वो एक मामूली सा ट्रक ड्राइवर था। पर अपने परिवार को पूर्ण समर्पित छोटी प्यारी सी दुनिया थी उसकी। उसकी बीवी और बड़ी मन्नतों से हुई दस साल की बेटी प्यार से उसका नाम रखा था संध्या। हैसियत छोटी पर सपने बड़े थे।उसे पढ़ने के लिए अच्छे स्कूल में डाला था। संध्या जब कहती बाबा मैं बडे़ होकर जब डॉक्टर बनूंगी तो आपको बहुत सारे पैसे दूंगी तो उसकी आंखें छलक आती उसके सिर पर हाथ फेर कर सीने से लगा लेता।काम ऐसा था कि जब घर से निकलता तो पन्द्रह दिन में लौटता था। बिटिया के लिए कुछ न कुछ लेकर आता। इस बार भी पन्द्रह दिन बाद लौटा था। एक पिंक फ्राक लेकर।संध्या खेलने गई थी।हाथ मुंह धोकर चाय पी कर इंतजार करने लगा। धीरे धीरे शाम गहराने लगी पत्नी को कहा मैं उसे लेकर आता हूं बड़ी देर हो गई अभी तक नहीं आई। पर संध्या कहीं नहीं मिली सारे गांव में ढूंढा पर उसका कहीं पता नहीं था। गांव वाले रात भर भटकते रहे।पर ऐसा लग रहा था कि जैसे कोई अनहोनी घट चुकी है।थाने में गये थानेदार ने कहा रिपोर्ट तो चौबीस घंटे बाद ही दर्ज होगी। सुबह उसकी लाश मिली। बिल्कुल क्षत विक्षित उसके छोटे से शरीर को बुरी तरह से नोचा गया था। उसके शरीर को दिये गये घावों ने मानवता को शर्मसार कर दिया था।नन्ही सी संध्या सामूहिक बलात्कार का शिकार हुई थी। उसकी पत्नी तो बिल्कुल गुमसुम हो गई थी। इस कांड में शहर के सबसे रसूखदार के इकलौते बेटे का हाथ था। जो आजकल रोज उनके गांव के चक्कर लगा रहा था। वह पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराने गया तो वहां उसे दुत्कार दिया गया। ऐसे कैसे उन लोगों पर हाथ डाल दें कुछ तो होना चाहिए। मीडिया का दबाव पडा़ तो रिपोर्ट दर्ज हुई पर अज्ञात के खिलाफ। जब मिट्टी उठी तो लोगों ने अंतिम बार चेहरा देखने को कहा। पर उसने बड़ी निर्ममता से मना कर दिया ।बिटिया को श्मशान में जज्ब करते वक्त वह अपने जज्बात वहीं दफ्न करके लौटा था। उसकी पत्नी और उसने हंसना छोड़ दिया था। वक़्त बीत रहा था।उन दोनों के अंदर एक अजीब सा वीराना फैल गया था। वह अपने आप से प्रश्न करता था कि वह गरीबी की वजह से बेबस है या कमजोर है। फिर एक दिन उसे मौका मिला उसका गुनहगार और वो आमने-सामने थे।रात का वक़्त एक एक्सीडेंट और अगले दिन अखबारों की सुर्खियां थी कि किसी अज्ञात वाहन से टकराने के कारण उसके गुनहगार और उसके दोस्त की मौत हो गई थी टोयटा फार्च्यूनर गाडी में सवार दोनों नशे में धुत्त थे। उसने टीवी खोला उसकी पत्नी ने भी देखा। उसकी आंखों से आंसू बहने लगे आज बिटिया की मौत के बाद पहली बार वह खुल कर रोई थी। उसने खाना बनाया संध्या की मौत के साल भर बाद उसने मीठा बनाया था।उन दोनों ने मीठा बनाना और खाना छोड़ दिया था क्योंकि बिटिया को पसंद था। आज उसकी बीवी ने जब उसे अपने हाथों से हलवा खिलाया तो दोनों की आंखों से आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ा था।
जब वह बिस्तर पर लेटा तो उसने अपनी अंतरआत्मा से प्रश्न किया मैंने जो किया क्या? वो ग़लत था। ताज्जुब था कि उसका जमीर खामोश था। बहुत समय बाद वह चैन की नींद सोया था। सुबह उठा नहा धोकर शमशान गया उसी जगह पर जहां बेटी को अंतिम विदाई दी थी। जेब से एक गुलाब का फूल निकाला वहां पर रखा फूट-फूट कर रो पडा़। सही मायनों में अब उसका प्रतिशोध अब पूरा हुआ था।
घर आकर अपनी बीवी को बोला चलो तैयार हो जाओ। कहीं जाना है। दोनों अनाथ आश्रम गये वहां एक सवा महीने की बच्ची को गोद लेने की प्रक्रिया समाप्त की । दस दिन बाद उसे घर ले आया बिटिया का नाम रखा गया "संध्या"
ये सब उस देश में हुआ जहां कानून सिर्फ अमीरों की जागीर है। सामान्य व्यक्ति के लिए कानून केवल कागजों पर बनते हैं। न्याय का इंतजार करते करते जिंदगी खत्म हो जाती है।
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