आस्तीन का साँप

 अग्रवाल साहब की बेटी मान्या अब शादी योग्य हो चुकी थी। पढ़ाई में होशियार, स्वभाव से शांत और सलीकेदार मान्या अपने माता-पिता की आँखों का तारा थी। पर जब लड़की की उम्र बढ़ती है, तो समाज घरवालों पर सवालों की बौछार कर देता है। मोहल्ले से लेकर रिश्तेदार तक सबका यही सवाल –

“अरे शर्मा जी, बिटिया अब कितनी बड़ी हो गई है, कोई रिश्ता देखा?”

अग्रवाल साहब और उनकी पत्नी ने हर तरफ कोशिश शुरू कर दी थी। अख़बार में इश्तिहार दिए गए, रिश्तेदारों से बात की गई, यहां तक कि ऑनलाइन विवाह साइट्स पर भी नाम दर्ज कराया। कुछ ही समय में एक अच्छा रिश्ता सामने आया – लड़का पढ़ा-लिखा, कमाऊ और संस्कारी परिवार से था।

घर में खुशी का माहौल छा गया। मान्या की माँ ने तो भगवान का शुक्रिया अदा करते हुए कहा –
“लगता है बेटी की डोली सजने का समय आ गया।”

रिश्ता देखने के दिन घर की हलचल देखने लायक थी।
शगुन की गिन्नी से लेकर नाश्ते की प्लेट तक सब कुछ सलीके से सजाया गया। माँ ने बार-बार मान्या को निहारा –
“बिटिया, दुपट्टा ठीक से ले ले, मुस्कान चेहरे पर बनी रहे।”

मान्या का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। यह पल उसकी जिंदगी का सबसे अहम मोड़ था।

अग्रवाल साहब ने अपने छोटे भाई को भी साथ बुला लिया।
“भाई साथ रहेंगे तो और अच्छा लगेगा। आखिर घर का ही मामला है।”

लड़के वाले समय पर पहुँचे। बैठक में सबके बीच हल्की-फुल्की बातचीत शुरू हुई। मान्या को बुलाया गया। उसने धीरे से ट्रे उठाई और सबके सामने पेश की। उसकी आँखों में संकोच और चेहरे पर मासूमियत थी।

लड़के वालों ने ढेरों सवाल पूछे –
“खाना बना लेती हो?”
“पढ़ाई कहाँ तक की है?”
“नौकरी का इरादा है या घर ही देखोगी?”

सब कुछ सामान्य लग रहा था। यहाँ तक कि लड़के की माँ मुस्कुराकर बोलीं –
“बिटिया हमें तो बहुत भा गई।”

बैठक में मानो सब कुछ ठीक-ठाक ही चल रहा था। लेकिन अचानक माहौल बदलने लगा। फुसफुसाहट, कानाफूसी और फिर अजीब-सी खामोशी। थोड़ी देर बाद लड़के वालों ने साफ कह दिया –
“हमें रिश्ता मंज़ूर नहीं।”

यह सुनते ही अग्रवाल साहब और उनकी पत्नी के चेहरे उतर गए। मान्या की आँखों से आँसू बह निकले। वह समझ ही नहीं पा रही थी कि अचानक ऐसा क्या हो गया।

सब उदास मन से घर लौटे। मोहल्ले में कानाफूसी शुरू हो गई –
“पता नहीं क्या हुआ।”
“लगता है लड़की में ही कुछ कमी है।”

ये बातें मान्या के दिल पर गहरी चोट करतीं। वह अपने कमरे में जाकर देर तक रोती रही।

धीरे-धीरे मोहल्ले और रिश्तेदारों में यह खबर फैल गई। किसी ने कान में कहा –
“लड़के वालों को मान्या के चाचा ने ही कुछ उल्टा-सीधा कह दिया था। शायद मान्या की लंबाई या किसी और बात को लेकर।”

ये बात धीरे-धीरे मान्या की माँ तक भी पहुँची।
दिल में चुभन सी होने लगी। उन्होंने सोचा –
“क्या अपने ही छोटे भाई ने घर की खुशियों में ज़हर घोल दिया?”

