"चाची, देखो मैं स्कूल से आ गया!"
कक्षा की डायरी और टिफिन बैग लटकाए हुए रौनक उछलता हुआ अंदर आया।
"चाची, जल्दी से खाना दे दो, बहुत भूख लगी है!" उसने मासूमियत से कहा।
नीला ने तकिए से सिर उठाया, होंठों पर हल्की मुस्कान आई, मगर फिर चेहरा सख्त हो गया।
“रौनक, आज खाना अपनी मम्मी से मांग लेना। मैं बहुत थक गई हूँ।”
रौनक के चेहरे पर उदासी उतर आई। “लेकिन चाची, आप तो रोज मुझे अपने हाथ से खाना खिलाती हैं…”
नीला ने निगाहें फेर लीं।
“आज नहीं, बेटा। जाओ।”
दरवाजे के पीछे खड़ी रचना ने सब सुन लिया था। होंठों पर मुस्कान आई — ठंडी, तंज भरी मुस्कान।
नीला और रचना देवरानी-जेठानी थीं। नीला की शादी हुये तीन साल हुए थे, और जब से ससुराल आई थी, घर का लगभग सारा बोझ उसी के कंधों पर था।
रचना ने उसे आते ही अपनापन दिखाया था — “मेरी छोटी बहन जैसी है तू।”
नीला भोली थी, सच्ची थी। उसने समझा कि रचना सच में उसे बहन मानती है। लेकिन रचना ने धीरे-धीरे घर की रसोई, सफाई, बच्चों की पढ़ाई, यहां तक कि त्यौहारों की तैयारियाँ भी नीला के जिम्मे डाल दीं।
“तू तो नई-नई आई है न, सबकुछ सीख जाएगी तो बाद में काम में आसानी रहेगी।”
यही कहकर रचना ने जिम्मेदारियों का पहाड़ उस पर डाल दिया था।
नीला सवेरे से रात तक भागती रहती। अपने छोटे बेटे अद्वय को छोड़कर रौनक की पढ़ाई, स्कूल और नाश्ते में व्यस्त रहती। कभी शिकायत नहीं करती थी।
रचना को यह और अच्छा लगने लगा — “नीला सीधी है, जो बोलो करती है।”
एक दिन घर में महिला मंडल की मीटिंग रखी गई। रचना की सबसे अच्छी सहेली मीना भी आने वाली थी।
“नीला, तू ज़रा घर संभाल लेना। मीना आने वाली है, खाने की सारी तैयारी तू कर ले। बाकी बाहर से मंगवा लेंगे।”
नीला ने झिझकते हुए कहा, “दीदी, अद्वय को कल से बुखार है, डॉक्टर ने आराम करने को कहा है।”
“अरे! माँजी हैं न घर पर, वो देख लेंगी। तू सोच मत, सब बढ़िया कर ले।”
नीला ने अपनी आँखें झुका लीं — जेठानी के आगे बोलना उसे ठीक नहीं लगता था।
अगले दिन घर में रौनक की हंसी-ठिठोली और रचना की महफ़िल दोनों साथ चल रही थीं।
नीला रसोई में थी, थकी, मगर मन लगाकर काम कर रही थी।
मीना ने हंसते हुए कहा, “रचना, तू तो बहुत किस्मतवाली है। तेरी देवरानी तो सब काम संभाल लेती है। हमारे घर में तो एक काम बोले बिना दस बार कहना पड़ता है।”
रचना खिलखिलाकर बोली, “बस मत पूछ मीना, मेरी तो लॉटरी लग गई है। नीला जैसी भोली औरत आज के ज़माने में मिलना मुश्किल है। एक बार कहो तो पूरी रसोई पलट दे। मैं तो कहती हूँ भगवान ने सैंपल बनाकर भेजा है।”
मीना हंसने लगी, “मतलब एकदम नौकरानी जैसी है तेरी देवरानी।”
रचना ने नकली गंभीरता से कहा, “अरे नौकरानी नहीं, बहन कहती हूँ, लेकिन है तो बेवकूफ ही। अपना घर छोड़कर मेरे काम में सिर झोंक देती है।”
और फिर दोनों जोर-जोर से हंस पड़ीं।
रचना को यह नहीं पता था कि दरवाजे के पास नीला खड़ी थी — कांपते हाथों में चाय की ट्रे लिए।
एक पल को ट्रे काँप गई, कप गिरते-गिरते बचे।
नीला ने खुद को संभाला और चुपचाप कमरे में चली गई।
उस रात नीला ने अपने बेटे अद्वय को सीने से लगाकर बहुत देर तक रोई।
“दीदी, जिनके लिए अपना बच्चा तक छोड़ दिया, वही मुझे बेवकूफ समझती हैं…”
अगले दिन जब रौनक स्कूल से लौटा और खाना मांगा, तो नीला ने पहली बार “नहीं” कहा।
रचना को यह बात खटक गई।
“नीला, आज क्या हुआ? तुमने खाना क्यों नहीं खिलाया रौनक को?”
