मनोरथ

 धूप की किरणें कच्ची झोपड़ी के फूस वाले छप्पर को चीरती हुई भीतर तक आ रही थीं।

सुनैना ने अपने फटे हुए आँचल से पसीना पोंछा और फिर अपनी हथेली में पड़े मजदूरी के पैसे गिनने लगी। कुल मिलाकर दो सौ रुपए थे — उसी में आज का खाना बनना था, बेटी के ट्यूशन की फीस देनी थी और कल का राशन भी लाना था।

बगल में रखे एक छोटे स्टूल पर बैठी थी उसकी तेरह बरस की बेटी — छुटकी।
छुटकी की आँखों में मासूम चमक थी, मगर उसके चेहरे पर उम्र से पहले की जिम्मेदारी झलकती थी।
वो धीरे से बोली,
“माई! थोड़िक विश्राम कर लऽ न! हम तोहरा सर दबा देत बानी।”

सुनैना मुस्कुराई, थकान के बावजूद उसके चेहरे पर अपनापन झलक उठा।
“ना बेटी, अभी का आराम? जब तक तू पढ़ लिख के कुछ बन नै जात बाड़ू, तब तक हमके नींद कहां।”

छुटकी ने माँ का सिर अपनी गोद में रखा और धीमे से बोली,
“माई! तो दुःख नै कर, हम जभ्भे नौकरी करबै... तब तोरा मजूरी नै करय पड़तौ। हम तोरा रानी बना के रखबौ।”

सुनैना की आँखें नम हो गईं। उसने बेटी को कसकर गले लगाया।
“हाँ बेटी, हमरो इहे सपना हइ। तोरा टीशन भेजे खातिर हम दिन भर मजूरी कर रहली हईं। तू खूब मन लगा के पढ़। इहे साल तोरा दसवीं किलास के बोर्ड परीच्छा हौ। भगवान से प्रार्थना कर बानी की तू पास हो जा, ताकि तोरा जीवन बदल सके।”

छुटकी के चेहरे पर आत्मविश्वास झलक उठा।
“माई! गरीब लड़की के पढ़े खातिर सरकारो से बहुत मदद मिल रहल हइ; ड्रेस, किताब, कॉपी, स्कॉलरशिप सब मिल रहल हइ। दसवीं में फर्स्ट अइला पर सरकार से बड़का ईनाम मिलत हइ।”

सुनैना ने बेटी के सिर पर हाथ फेरा और बोली,
“हाँ बिटिया, सरकार गरीब लोग खातिर बहुत कुछ करत हइ, पर मेहनत तो अपने हाथे से करनी पड़त हइ। भगवान भी उसी के साथ रहेला जे खुद कोशिश करे।”


गाँव के उस छोटे से सरकारी स्कूल तक पहुँचने के लिए छुटकी रोज़ तीन किलोमीटर पैदल चलती थी।
पैरों में टूटी-फूटी चप्पलें थीं, पर हौसला बड़ा था।
स्कूल में सब बच्चे उसे “छोटकी इंजिनियर” कहकर चिढ़ाते, क्योंकि वो हमेशा कहती थी —
“हम बड़का इंजिनियर बनबौ।”

गाँव के लोग हँसते — “अरे, सुनैना की बेटी इंजिनियर बनेगी? जब माई खुद ईंट ढोती है!”
पर सुनैना इन तानों को सुनकर भी मुस्कुराती रहती थी।
वो जानती थी — सपने अमीर-गरीब नहीं देखते, बस मेहनती लोग देखते हैं।


रात में जब पूरा मोहल्ला नींद में डूबा रहता, तब झोपड़ी की मद्धिम रोशनी में छुटकी पढ़ाई करती।
सुनैना उसके पास बैठी रहती, कभी पंखा झलती, कभी दीया बचाती।
कई बार तेल खत्म हो जाता, तो दोनों अंधेरे में बैठ जातीं।
सुनैना कहती,
“बिटिया, अब आराम कर ले।”
छुटकी मुस्कुरा देती, “ना माई, आज वाला चैप्टर पूरा कर के ही सोबौ।”

कभी-कभी पेट खाली रहता, पर मन में आशा भरी रहती।
सुनैना जानती थी — भूख एक दिन की होती है, पर शिक्षा जीवनभर का सहारा है।


परीक्षा का समय आया।
छुटकी रोज़ चार बजे उठकर पढ़ाई करती।
परीक्षा के दिन सुनैना ने उसके माथे पर तिलक लगाया —
“जा बेटी, भगवान तोरे साथ हैं। हमरा आशीर्वाद तोहरे संग हर वक्त रहत।”

