आत्मसम्मान सबसे बड़ी पूंजी है

 सुबह का कोहरा अभी पूरी तरह छंटा नहीं था। सूरज की हल्की किरणें बस खिड़की के शीशे पर थरथरा रही थीं। ओमप्रकाश जी अपनी पुरानी लकड़ी की कुर्सी पर बैठे थे — वही कुर्सी, जिस पर वो बरसों पहले अपनी पत्नी के साथ शाम की चाय पीते थे। अब वही कुर्सी उनका सहारा थी, और वही उनकी दुनिया।

उन्होंने अख़बार खोला, पर नज़रें शब्दों पर नहीं थीं। कानों में बस एक ही आवाज़ गूँज रही थी —
“पिताजी, बार-बार चाय की मांग मत कीजिए। गैस पर पहले ही नाश्ता चल रहा है। हर घंटे में चाय पीना अच्छी बात नहीं होती।”
ये उनकी बहू ने थोड़ी देर पहले कहा था।

ओमप्रकाश जी ने अख़बार मोड़ा, फिर भी मुस्कुरा दिए।
“शायद ठीक ही कहती है,” उन्होंने खुद से कहा, “उम्र के इस पड़ाव में शरीर तो बच्चा ही हो जाता है, जो बार-बार वही चीज़ माँगता है जो उसे सुकून दे।”

उनकी पत्नी सविता अगर होतीं तो कहतीं —
“इतनी चाय पीना ठीक नहीं, ओम। चलो, मैं तुम्हारे लिए तुलसी वाली बनाती हूँ, वो तुम्हारे लिए अच्छी रहेगी।”
उनकी याद आते ही ओमप्रकाश जी की आँखें थोड़ी भीग गईं।

जब सविता जिंदा थीं, तब घर में हर बात में मिठास थी। बेटा अमित छोटा था, पर उसके हर काम में सविता का साया रहता। “पापा, मैं पढ़ाई करूँ या क्रिकेट खेलूँ?” — वो पूछता, और सविता कहतीं, “जो मन कहे वही करो, तुम्हारे पापा हैं न तुम्हारे साथ।”

आज वही अमित एक बड़ी कंपनी में मैनेजर था, शहर के अपने फ्लैट में रहता था, पत्नी नीलू और आठ साल की बेटी के साथ। सविता के गुजर जाने के बाद कुछ महीने तक ओमप्रकाश गाँव में अकेले रहे, फिर बेटे के ज़िद करने पर शहर आ गए।

पहले कुछ दिन बहुत अच्छे बीते। “पापा, अब आप हमारे पास हैं, कितना अच्छा लगता है,” अमित हर शाम कहता। नीलू भी मुस्कराकर पूछती, “पापा, क्या खाएँगे आज?”
पर धीरे-धीरे सब बदलने लगा।

अब नीलू के शब्दों में मिठास कम और खीज ज़्यादा रहने लगी। “पिताजी, टीवी थोड़ा धीरे करिए, मीटिंग चल रही है।”
“पिताजी, घर में कोई नौकर नहीं है, आप अपने कपड़े खुद तह कर लिया करें।”

पहले ओमप्रकाश जी को लगता, बहू काम में व्यस्त रहती है, इसलिए चिड़चिड़ी है। लेकिन अब उन्हें समझ आने लगा कि उनके लिए इस घर में जगह बस नाम की रह गई है।

हर महीने जब उनकी पेंशन आती, अमित बैंक से निकाल लाता। कहता, “पापा, खर्च तो सब घर का ही है। आपकी दवाइयों, बिजली-पानी का बिल सब यहीं से जाता है।”
ओमप्रकाश जी मुस्करा देते, कुछ नहीं कहते।
बेटे के हाथ में पैसा देखकर उन्हें अब भी वही गर्व होता था — “मेरा बेटा अब बड़ा आदमी बन गया है।”

पर भीतर कहीं न कहीं एक खालीपन था।

एक शाम जब वे बालकनी में बैठे थे, तभी पोती अदिति स्कूल से लौटी।
“दादू, मेरा नया वीडियो गेम देखिए,” उसने कहा।
“अरे वाह, बहुत बढ़िया! चलो, दादू भी खेलना सीखे।”
“नहीं, आप नहीं खेल सकते,” उसने तुरंत कहा। “मम्मी कहती हैं, आप सब पुरानी चीजें जानते हैं, आपको कुछ समझ नहीं आएगा।”

ओमप्रकाश जी चुप रह गए।
बच्चे वही बोलते हैं जो घर में सुनते हैं।
उन्हें लगा जैसे किसी ने उनके दिल में चुभो दिया हो — धीरे से, मगर गहराई तक।

रात को देर तक नींद नहीं आई। वो बालकनी में खड़े होकर नीचे सड़क पर गुजरते लोगों को देखते रहे।
हर इंसान कहीं न कहीं जा रहा था, किसी मंज़िल की ओर।
और वो? वो कहाँ जा रहे थे?
कहीं नहीं। बस, एक घर में रह रहे थे, जहाँ अब “अपनापन” मेहमान हो गया था।

अगले दिन सुबह जब अमित ऑफिस जा रहा था, तो उसने कहा, “पापा, इस महीने आपकी पेंशन से हम अदिति के नए कोर्स का एडमिशन करवा देंगे। बहुत अच्छा स्कूल है।”
ओमप्रकाश जी ने बस सिर हिला दिया।

