दोपहर का समय था।सुमित्रा अपने पसीने से तर चेहरे पर पल्लू रखे खड़ी थी। गैस पर दाल चढ़ी थी, और बगल के बर्नर पर चाय उबल रही थी।
इतने में उसकी सात साल की बेटी, आर्या, अपने खिलौने छोड़कर वहाँ आ गई।
“माँ…”
“हाँ, बेटा?” सुमित्रा ने जल्दी से आँच धीमी की।
“माँ, तुम दिन भर काम करती रहती हो, थक जाती हो… फिर भी सब लोग तुम्हारे साथ वैसे व्यवहार नहीं करते जैसे छोटी चाची के साथ करते हैं।”
सुमित्रा ने मुस्कुराने की कोशिश की — पर वो अंदर से दुखी थी।
“क्यों ऐसा कह रही हो, बेटा?”
“देखो ना, छोटी चाची तो घर का कोई काम नहीं करतीं, फिर भी सब उनका बहुत आदर करते हैं। पापा भी उनसे बहुत अच्छे से बात करते हैं। लेकिन तुमसे तो कभी-कभी झगड़ भी लेते हैं। ऐसा क्यों?”
सवाल सीधा था, लेकिन जवाब सुमित्रा के लिए कठिन था।
उसने एक पल को बेटी की मासूम आँखों में देखा —
वो धीरे से बोली —
“अरी बेटी, तेरी छोटी चाची नौकरी करती है ना, ऑफिस जाती है। इसलिए सब लोग उनका आदर करते हैं। उन्हें लगता है वो बाहर काम करती हैं, पैसे कमाती हैं, घर की शान हैं।”
“लेकिन माँ,” आर्या ने मासूमियत से पूछा, “तुम भी तो काम करती हो। सुबह से रात तक काम ही तो करती रहती हो — झाड़ू, बर्तन, खाना, कपड़े… ये सब भी तो काम है ना?”
सुमित्रा का हाथ ठिठक गया। उसके होंठ काँपने लगे।
उसने कुछ कहने की कोशिश की, पर गले में जैसे कुछ अटक गया।
फिर उसने आर्या को पास खींचकर अपने सीने से लगा लिया।
“हाँ बेटा… काम तो है, पर इसे लोग ‘काम’ नहीं समझते।”
आर्या ने सिर उठाकर माँ की आँखों में देखा —
“क्यों नहीं समझते माँ?”
सुमित्रा ने एक गहरी साँस ली —
“क्योंकि बेटी, इस काम की कोई तनख्वाह नहीं मिलती, कोई तारीफ नहीं होती। घर की औरत जो बिना वेतन काम करे, वो सबको ‘फर्ज़’ लगता है। जो बाहर जाकर वही मेहनत करे, उसे ‘काबिलियत’ कहते हैं।”
आर्या कुछ देर चुप रही। फिर धीरे से बोली —
“तो माँ, तुम भी ऑफिस क्यों नहीं जातीं?”
सुमित्रा के दिल में जैसे कोई पुराना घाव कुरेद दिया ।
उसने मुस्कुराने की कोशिश की — “क्योंकि मैं… मैं पढ़ी नहीं हूँ, बेटा।”
“नानाजी ने तुम्हें स्कूल क्यों नहीं भेजा?”
“क्योंकि मैं सात बहनें थी।”
बस इतना कहकर सुमित्रा ने मुँह फेर लिया और किचन में घुस गई।
पर आँसू उसके गालों पर बेमन बह निकले।
सुमित्रा के कानों में अतीत की यादें गूँजने लगीं।
वो याद करने लगी — जब वो छोटी थी, तब गाँव में लड़कियों का स्कूल जाना कोई ज़रूरी बात नहीं थी।
उसके पिता कहते थे, “लड़कियाँ पढ़कर क्या करेंगी? शादी तो करनी ही है, बस सिलाई-बुनाई सीख लो, वही काफी है।”
माँ चुप रहतीं। घर में सात बेटियाँ थीं — सबका खर्च, सबकी शादी… पढ़ाई का सवाल ही नहीं उठता था।
सुमित्रा को पढ़ने का बहुत शौक था।
वो स्कूल के बाहर से गुजरते बच्चों को देखती और सोचती — काश मैं भी जाती!
