बरामदे में चारपाई पर बैठे गोपाल जी अख़बार पढ़ रहे थे। तभी उनका छोटा बेटा विनय पत्नी सुनीता के साथ आ गया। दोनों के चेहरे पर हल्की घबराहट साफ झलक रही थी।
"पिताजी… हमें आपसे एक ज़रूरी बात करनी है," विनय ने संकोच से कहा।
गोपाल जी ने अख़बार मोड़ते हुए चश्मा उतारा और गम्भीर स्वर में बोले—
"हाँ, बोलो। क्या बात है?"
सुनीता ने धीरे से कहा—
"पापा, हमारी बेटी रिया ने शादी के लिए हाँ कह दी है। लड़का उसके कॉलेज का साथी है—नाम आर्यन है।"
गोपाल जी ने भौंहें चढ़ाईं—
"कौन जात का है?"
विनय ने हिम्मत जुटाकर कहा—
"पापा, वह हमारे समाज का नहीं है। पर बहुत अच्छे संस्कारों वाला और पढ़ा-लिखा लड़का है। रिया उसके साथ खुश रहेगी।"
गोपाल जी ने गुस्से से चौकड़ी मारी और बोले—
"बस! यही सुनना बाकी रह गया था। अपनी नाक कटवाने के लिए अब मुझसे मत कहो। बिरादरी में कैसे मुँह दिखाऊँगा? लोग कहेंगे कि गोपाल जी की पोती ने घर की परंपरा तोड़ दी।"
इतना हंगामा सुनकर अंदर से दादी, सावित्री देवी, बाहर आईं। उन्होंने स्थिति को शांत करने की कोशिश की।
"अरे भाग्यवान," उन्होंने पति से कहा, "समझने की कोशिश कीजिए। ज़माना बदल गया है। बच्चों की खुशी सबसे अहम है।"
गोपाल जी ने भड़ककर कहा—
"तुम चुप रहो। लड़की अपने मन की करेगी तो हम बुजुर्गों की इज्ज़त मिट्टी में मिल जाएगी।"
लेकिन सावित्री देवी का चेहरा गंभीर था।
"जीवन भर इज्ज़त ढोते-ढोते हम क्या पाते हैं? याद है न… हमारी बड़ी बेटी किरण की शादी आपने बिरादरी की मर्यादा बचाने के लिए करवाई थी। और आज? वो रोज़ आँसू बहाती है, पति से मार खाती है। क्या यही इज्ज़त है?"
गोपाल जी एक पल को चुप हो गए। लेकिन उनका अहंकार अभी भी कायम था।
शाम को रिया घर आई। उसने दादा के पैरों में बैठकर कहा—
"दादा, मैं आपसे कुछ छिपाना नहीं चाहती। मैं आर्यन से शादी करना चाहती हूँ। उसने कभी मुझसे झूठ नहीं बोला, हमेशा सम्मान दिया है। अगर सिर्फ जाति के कारण आप मुझे रोकेंगे तो यह मेरे लिए नाइंसाफी होगी।"
गोपाल जी गुस्से से काँप उठे।
"तुम्हें मेरी इज्ज़त की परवाह नहीं?"
रिया की आँखों में आँसू थे।
"दादा, आपकी इज्ज़त मेरे लिए बहुत बड़ी है। पर मेरी ज़िंदगी और मेरी खुशी भी तो कोई मायने रखती है। आप ही कहते थे कि सच्चाई और संस्कार सबसे ऊपर हैं। आर्यन में ये दोनों बातें हैं। फिर जाति क्यों आड़े आए?"
रीना की बातें सुनकर दादी की आँखें भीग गईं।
इधर, गाँव में खबर फैल चुकी थी। बिरादरी के लोग घर पर आने लगे। कोई कहता—
"गोपाल जी, यह शादी हुई तो पूरा खानदान बदनाम हो जाएगा।"
कोई ताना कसता—
"आज आपने हाँ कर दी तो कल और लड़कियाँ भी जाति तोड़कर शादी करेंगी।"
गोपाल जी का मन डगमगा रहा था। उन्हें समाज के तानों से ज्यादा डर लग रहा था।
इसी बीच विनय ने अपने पिता का हाथ पकड़ते हुए कहा—
"पिताजी, मैंने रिया को अच्छे संस्कार दिए हैं। उसने गलत रास्ता नहीं चुना। वह सब कुछ सोच-समझकर निर्णय ले रही है। हम अगर उसकी खुशी छीन लेंगे तो ज़िंदगी भर पछताना पड़ेगा।"
गोपाल जी चुपचाप बैठे रहे। उन्हें बरसों पहले की याद आई—जब उन्होंने बिरादरी के दबाव में अपनी बड़ी बेटी किरण का जीवन बर्बाद कर दिया था।
अगले दिन बिरादरी की पंचायत बुलाई गई। सब गोपाल जी पर दबाव डाल रहे थे कि शादी रोक दें।
तभी सावित्री देवी खड़ी हुईं और बोलीं—
"आप सब इज्ज़त की बात कर रहे हैं। लेकिन इज्ज़त किससे है? अगर हमारी बेटियाँ रो-रोकर जीएँ, अगर उनका पति उन्हें सम्मान न दे, तो क्या वह बिरादरी की इज्ज़त है? हमारी इज्ज़त तो तब है जब हमारे बच्चे खुश रहें, सुरक्षित रहें।"
सभा में सन्नाटा छा गया।
विनय ने भी साफ़ कहा—
"मेरे लिए मेरी बेटी की खुशी सबसे ऊपर है। अगर उसे अपने जीवन साथी में खुशी मिल रही है, तो मैं उसका साथ दूँगा, चाहे बिरादरी मुझे बहिष्कृत कर दे।"
यह सुनकर कुछ लोग फुसफुसाने लगे। लेकिन कई बुजुर्गों ने धीरे-धीरे सिर हिलाना शुरू किया।
"बात में दम है। आखिर खुशी ही तो चाहिए।"
गोपाल जी का चेहरा कठोर से नरम पड़ने लगा।
अचानक उन्होंने गहरी सांस ली और बोले—
"ठीक है। अगर मेरी पोती की खुशी इसी में है, तो मैं उसका विरोध नहीं करूँगा। समाज कुछ भी कहे, मैं उसके साथ हूँ।"
रिया दौड़कर दादा के गले लग गई। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे, लेकिन ये आँसू खुशी के थे।
शादी धूमधाम से हुई। बिरादरी के कुछ लोग आए, कुछ ने किनारा कर लिया। लेकिन धीरे-धीरे वही लोग समझ गए कि खुशी जात-पात से बड़ी है।
गोपाल जी ने भी महसूस किया कि जिनके लिए उन्होंने जिंदगी भर “इज्ज़त” ढोई, वही लोग थोड़े दिनों में भूल जाते हैं। लेकिन बच्चों की मुस्कान और उनका सुख—वही असली इज्ज़त है।
मूल लेखिका : संगीता अग्रवाल
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