गुरु का मान

   रिटायर हो चुके प्रोफ़ेसर माधव प्रसाद जी अख़बार के पन्ने पलटते हुए अपने चश्मे के ऊपर से बार-बार घड़ी देख रहे थे। आज उनका अस्पताल जाने का मन था — आँखों की धुंधलाती रोशनी को लेकर डॉक्टर से परामर्श लेना चाहते थे।

पत्नी कमला देवी ने रसोई से आवाज़ दी —
“सुनिए, इतने दूर अस्पताल अकेले मत जाइए। किसी को साथ ले जाइए।”

माधव जी ने मुस्कुराते हुए कहा —
“अरे भाग्यवान, अब कौन मिलेगा इस बुढ़ापे में? पड़ोसी सब अपनी-अपनी दुनिया में व्यस्त हैं। और रही बात विद्यार्थियों की — अब भला किसे याद होगा अपने बूढ़े शिक्षक को?”

यह कहते हुए उन्होंने लाठी उठाई और धीमे कदमों से अस्पताल की ओर चल पड़े।

सरकारी अस्पताल में usual भीड़ थी। लंबी लाइन देखकर माधव जी ने सोचा कि आज तो आधा दिन यहीं निकल जाएगा। वह थक कर एक बेंच पर बैठ गए। उनकी फाइल हाथ से छूटकर गिर गई। तभी एक युवा नर्स झटपट उठकर उनके पास आई और बोली 

“बाबूजी, ज़रा बैठ जाइए, मैं आपकी फाइल उठा देती हूँ।”

माधव जी ने आश्चर्य से कहा —
“बिटिया, तुमको तो मेरे पैर छूने चाहिए थे, यह सेवा क्यों कर रही हो?”

नर्स मुस्कुराई लेकिन कुछ बोली नहीं। उसने फाइल उठाकर डॉक्टर के केबिन में जमा कर दी और बोली —
“आपका नम्बर जल्दी आ जाएगा।”

माधव जी को यह सब अजीब-सा लग रहा था।

करीब पंद्रह मिनट बाद ही उनका नाम पुकारा गया। अंदर गए तो डॉक्टर ने आदर से खड़े होकर उनके पैर छुए।

“गुरुजी, पहचानिए मुझे! मैं अमित हूँ। दसवीं कक्षा में गणित पढ़ता था आपके विद्यालय में। 1998 की बैच।”

माधव जी एकदम से चौंक गए।
“अरे, अमित! वही शरारती लड़का, जिसे हमेशा पहाड़े याद नहीं रहते थे?”

डॉक्टर हँसते हुए बोले —
“हाँ सर, वही। आपने ही तो मुझे डाँटने के बजाय प्रोत्साहित किया था। याद है, परीक्षा से एक दिन पहले जब मैं रोते हुए आपके घर आया था कि ‘गुरुजी, अब मैं फेल हो जाऊँगा’, तब आपने पूरी रात मुझे पढ़ाया। आपने कहा था — अमित, अगर मन से कोशिश करोगे तो असंभव कुछ नहीं है। उसी रात आपकी मेहनत से मैंने गणित के सारे सवाल हल किए और परीक्षा पास की। उसी दिन मैंने ठान लिया था कि मुझे भी लोगों की मदद करनी है। और आज देखिए, मैं डॉक्टर बनकर आपके सामने खड़ा हूँ।”

माधव जी की आँखें भर आईं। उन्होंने अमित का हाथ पकड़ लिया।

अमित ने उनकी आँखों की जाँच की और बोला —
“सर, घबराने की ज़रूरत नहीं है। बस मोतियाबिंद की शुरुआत है। एक छोटा-सा ऑपरेशन करना होगा। और हाँ, इसकी सारी ज़िम्मेदारी मेरी होगी। मेरे रहते आपको पैसे खर्च करने की ज़रूरत नहीं।”

“न-न बेटा, मैं तुम्हारा बोझ नहीं बनूँगा। मेरी पेंशन काफी है।” माधव जी ने संकोच से कहा।

अमित बोला —
“सर, यह बोझ नहीं, बल्कि मेरी गुरु-दक्षिणा है। आज जो भी हूँ, आपकी वजह से हूँ। अगर आपने मुझे उस रात पढ़ाया न होता, तो शायद मैं पढ़ाई ही छोड़ देता। मुझे सेवा करने दीजिए।”

शाम को जब माधव जी घर लौटे तो कमला देवी ने पूछा —
“इतनी जल्दी कैसे आ गए? अस्पताल तो भीड़ से भरा रहता है।”

माधव जी ने भावुक होकर सारी बात बताई। कमला देवी की आँखें भी नम हो गईं।
“देखा, आप कहते थे कि अब कौन याद करेगा। ज़माना बदल सकता है, लेकिन गुरु का मान कभी नहीं बदलता।”

कुछ दिनों बाद ऑपरेशन की तारीख तय हुई। अस्पताल पहुँचे तो अमित पहले से तैयार खड़ा था। उसने पूरी टीम को निर्देश दिया —
“यह मेरे गुरुजी हैं। इनकी देखभाल में कोई कमी न रह जाए।”

ऑपरेशन सफल रहा। माधव जी को जब होश आया तो सबसे पहले उन्होंने अमित को पास बैठा देखा।
“बेटा, तुमने तो मेरे बेटे से भी बढ़कर सेवा की।”

अमित ने कहा —
“सर, यह तो मेरी ज़िम्मेदारी थी। आपके आशीर्वाद के बिना मेरी पढ़ाई अधूरी थी। आज मैं जो भी हूँ, आपकी शिक्षा की वजह से हूँ।”

ऑपरेशन से उबरने के बाद माधव जी अपने गाँव लौट आए। वहाँ उन्होंने अपने अनुभव को मोहल्ले के बच्चों और अभिभावकों से साझा किया।
“बच्चों, याद रखना — शिक्षक केवल पढ़ाने के लिए नहीं होता, बल्कि सही राह दिखाने के लिए भी होता है। और शिक्षक का सम्मान जीवनभर करना चाहिए। एक दिन वही सम्मान लौटकर तुम्हारी ताक़त बन जाता है।”

बच्चे ताली बजाने लगे और माता-पिता भी गदगद हो उठे।

माधव जी सोचने लगे —
“हम भले ही बूढ़े हो जाएँ, पर ज्ञान और संस्कार कभी बूढ़े नहीं होते। जो बीज हम बोते हैं, वही एक दिन वृक्ष बनकर हमें छाँव देते हैं।”

उस दिन उन्होंने यह सच्चाई पूरे दिल से स्वीकार की कि ज़माना कितना भी बदल जाए, पर सच्चे विद्यार्थी कभी अपने गुरु को नहीं भूलते।


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