पर जब उसने एक बार ज़िद की, पिता ने डाँटते हुए कहा, “बहुत बोलने लगी है, घर का काम सीख, यही तेरी पढ़ाई है।”
वो दिन था, जब उसने किताबों से रिश्ता तोड़ लिया था — पर मन के किसी कोने में वो अधूरा सपना आज भी ज़िंदा था।
शादी के बाद शहर आई तो सोचा था, अब सब नया होगा, शायद अपनी पहचान बना पाएगी।
लेकिन किस्मत ने वही पुरानी लकीरें दोहरा दीं।
पति मोहन अच्छे थे, पर पुराने सोच के।
“औरत की जगह घर में ही है,” वे कहते।
शादी के शुरुआती सालों में सुमित्रा ने कई बार कहा, “मैं भी कुछ काम करना चाहती हूँ, सिलाई ही सही।”
मोहन हँसकर बोलते, “तू क्या करेगी बाहर जाकर? तुझे घर ही नहीं संभलता।”
धीरे-धीरे उसने अपनी इच्छा को मार दी ।
घर, बच्चे, सास-ससुर — यही उसकी दुनिया बन गए।
और जब आर्या का जन्म हुआ, तो उसने सोचा, अब मेरी बेटी वो सब करेगी जो मैं नहीं कर पाई।
किचन में खड़ी सुमित्रा यादों में खोई थी कि तभी उसकी देवरानी — नेहा — बाहर से आईं।
“दीदी, नमस्ते! ओह गॉड, कितनी गर्मी है ना आज!”
“हाँ, आओ बैठो,” सुमित्रा ने मुस्कुराकर कहा।
नेहा ने बैग उतारकर कहा, “आज ऑफिस में इतनी मीटिंग्स थीं कि दिमाग घूम गया। वैसे दीदी, आप भी न, कितना अच्छे से संभालती हैं घर को! मैं तो थक जाती हूँ।”
सुमित्रा ने कहा, “थकान सबको होती है, बस किसी की दिखती है, किसी की नहीं।”
नेहा मुस्कुराई — “आप चाहें तो मैं आपको भी अपने ऑफिस में जॉब लगवा दूँ।”
“मैं पढ़ी-लिखी कहाँ हूँ नेहा,” सुमित्रा ने धीरे से कहा।
“दीदी, पढ़ाई नहीं, आत्मविश्वास चाहिए। आपको तो जीवन का सारा अनुभव है!”
सुमित्रा ने उसकी बात को यूँ ही टाल दिया, पर उस रात वो सोचती रही —
क्या सच में मैं कुछ नहीं कर सकती? क्या मेरी ज़िंदगी सिर्फ़ घर की दीवारों तक ही सीमित है?
अगले दिन उसने आर्या को स्कूल छोड़ा और लौटते वक्त पास के महिला केंद्र में एक नोटिस देखा — “महिला स्वयं सहायता समूह में सिलाई प्रशिक्षण हेतु आवेदन आमंत्रित।”
सुमित्रा का मन धड़कने लगा।
उसने चुपचाप जाकर फॉर्म भर दिया।
सिर्फ़ दो घंटे का कोर्स था, पर उसके लिए यह नया सफर था।
दिन बीतते गए — वो सीखती रही, मेहनत करती रही।
सिलाई मशीन की आवाज़ अब उसके भीतर की खाली जगह भरने लगी थी।
तीन महीने बाद उसने छोटी-मोटी सिलाई का काम शुरू किया।
शुरुआत में घरवालों ने मज़ाक उड़ाया, पर जब उसके बनाए कपड़े मोहल्ले में पसंद किए जाने लगे, तो लोग तारीफ करने लगे।
धीरे-धीरे उसने घर के खर्च में हाथ बँटाना शुरू किया।
एक दिन मोहन ने कहा,
“सुमित्रा, तुम्हारे बनाए कपड़ों की तो दुकान में भी माँग होने लगी है, वाकई अच्छा कर रही हो।”
उसके दिल में जैसे कोई फूल खिल गया।
आर्या ने दौड़कर गले लगाया —
“माँ, अब तो तुम भी पैसा कमाती हो ना!”
सुमित्रा हँस पड़ी — “हाँ बेटा, अब मैं भी काम करती हूँ। लेकिन सबसे बड़ा काम क्या है, पता है?”
“क्या, माँ?”
“अपने सपने को फिर से जगाना।”
कुछ महीनों बाद देवरानी नेहा बोलीं —
“दीदी, आपकी जज्बा देख मैं बहुत प्रेरित हो गई हूँ । अब लगता है, हम सबको मिलकर दूसरी औरतों की को भी उनके पैरो पर खड़ा करना चाहिये ।”
सुमित्रा मुस्कुराईं।
“हाँ नेहा, पर असली बदलाव तब होगा जब हमारी बेटियाँ खुद पर विश्वास करना सीखेंगी।”
आर्या पास आई और बोली —
“माँ, मैं भी खूब पढ़ाई करूँगी। ताकि किसी को कभी यह ना कहना पड़े कि ‘वो तो सात बहनों में से एक थी।’”
सुमित्रा ने बेटी को गले लगाते हुए कहा —
“हाँ बेटा, तू वही बनेगी जो मैं बनना चाहती थी।”
खिड़की से आती ठंडी हवा ने उनके चेहरे को छुआ —
जैसे अतीत की परछाइयाँ मिट रही हों,
और एक नई सुबह दस्तक दे रही हो।
क्योंकि उस दिन सुमित्रा ने समझ लिया था —
“घर का काम करने वाली भी उतनी इज़्ज़त का हक़दार है,
जितनी बाहर जाकर नौकरी करने वाली को मिलता है।
मूल लेखिका
मीनी मिश्रा
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