नीला ने शांत स्वर में कहा, “अब से रौनक आपका बेटा है, तो उसकी जिम्मेदारी भी आपकी है। मेरा बेटा भी मेरा ध्यान चाहता है।”
रचना हँसी उड़ा देना चाहती थी, लेकिन नीला के चेहरे पर जो ठहराव था, उसने कुछ कहने नहीं दिया।
शाम को जब रौनक होमवर्क करने बैठा, तो उसने कहा, “मौसी, मैथ्स समझा दो ना।”
नीला ने प्यार से सिर सहलाया, “बेटा, अब अपनी मम्मी से पूछो। मुझे अपने बेटे को सुलाना है।”
रचना की झुंझलाहट बढ़ती गई।
“क्या बात है नीला, तुम बदल गई हो? इतनी मददगार थी, अब अचानक क्या हुआ?”
नीला ने दृढ़ता से कहा,
“दीदी, अब मुझे समझ आ गया है कि रिश्ते निभाने के लिए सिर्फ दिल नहीं, समझदारी भी चाहिए। मैंने सोचा था परिवार बाँटने से प्यार बढ़ता है, लेकिन कुछ लोग इसे कमज़ोरी समझ लेते हैं। अब मैं वही करूंगी जो सही होगा, न कि जो सबको अच्छा लगे।”
रचना सकपका गई। उसने पहली बार देखा — शांत और कोमल दिखने वाली नीला के स्वर में कैसी अडिगता है।
नीला आगे बोली,
“आपने मुझे हमेशा ‘छोटी बहन’ कहा, पर बहन कभी अपनी बहन को नौकर नहीं बनाती। मैंने घर को अपना माना, आपके बेटे को अपना बेटा समझा। लेकिन आपने मेरी सादगी का मज़ाक बनाया। अब से मैं किसी का उपयोग नहीं होने दूँगी। मैं अपनी जिम्मेदारियाँ निभाऊँगी, लेकिन अपने बेटे और अपने आत्मसम्मान से समझौता नहीं करूंगी।”
रचना के चेहरे का रंग उड़ गया। वह कुछ कहना चाहती थी, पर शब्द नहीं निकले।
नीला उठी, रसोई की बत्ती बंद की, और अपने कमरे में चली गई।
उस रात रचना को पहली बार महसूस हुआ कि घर में कुछ खो गया है — शायद वो अपनापन, जिसे नीला ने हर दिन अपनी मेहनत से जिया था।
अब घर सजा तो था, लेकिन उस गर्मजोशी से खाली।
धीरे-धीरे रचना को एहसास हुआ कि नीला का सहारा छूट गया है। पार्टी में सब तारीफ करते थे, लेकिन घर की शांति नीला के साथ ही चली गई थी।
कुछ दिनों बाद वह खुद रसोई में खड़ी थी, सब्जी काटते हुए सोच रही थी,
“नीला सच कहती थी… हम अक्सर उन लोगों को हल्के में लेते हैं जो हमें सच्चा दिल देते हैं।”
वक्त बीतता गया।
नीला ने अब अपने बेटे के साथ हर पल जीना शुरू किया। पार्क में खेलना, कहानी सुनाना, उसकी मुस्कान को अपनी दुनिया बना लिया।
अब उसके चेहरे पर संतोष था, आत्म-सम्मान का तेज़ था।
रचना ने एक दिन पास आकर धीरे से कहा,
“नीला, उस दिन जो भी कहा... बहुत गलत था। मुझे माफ कर दो।”
नीला मुस्कराई, “दीदी, माफी की जरूरत नहीं। बस अब सच्चे रिश्ते निभाइए।”
उस दिन के बाद से दोनों के रिश्ते में एक नई समझ पैदा हुई — जहाँ छल नहीं था, बल्कि सम्मान था।
नीला ने साबित कर दिया कि विनम्रता कमजोरी नहीं होती, और जो अपने आत्मसम्मान की रक्षा करना जानता है, वही सच्चे रिश्ते निभा सकता है।
कभी-कभी रिश्तों की मर्यादा बनाए रखने के लिए “ना” कहना भी जरूरी होता है — क्योंकि हर मुस्कान के पीछे झुकना, अच्छाई नहीं, आत्मभुलाव होता है।
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