छुटकी ने मुस्कुराकर कहा,
“माई, हम फर्स्ट आइबौ।”

उस दिन सुनैना ने मंदिर में दिया जलाया और भगवान से प्रार्थना की —
“हे माता रानी, हमरा बिटिया के मेहनत रंग लावे।”


तीन महीने बाद परिणाम घोषित हुआ।
स्कूल में नाम आया — “छुटकी रानी — प्रथम स्थान।”
गाँव के मास्टर जी खुद सुनैना के घर दौड़े आए।
“अरे सुनैना, बधाई हो! तेरी बिटिया तो पूरे ब्लॉक में फर्स्ट आई है। सरकार की तरफ से उसे स्कॉलरशिप भी मिल रही है।”

सुनैना के हाथ से आटा गिर गया।
उसकी आँखों में चमक आ गई —
“सच मास्टर जी? हमारी छुटकी?”

छुटकी दौड़ती हुई आई, “माई, देख न!”
उसने रिजल्ट दिखाया, और दोनों माँ-बेटी एक-दूसरे को गले लगाकर रो पड़ीं।
यह रोना दर्द का नहीं, गर्व और खुशी का था।

गाँव के वही लोग जो पहले ताने मारते थे, अब तारीफ करने लगे।
“सुनैना, तेरी बेटी तो गाँव का नाम रोशन कर दी।”


छुटकी ने आगे पढ़ाई के लिए शहर का रुख किया।
सरकार की स्कॉलरशिप और स्कूल के टीचर की मदद से उसे एक अच्छे कॉलेज में दाखिला मिल गया।
सुनैना ने अपनी शादी के जेवर  बेच दी ताकि बेटी के हॉस्टल का खर्च निकल सके।

हर महीने वह मजदूरी से कुछ पैसे बचाकर भेजती।
“माई, इतना मत कर, हम संभाल लेंगे,” छुटकी कहती।
सुनैना जवाब देती —
“माई जब तक जिए, बेटी के सपने में अपना खून दे सके, वही उसका गर्व हइ।”


सालों बीत गए।
छुटकी अब बड़ी हो चुकी थी।
उसने पढ़ाई पूरी की और एक मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी पा ली।
वह अब शहर के ऊँचे ऑफिस में बैठती थी, जहां लोग उसे “मिस छुटकी रानी” कहकर बुलाते थे।
पर उसके भीतर वही गाँव की बेटी थी जो अपनी माँ के हाथों का स्पर्श कभी नहीं भूली थी।

पहली सैलरी के दिन उसने माँ को फोन किया —
“माई, हम जइसे वादा कईले रहीं, ओह वादा के निभवले बानी। अब तोरा मजूरी ना करय पड़तौ।”

सुनैना की आवाज भर्रा गई।
“भगवान तोहरा लंबा उमर दे बेटी। तोरे बाप के सपना पूरा कर दिहलू तू।”


एक महीने बाद छुटकी खुद गाँव आई।
हाथ में गिफ्ट, मन में गर्व और आँखों में आँसू थे।
वो माँ के पैरों पर गिर पड़ी —
“माई, अब तू आराम कर। अब तोरा हाथ सिर्फ़ आराम करेगा, ईंट नै।”

सुनैना की आँखों से आँसू बह निकले।
“हम तो सोचेबो नै सकेली की तोहर सपना एतना दूर तक पहुँच जाई।”

आँगन में बंधी एक गाय खड़ी थी, जिसके पैर में चोट थी।
सामने उसकी बछिया अपने जीभ से उसकी चोट सहला रही थी।
सुनैना कुछ पल तक उस दृश्य को देखती रही, फिर बोली —
“देख बिटिया, भगवान सबके संग रहेला। जैसे बछिया अपनी माँ का घाव सहला रहल बानी, ओहनी तरह तू अपने माई के जीवन का हर दर्द मिटा दिहलू।”

छुटकी मुस्कुरा दी।
“माई, तोरा खुशी में हमार जीवन बस गइल।”

सुनैना ने बेटी को सीने से लगा लिया।
अब उसके आँसू दर्द के नहीं, गर्व के थे।

उसकी हथेलियों की कठोरता में अब कोमलता लौट आई थी।
झोपड़ी के उस अंधेरे कोने में अब एक दीपक जल रहा था —
वो दीपक जो बेटी की मेहनत, माँ की त्याग और सपनों की रोशनी से जल रहा था।

सुनैना की तपस्या रंग लाई थी।
गरीबी हार गई थी —
और एक माँ की ममता जीत गई थी।
मूल लेखिका
मिन्नी मिश्रा 


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