई तो वह सोचने लगी।बचपन ...