नई बहू का वादा

 शीतल का विवाह शहर के प्रतिष्ठित वकील सौरभ के साथ धूमधाम से संपन्न हुआ। साधारण परिवार से आई शीतल के लिए यह एक नए संसार में पहला कदम था—जहाँ तमाम सुविधाएँ थीं, पर भावनाओं की नमी कम थी। घर भव्य था, आँगन चौड़ा था, पर रिश्तों में एक अदृश्य दरवाज़ा था, जिसके उस पार दर्द और तन्हाई पलती थी।

शादी के तीसरे दिन शीतल की 'पहली रसोई' थी। सुबह से ही वह उल्लास के साथ किचन संभाले हुए थी। उसकी सास— मृदुला देवी—खुद रसोई में आईं। उन्होंने बड़ी बहू मीरा को कुछ निर्देश दिए, और बाकी सब किचन से दूर ही रहीं।

"बहू, जो भी बनाना है बना लो, पर देखो, दादी के लिए अलग खाना बनाना। उन्हें बिना घी-तेल वाली, कम नमक की सब्ज़ी और सादी चपाती देना,"
मृदुला ने कुर्सी पर बैठते हुए कहा।

शीतल ने आश्चर्य से पूछा—
"क्या दादी जी को कोई बीमारी है?"

"नहीं-नहीं, बस अब उन्हें कितना चाहिए? उनकी उम्र बीत गई, अब हल्का-फुल्का ही अच्छा,"
मीरा भौहें तरेरते हुए बोलीं।

शीतल ने सिर झुका लिया, लेकिन मन में सवाल उठ गया। पहली बार शीतल ने दादी सास—सुमित्रा देवी—को साफ देखा। चेतन आंखों में स्नेह था, पर चेहरे पर एक उदास मुस्कान, जैसे कोई कह रहा हो, ‘यह सब सुना-सुना है।’

शीतल ने बाकी सदस्यों के लिए पूरी सब्ज़ी, आलू की टिक्की, दही-बड़ा, और खीर बनाई। पर दादी सास के लिए भी उसने वही व्यंजन, थोड़ी मात्रा में, पर प्यार से सजाकर रख दिए।

जब डाइनिंग टेबल पर सब लोग जमा हुए, दादी सास का खाना उनको कमरे में भेजा गया। शीतल ने खुद वह थाली दादी जी के पास पहुँचा दी।

"दादी जी, मैंने आपके लिए भी वही खीर, टिक्की और दाल बनाई है। पर नाम मात्र ही तेल डाला है,"
शीतल ने मुस्कुराकर प्लेट आगे बढ़ाई।

"बहू, मुझे तो मीरा बहू ने मना किया था कि आम खाना नहीं तुम्हारे लिए,"
सुमित्रा जी ने सकुचाते हुए पूछा।

"दादी जी, थोड़ा-बहुत स्वाद सबको चाहिए। आप केवल उम्र के कारण सभी खुशियों से दूर रहें, ऐसा कहां लिखा है?"
शीतल ने धीरे से पूछा।

अपनी प्लेट में पूरा स्वाद देखकर सुमित्रा जी की आँखों में आँसू आ गए।

कुछ देर बाद मृदुला देवी कमरे में आईं, देखा दादी सास प्लेट में खीर खा रही हैं।

"शीतल! मैंने कहा था दादी के लिए अलग खाना बनाना।"

"माँ जी, मैं जानती हूँ हर किसी की जरूरत अलग होती है, पर इंसान को खुश होने का, प्यारा खाने का, बराबरी का हक हर उम्र में है,"
शीतल ने विनम्रता से कहा।

मृदुला के चेहरे पर अप्रसन्नता छा गई। उनकी आवाज़ सख्त हो गई, "यह तुम्हारा मायका नहीं है, बहू! यहाँ मेरी मर्जी चलती है।"

शीतल ने शांत स्वर में जवाब दिया—
"माँ जी, मेरे मायके में मुझे सिखाया गया कि सत्य के पक्ष में खड़े रहना चाहिए। दादी जी ने इस परिवार को अपने हाथों से सँवारा है, उनके जीवन की असली मिठास ये रिश्ते हैं। अगर हम उन्हें ही आनंद से दूर रखेंगे तो घर की खुशियाँ अधूरी रहेंगी।"

मृदुला देवी नाराज होकर चली गईं। मीरा ने भी ताना मारा,
"नयी बहू हो, अभी बहुत कुछ देखना बाकी है।"

शीतल दिल से दुखी हुई, पर पीछे नहीं हटी। हर रोज़ वह दादी सास की देखभाल खुद करती—उनके साथ बैठती, बातें करती, उनकी पसंद के फूल लाती, पुराने किस्से सुनती और प्यार से खाना परोसती। धीरे-धीरे दादी के चेहरे की उदासी घटने लगी। घर के बाकी सदस्य भी धीरे-धीरे इस बदलाव को देखने लगे।

एक दिन, बड़ा पोता अर्जुन घर आया। उसने देखा कि दादी इस बार बहुत खुश हँस रही हैं। "दादी, लग रहा है अब आप पहले से ज्यादा खूश हैं!"

दादी ने प्यार से शीतल की पीठ पर हाथ रखते हुए कहा—
"बहू बेटियाँ घर की लक्ष्मी होती हैं, पर एक बहू ने मुझे फिर से बेटी जैसा प्यार दिया।"

अर्जुन हँसते हुए बोला,
"शीतल भाभी में सच में कोई जादू है!"

मृदुला देवी यह सब देख सुन रही थीं। इसका असर उन पर धीरे-धीरे पड़ रहा था। उन्होंने मन ही मन सोचा—
'शायद मुझसे सच में गलती हो रही थी।'

एक दोपहर, मृदुला देवी पुरानी फोटो एलबम निकाल रही थीं। एक फोटो में उनकी सास—सुमित्रा देवी—निर्भयता से रसोई में मीठा बना रही थीं, और छोटी उम्र की मृदुला उनके बगल में खड़ी देखकर हँस रही थी।

मृदुला की आँखों में आँसू आ गए—‘मैंने भी तो कभी अपनी सास से ऐसा ही प्यार पाया था।’

वह अपने आप को रोक न पाईं। आहिस्ता से दादी के कमरे में गईं, उनके पास बैठ कर कहा—
"माँ, माफ़ कर देना, जो भी कड़वाहट आप तक पहुँची, मैं अपनी जिम्मेदारियों के बोझ में आपकी खुशी भूल बैठी थी।"

दादी की आँखें भर आईं। शीतल और मीरा भी वहीं थीं।

मृदुला ने कहा—
"आज से आपके लिए घर में पहले जैसा ही खाना बनेगा। सब लोग एक साथ मिलकर खाएँगे। आपके अनुभव की रोशनी में घर सच में घर बन सकेगा।"

उस शाम घर की डाइनिंग टेबल पर दादी, मृदुला, शीतल, मीरा, अर्जुन, सौरभ—all बैठकर हँसी-खुशी खाना खा रहे थे। दादी ने मिठास घोल रही खीर सबके हाथों में रखी, और शीतल ने मुस्कुरा कर सबको परोसी।

सीख:
‘हर घर की असली जड़ उसकी पिछली पीढ़ी होती है। बुज़ुर्ग हमारे संस्कार, अनुभव, और खुशियों की जड़ हैं। जो साथ चलना सीखते हैं, वही सच में खुशियाँ पाते हैं।’
शीतल की जिद, समझदारी और करुणा ने उस घर को फिर से घर बना दिया—जहाँ सबके हिस्से का प्यार बराबर था।


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