उसी शाम उन्होंने अपनी पुरानी डायरी निकाली।
उसमें पुराने दिनों के कुछ नोट्स, कुछ यादें, और सविता के हाथ से लिखी एक चिट्ठी रखी थी —
“ओम, जब मैं नहीं रहूँगी, तब तुम अकेले मत रहना। लोगों के बीच रहना। पर अगर कभी लगे कि कोई तुम्हें बोझ समझने लगा है, तो याद रखना — आत्मसम्मान सबसे बड़ी पूंजी है।”

उनकी आँखों से आँसू टपक पड़े।
उन्होंने डायरी बंद की और एक पत्र लिखा —

प्रिय अमित,

तुम हमेशा मेरे गर्व रहे हो। मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी तुम्हें अच्छा इंसान बनाने में लगाई, और तुम्हें कामयाब देखकर मुझे हमेशा खुशी हुई।
लेकिन अब लगता है कि मेरी उपस्थिति तुम्हारे जीवन में सिर्फ ज़िम्मेदारी बनकर रह गई है।
मैं किसी पर बोझ नहीं बनना चाहता। इसलिए मैं वापस गाँव जा रहा हूँ — उस घर में जहाँ तुम्हारी माँ की यादें हैं, और मेरी साँसे अब भी वहीँ सुकून पाती हैं।
मेरी चिंता मत करना। वहाँ भी लोग हैं जो मुझे पहचानते हैं, जो मुझसे बातें करेंगे।
बस एक बात याद रखना—
जब तुम खुद बूढ़े हो जाओगे, तब समझोगे कि उम्र बढ़ने से ज़रूरतें कम नहीं होतीं, बस उनका स्वर बदल जाता है।
तुम्हारा पिता,
ओमप्रकाश।

अगली सुबह जब अमित उठा, तो पापा का कमरा खाली था।
बिस्तर पर रखा वही पत्र पढ़कर उसके हाथ काँपने लगे।

“पापा...” वह चीख पड़ा।
पर जवाब में बस कमरे की दीवारें गूँज रही थीं।

अमित भागा, स्टेशन पहुँचा, पर वहाँ सिर्फ़ वही ट्रेन थी जो अभी-अभी छूटी थी।
वह प्लेटफॉर्म पर बैठ गया, हाथ में पिता की चिट्ठी थी, आँखों से आँसू बह रहे थे।

नीलू भी पीछे आई थी। उसने चुपचाप अमित के कंधे पर हाथ रखा।
“अमित, वो तुम्हारे पापा हैं, खिलौना नहीं कि जब चाहो संभाल लो। उनका दिल है, जो तुमसे उम्मीद करता है।”

अमित का दिल फटने लगा। “मैंने कभी सोचा ही नहीं कि पापा को भी ‘घर’ चाहिए होगा, वो भी वही घर जहाँ उन्हें जगह मिले, न कि सिर्फ़ एक कमरा।”

उस रात ओमप्रकाश जी गाँव पहुँच गए।
गाँव की हवा में अब भी वही मिट्टी की खुशबू थी।
पुराने पड़ोसी उन्हें देखकर बोले, “अरे मास्टर साहब, आप वापस आ गए? अब गाँव फिर से पूरा लगने लगा।”
वो मुस्कराए।
“हाँ भाई, अब वहीं रहूँगा जहाँ मेरा दिल है।”

उस रात उन्होंने अपने आँगन में बैठकर आसमान की ओर देखा।
“देखो सविता,” उन्होंने धीमे से कहा, “तुम सही कहती थीं, आत्मसम्मान इंसान का सबसे बड़ा धन है। और शायद, अब मुझे फिर से अपनी रोटी का स्वाद मिलेगा।”

दूर कहीं मन्दिर की घंटी बजी, और हवा में हौले-हौले वही आवाज़ गूँजती रही।

कुछ महीने बाद अमित और नीलू गाँव पहुँचे।
ओमप्रकाश जी दरवाज़े के बाहर मिट्टी के चूल्हे पर चाय बना रहे थे।
अमित झुक गया—“पापा, मुझे माफ़ कर दीजिए।”
ओमप्रकाश जी ने मुस्कुराते हुए कहा,
“आ जाओ बेटा, चाय पी लो। अभी भी गरम है।”

चाय का प्याला थमाते हुए उन्होंने कहा,
“देखो अमित, जीवन में जो माता-पिता तुम्हारे लिए अपनी नींद तक कुर्बान कर दें, उनका बस थोड़ा-सा सम्मान कर दो—वो उन्हें अमर कर देता है।”

अमित रो पड़ा।
नीलू ने झुककर पैर छुए, “पापा, हमें भी अपने साथ रहने दीजिए।”
“रहना तो तुम दोनों को ही है, बस अब घर का मतलब समझ आ गया न?”

वो तीनों आँगन में बैठकर चाय पीने लगे।
धूप धीरे-धीरे फैल रही थी, और उस दिन पहली बार ओमप्रकाश जी को लगा —
शायद उनकी ज़िंदगी फिर से ‘गरम चाय’ जैसी हो गई है—थोड़ी कड़वी, पर दिल को सुकून देने वाली।

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