काव्या ऑफिस से लौटी ही थी कि फोन पर स्मिता का संदेश आया —
“बेटा, मैंने तुम्हारे पसंद के खाने की लिस्ट बना ली है। अगली बार जब आओगी, साथ में बनाते हैं ❤️”
काव्या के चेहरे पर मुस्कान फैल गई।
वह हँसते हुए माँ के पास गई —
“माँ, देखिए न! स्मिता आंटी ने मेरी फेवरेट डिशेज़ की लिस्ट बना डाली है — पास्ता, पनीर टिक्का, और यहां तक कि ओट्स उपमा भी!”
माया ने चश्मा ठीक किया और मुस्कुराने की कोशिश की, मगर चेहरे पर एक हल्की चिंता की रेखा थी।
“हमारे ज़माने में तो सास बहू से पूछती नहीं थीं कि क्या खाना पसंद है… उल्टा आदेश देती थीं कि घर में क्या बनना चाहिए।”
राजीव ने अख़बार से झाँकते हुए कहा —
“अरे अब वक्त बदल गया है, माया! अब सास बहू से पूछती है, ‘तुम्हारी पसंद क्या है।’ यह अच्छी बात है।”
माया बोलीं —
“बदल गया है, हाँ… पर मुझे डर है कहीं ये आज़ादी बहू के सिर न चढ़ जाए। रिश्ते निभाने में थोड़ा झुकना भी ज़रूरी होता है।”
काव्या मुस्कुरा दी —
“माँ, अब झुकना और झुकाना नहीं, साथ चलना सिखाया जाता है।”
2. पहली मुलाक़ात
रविवार को काव्या और उसके माता-पिता स्मिता और अर्पित से मिलने उनके घर पहुँचे।
स्मिता ने जींस और कुर्ता पहना हुआ था, बाल खुले, हाथ में कॉफी मग।
माया ने मन-ही-मन सोचा — “अरे सासू माँ ऐसे कपड़े पहनती हैं अब?”
स्मिता ने काव्या को देखकर कहा —
“अच्छा हुआ तुम आ गईं, मुझे तुम्हारी मदद चाहिए थी। शादी के कार्ड्स का डिज़ाइन चुनना है — कुछ मॉडर्न और कुछ ट्रेडिशनल में उलझी हूँ।”
काव्या ने टैबलेट पर कुछ डिज़ाइन दिखाए, और दोनों साथ-साथ हँसने लगीं।
माया को ये दृश्य थोड़ा अटपटा लगा — सास और बहू एक साथ डिज़ाइन देखतीं, हँसतीं, जैसे पुरानी दीवारें ही गिर चुकी हों।
3. पुराने ज़माने की गूंज
रात को माया को नींद नहीं आ रही थी।
उन्होंने पति राजीव से कहा —
“स्मिता तो बहुत मिलनसार हैं, पर मैं सोचती हूँ… हमारे समय में तो सास का आतंक रहता था। हर बात में कमी निकालती थीं। शादी के बाद सात साल तक मैंने माँ से बात भी छुप-छुपाकर की थी।”
राजीव ने सिरहाने रखे पानी का घूँट लेते हुए कहा —
“पर तुम्हीं ने तो सिखाया काव्या को आत्मविश्वास से जीना। अब वही आत्मविश्वास उसकी सास में भी है। यह टकराव नहीं, संतुलन का समय है।”
माया ने गहरी साँस ली —
“शायद तुम सही कहते हो।”
4. शादी की तैयारियाँ
काव्या और स्मिता अक्सर वीडियो कॉल पर मिलतीं।
कभी शादी की थीम पर बात होती, कभी हनीमून डेस्टिनेशन पर।
स्मिता कहतीं —
“मैं चाहती हूँ तुम अपनी पसंद की ड्रेस पहनो। अगर रेड कलर नहीं पहनना चाहो तो मत पहनना। तुम्हारी शादी है, तुम्हारा दिन है।”
काव्या के दिल में सम्मान और बढ़ जाता।
एक दिन स्मिता ने काव्या को कूरियर भेजा — उसमें एक प्यारा सा नोट था —
“यह साड़ी मैंने तुम्हारे लिए नहीं, अपने लिए खरीदी है। तुम्हारी शादी में मैं इसे पहनूँगी। तुम जो भी पहनोगी, मैं उसी के साथ मैच कर लूँगी।”
काव्या ने नोट पढ़कर माँ को दिखाया।
माया की आँखें भर आईं।
“काश मुझे भी ऐसी सास मिली होती,” उन्होंने धीमे स्वर में कहा।
5. शादी का दिन
शादी वाले दिन सबकुछ खूबसूरत लग रहा था।
काव्या ने हल्के पीच रंग का लहंगा पहना था, और स्मिता ने उसी शेड की साड़ी।
जब दोनों ने साथ में फोटो खिंचवाई, तो सबने कहा —
“लगता है सास-बहू नहीं, दो बहनें हैं।”
स्मिता ने सबके सामने कहा —
“मैं चाहती हूँ मेरी बहू मुझसे आगे बढ़े, क्योंकि जब बहू आगे बढ़ती है, तो घर का भविष्य आगे बढ़ता है।”
उस एक वाक्य ने माहौल बदल दिया।
माया की आँखों में गर्व था, और काव्या के दिल में एक नई प्रेरणा।
6. एक साल बाद
एक साल बाद, काव्या ऑफिस से लौटी तो देखा, स्मिता किचन में उसके साथ कॉफी बना रही हैं।
काव्या ने पूछा —
“माँ, आपने तो कहा था अब मैं बनाऊँगी!”
स्मिता हँस पड़ीं —
“अरे, मैं सिर्फ कॉफी बना रही हूँ, तुम तो मेरी कॉफी क्वीन हो। वैसे आजकल की बहुएँ बहुत बिज़ी होती हैं, सास को भी कुछ न कुछ करना पड़ता है।”
दोनों ने साथ में कॉफी पी, हँसते हुए तस्वीर खींची।
फोटो के नीचे स्मिता ने कैप्शन लिखा —
“संबंध वो नहीं जो डर से निभाए जाएँ,
संबंध वो हैं जो अपनापन बाँटें।”
यह तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हो गई।
माया ने पोस्ट देखी और मुस्कुरा दी।
उन्हें महसूस हुआ कि समाज सचमुच बदल रहा है —
अब रिश्ते ‘फर्ज़’ नहीं, ‘साझेदारी’ बन चुके हैं।
7. समापन
माया ने अपनी डायरी में लिखा —
“समय ने सास-बहू के रिश्ते की परिभाषा बदल दी है।
अब न सास को सिंहासन चाहिए,
न बहू को स्वतंत्रता की घोषणा।
दोनों बस साथ चलना चाहती हैं —
बराबरी से, अपने-अपने हिस्से की मुस्कान के साथ।”
कहानी का संदेश:
समाज में बदलाव तभी आता है जब पीढ़ियाँ एक-दूसरे की जगह खुद को रखकर सोचती हैं। सास का स्नेह और बहू का सम्मान — दोनों मिल जाएँ तो घर मंदिर बन जाता है।
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