नेत्रा बहुत ही प्यारी और चुलबुली बच्ची थी।उसके माता-पिता नहीं थे,भैया भाभी के साथ रहती थी।वह बहुत ही प्यारी प्यारी बातें करती थी ।जो भी गाने सुन लेती थी उसको गाते रहती थी।उसे जल्द ही गाने याद हो जाते थे। स्कूल में भी कविताएं पढ़ाई जाती उसे घर में गाते रहती। घर में कोई मेहमान आते तो भैया भाभी उसे गाना या कविता सुनाने को कहते ।वह खुशी खुशी सबको गाकर सुनाती। भैया उसे कई प्रोग्राम में ले जाने लगे।उसे छोटी छोटी कहानियां सुनाते थे जो उसे झट से याद हो जाती ।
धीरे-धीरे उसके भैया के मन में एक विचार आने लगा।वो नेत्रा को भक्ति गीत सिखाने लगे ।धार्मिक प्रसंग सुनाते। इस प्रकार उसे प्रवचन के लिए तैयार करवा लिया।भैया भाभी उसे लेकर नए शहर में आ गए।
"नेत्रा देवी छोटी सी प्रवचन वाचिक"
के नाम से प्रचार करने लगे।लोग उसके प्रवचन सुनने आते थे।भजनों को सुनकर झूमने लगते थे।चढ़ावा चढ़ाते थे। शुरुआत में यह सब नेत्रा को बहुत अच्छा लगता था। सब उसकी प्रशंसा करते ,देवी मानकर सम्मान करते थे।
भैया भाभी उसे किसी से मिलने जुलने नहीं देते थे।उसका स्कूल जाना भी बंद हो गया। धीरे धीरे उसे यह सब बातें महसूस होने लगी। अब उस सादा जीवन जीना पड़ता था। अच्छे कपड़े नहीं पहन सकती थी ।साध्वी के नाम से उसका प्रचार प्रसार कर दिया गया था।वह प्रवचन देती ,भक्ति गीत गाती तो सब उसे प्रणाम करते ,देवीजी कहते। इस प्रकार उसका जीवन पूरी तरह बदल गया था ।
अब उसे यह सब बंधन लगने लगा था ।उसे अपनी सहेलियों की और स्कूल की याद आती।पर भैया उसे पूर्ण रूप से अपने नियंत्रण में रखते।अपने मन से कहीं आने जाने नहीं देते। उसके कार्यक्रमों से अपार धन मिलता । भैया का लालच बढ़ने लगा। इतना धन देखकर उसके भैया भाभी बहुत खुश होते । लेकिन उसमें से कुछ भी नेत्रा के लिए नहीं होता था। उसके विवाह के बारे में कभी भी भैया ने नहीं सोचा। सब जगह यही प्रचार कर दिया की इतनी छोटी उम्र में ही उसने बैराग ले लिया है।उसका साथ देने वाले कोई भी नहीं थे ।
उसके भैया की बेटी थी ईशा । वह अपनी बुआ से बहुत प्यार करती थी और उसके पास आ जाती थी।प्यारी प्यारी बातें करती और खेलती थी। धीरे-धीरे नेत्रा उसे अपने ही जैसे गाने और कहानियाँ सिखाने लगी। उसको रोज इसका अभ्यास करवाती। नेत्रा के मन में यही विचार आने लगा कि भैया ने मुझे बंधन में रखा ,मेरा जीवन अपने स्वार्थ और लालच के लिए बदल दिया तो मैं भी उनकी बेटी को अपने ही जैसी साध्वी बना दूंगी ।अब वह अपनी योजना पर धीरे धीरे काम करने लगी।उसने ईशा को प्यार से समझा दिया कि यह सब अपने माँ पापा के सामने ना करे। ऐसा करके नेत्रा को बहुत संतुष्टि मिलती थी।
एक दिन ईशा उसके कमरे में खेल रही थी ।उसकी मासूमियत को देखकर नेत्रा को अपने बचपन की याद आ गई कि कैसे उसका जीवन बदल गया । उसे सब कुछ क्रमशः याद आने लगा। उसे झटका सा लगा कि मैं ईशा के साथ क्या कर रही हूं ।अगर मैं इसे भी अपने ही जैसे बना दूंगी तो मुझमें और भैया में क्या अंतर रह जाएगा। भैया ने मेरे साथ गलत किया था। अगर मैं ईशा को भी अपने ही रास्ते पर चलाऊंगी तो इसका जीवन भी मेरे जैसे ही बंध जाएगा। भैया भाभी का तो अच्छा ही है, मेरे बाद उन्हें धन कमाने का और मौका मिल जाएगा। अपनी जगह पर ईशा का ईशा देवी के रूप में कल्पना करके ही काँपने लगी।वह अपने आप से ही कहने लगी कि
'नहीं मैं इस मासूम की मासूमियत नहीं छीन सकती ,न ही इसका बचपन छीन सकती हूं।' उसने दृढ़ निश्चय कर लिया और दूसरे ही दिन उसने अपनी भाभी से कहा कि 'भाभी आप ईशा को बाहर पढ़ने भेज दीजिए। यहां के माहौल में रहकर धीरे-धीरे उस पर भी इस माहौल का असर होगा।अभी इसके पढ़ने-लिखने की उम्र है। इसे इस माहौल से दूर हॉस्टल में भेज दीजिए। '
नेत्रा की बात सुनकर भाभी को आज नेत्रा का दुःख समझ में आया। उन्होंने नेत्रा से वादा किया कि वह जल्दी ही ईशा को हॉस्टल भेजेंगी।वह दूसरी नेत्रा देवी नहीं बनेगी ।
आज बरसों बाद नेत्रा को बहुत ही सुकून की नींद आई। उसने अपने मन में चल रहे कुटिल विचारों से मुक्ति पा ली थी।उसकी ईशा अब इस बंधन से दूर उन्मुक्त गगन में उड़ेगी।
नीरजा नामदेव
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