" दूँगी एक थप्पड़ खींचकर.., चोर कहीं के।कुछ देखा नहीं कि लार टपकाने लगते हो तुम लोग।" मालती चंपा के बेटे के हाथ से रोटी छीनते हुए बोली तो चंपा की आँखों में आँसू आ गये।अपने बेटे को छाती से चिपकाते हुए बोली," माफ़ कर दीजिये दीदी जी , बच्चा है,मैं समझा दूँगी इसे...।"
चंपा साल भर से मालती के यहाँ झाड़ू-बरतन का काम कर रही थी।मालती उसे हमेशा ही किसी न किसी बात पर टोक ही देती थी।चंपा पूरी मेहनत से उनका काम करती,फिर भी इतनी बातें सुनना...,उसे बहुत दुख होता था।उसका पति मजदूरी करता था।उसकी आमदनी से घर बड़ी मुश्किल से चलता था,इसीलिए तो उसे काम करना पड़ रहा था।उसका आठ साल का बेटा रजत स्कूल जाता था।गर्मी की छुट्टियाँ शुरु हो गई थी तो घर पर उसे अकेला कैसे छोड़ देती,इसीलिए काम पर उसे साथ ले आती थी।किचन में रोटियाँ रखीं थी,रजत का मन ज़रा ललच गया,उसने आधी रोटी तोड़ ली और मालती ने उसके बेटे को क्या कुछ नहीं कह दिया।
कुछ दिनों के बाद मालती का तेरह साल का भतीजा आशीष अपनी बुआ के घर छुट्टियाँ बिताने आया।वह घर में बहुत शैतानी करता,सामान इधर-उधर पटक देता लेकिन मालती उसे कभी कुछ नहीं कहती।
एक दिन मालती को मार्केट जाना था।उसने पर्स निकालने के लिये अलमारी खोली तो उसमें घड़ी नहीं दिखी।आशीष से पूछा तो वह साफ़ नकार गया।चंपा किचन में थी और रजत बाहर खेल रहा था।फिर तो मालती ने आव देखा न ताव, रजत का हाथ पकड़कर खींचती हुई उसे अंदर ले आई और डपटते हुए पूछी," बता.., मेरी घड़ी कहाँ है? उस दिन रोटी चुराई थी और आज घड़ी.., बता..?" मालती की डाँट से रजत डर गया और रोने लगा।चंपा किचन से बाहर आई और कुछ कहती,उससे पहले ही मालती का पति बोला," मालती..,क्यों उस मासूम पर बरस रही हो, ये देखो.. तुम्हारी घड़ी आशीष ने अपने पाॅकेट में छिपाई हुई थी।" कहते हुए उन्होंने मालती को घड़ी दिखाई तो चंपा गुस्से-से फट पड़ी, " वाह दीदी जी, उस दिन मेरे बेटे ने आधी रोटी क्या खा ली तो आपने हमें इतनी जली-कटी सुना डाली और आज आपके भतीजे ने घड़ी चुराई तो कुछ नहीं।हम गरीब हैं तो क्या...,आप हमें कुछ भी कह देंगी,हम पर झूठा इल्ज़ाम भी लगा देंगी।पर अब नहीं..।संभालिये अपना घर...,कल आकर अपना हिसाब कर लूँगी।" कहते हुए उसने हाथ में लिया किचन का डस्टर ज़मीन पर पटका और रजत का हाथ पकड़कर तेजी-से बाहर निकल गई।मालती हतप्रद होकर उसे जाते हुए देखती रह गई।
विभा गुप्ता
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