लेकिन अग्रवाल साहब ने डांटते हुए कहा –
“नहीं! यह सब अफवाह है। मुझे अपने भाई पर पूरा भरोसा है। वह ऐसा कभी नहीं कर सकते।”

पत्नी चुप हो गईं, लेकिन मन का बोझ बना रहा।

कुछ दिन बाद सुबह-सुबह मान्या के चाचा जी हाथ में मिठाई का डिब्बा लेकर आए।
दरवाज़ा खोलते ही बोले –
“अरे भाभी, मुंह मीठा कीजिए। आपकी भतीजी सौम्या का रिश्ता पक्का हो गया है।”

सुनकर घर में खुशी और हैरानी दोनों छा गई। मान्या की माँ ने बधाई दी –
“बहुत अच्छा भाई साहब! कहाँ से हुआ रिश्ता?”

चाचा जी दाँत निपोरते हुए बोले –
“भाभी, जो लड़का मान्या के लिए देखने आए थे ना… वही। वह लंबा-चौड़ा था, और सौम्या की लंबाई भी ज्यादा है। मुझे तभी लगा था कि यह रिश्ता सौम्या के लिए ही सही रहेगा।”

इतना कहते ही उन्होंने हँसते हुए मिठाई का डिब्बा आगे बढ़ा दिया –
“कोई बात नहीं भाभी, मान्या के लिए और अच्छा घर ढूंढ लेंगे।”

चाचा की बातें सुनकर मान्या की माँ के दिल में भूचाल आ गया।
उन्हें यक़ीन हो गया कि वही “आस्तीन का साँप” है, जिसने उनकी बेटी की खुशियों में ज़हर घोल दिया।

वह मन ही मन सोचने लगीं –
“जिस भाई को हमने अपने बच्चों जैसा पाला, उसी ने हमारी बेटी के भविष्य पर चोट की। यह तो अपने घर की खुशियों को जलाने जैसा है।”

माँ की आँखों में आँसू आ गए। उन्हें यह भी महसूस हुआ कि रिश्ते-नातों में कभी-कभी सबसे बड़ा धोखा अपनों से ही मिलता है।

मान्या चुपचाप यह सब सुन रही थी। उसका दिल टूट चुका था। जिस रिश्ते को लेकर उसने सपने सजाए थे, वही रिश्ता उसकी आँखों के सामने उसकी बहन को दे दिया गया।

वह सोचने लगी –
“क्या एक लड़की की कीमत इतनी कम है कि उसे परखा और ठुकरा दिया जाए? और क्या अपने ही रिश्तेदार हमारी कमजोरी बन जाएँ?”

पर आँसू पोंछकर उसने ठान लिया –
“मैं इस अपमान को अपनी जिंदगी की हार नहीं बनने दूँगी। मुझे खुद को साबित करना होगा।”

उस दिन के बाद मान्या ने अपने करियर पर ध्यान देना शुरू किया। उसने पढ़ाई के साथ-साथ एक नई दिशा चुनी। धीरे-धीरे उसने खुद का छोटा-सा बिज़नेस शुरू किया। समाज चाहे कुछ भी कहे, पर उसने हार नहीं मानी।

माँ ने भी मन ही मन ठान लिया कि अब बेटी को किसी पर निर्भर नहीं रहने देंगी। उन्होंने उसका हर कदम पर साथ दिया।

समय बीतने के साथ लोगों को सच्चाई समझ आने लगी। चाचा जी ने अपनी बेटी सौम्या का रिश्ता तो पक्का करा दिया, लेकिन मान्या ने अपने आत्मसम्मान और मेहनत के दम पर खुद की अलग पहचान बना ली।

आज जब लोग अग्रवाल साहब के घर आते हैं, तो कहते हैं –
“आपकी बेटी कितनी समझदार और काबिल है। आपने सच में उसे अच्छे संस्कार दिए।”

और माँ के मन में यह बात हमेशा गूँजती रहती –
“कभी-कभी घर की खुशियों को सबसे बड़ा खतरा बाहर वालों से नहीं, बल्कि आस्तीन के साँप से होता है।”

स्वरचित मौलिक

प्राची लेखिका

बुलंदशहर उत्तर प्रदेश


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