पहुंच और प्रतिष्ठा

 "माया, ये क्या देख रही हो इतनी देर से फोन में?"

अनिल ने अपनी पत्नी से पूछा, जो मोबाइल स्क्रीन पर एक ऑनलाइन वेबसाइट के डिजाइनर लहंगे देख रही थी।

"अरे कुछ नहीं… बस सोच रही थी, भांजी की शादी में क्या पहनूं! इस बार तो तुम्हारे भाई की सारी फैमिली आ रही है ना। छोटी भाभी ने फोन करके कह भी दिया था कि 'इस बार सबको छा जाना है'। सोच रही हूं कोई अच्छा सा लहंगा ले लूं।" माया ने थोड़ी झिझक के साथ कहा।

"माया, तुम ये सब उनके कहने पर क्यों सोच रही हो? पिछले साल की स्नेहा की शादी याद है ना? जब तुमने अपनी पसंद का सादा लेकिन सुंदर सूट पहना था और सबने मुंह बिचका दिया था।"

"हां… और छोटी भाभी ने कहा था—'दीदी, थोड़ा फैशन भी कर लिया कीजिए, अब तो ऑनलाइन सब सस्ते में मिल जाता है।' उन्होंने ये नहीं देखा कि वो सूट मेरे पापा की दी हुई आखिरी निशानी था।"

अनिल ने माया के हाथ से फोन लेकर एक तरफ रख दिया, "माया, तुम जब से इस परिवार में आई हो, हर मौके पर किसी की पसंद, किसी की उम्मीदें पूरी करने में लगी रही हो। लेकिन क्या किसी ने कभी ये पूछा कि तुम क्या चाहती हो?"

माया चुप हो गई। उसकी आंखों में एक पुरानी पीड़ा फिर से तैरने लगी।

अनिल की फैमिली संपन्न थी। छोटे भाई की पत्नी एक मशहूर इन्फ्लुएंसर थी और बड़ी बहन के पति की अपनी बिजनेस फर्म थी। माया एक मध्यमवर्गीय परिवार से थी—पढ़ी-लिखी, व्यवहार कुशल, लेकिन दिखावे और शोर-शराबे से दूर। उसे ज्यादा तामझाम पसंद नहीं था।

हर पारिवारिक समारोह में माया को ताने मिलते—"दीदी, आजकल तो सब मैचिंग ज्वेलरी पहनते हैं", "आप भी थोड़ा मेकअप सीखिए", "आपके बच्चे तो हमेशा इतने सिंपल कपड़े क्यों पहनते हैं?"

शुरू में माया मुस्कुराकर सब सुन लेती थी, लेकिन धीरे-धीरे उसे अपने होने पर ही शक होने लगा था।

"अनिल, मुझे लगता है इस बार कुछ अच्छा पहन लूं। क्या पता थोड़ी इज्ज़त मिल जाए?" माया की आवाज़ में लाचारी थी।

"नहीं माया," अनिल ने दृढ़ता से कहा, "इज्ज़त खरीदने से नहीं मिलती, वो कमाई जाती है। और तुम्हें किसी को कुछ साबित करने की जरूरत नहीं।"

माया कुछ देर तक सोचती रही, फिर उठकर अपनी अलमारी खोली और अपनी मर्जी से एक सुंदर, हल्के गुलाबी रंग की साड़ी निकाल ली।

"ये पहनूंगी शादी में। मेरी मां की दी हुई है, और मुझे इसमें हमेशा अपनेपन का एहसास होता है।"

अनिल मुस्कुरा दिया।

शादी के दिन, जब माया अपनी साड़ी में पहुंची, तो किसी ने कहा नहीं कि वो 'छा गई', लेकिन जब वो अपनी सौम्यता और सहजता से सबके साथ पेश आई, तो हर किसी की नज़र उस पर टिक गई।

छोटी भाभी ने आखिर में आकर कहा—"दीदी, आपमें एक अलग ही ग्रेस है। इतना सिंपल पहनकर भी सबसे अलग लग रही हैं।"

माया ने बस मुस्कुराकर कहा, "सादगी कभी आउट ऑफ फैशन नहीं होती।"


सीख:
दिखावा करके अगर पहचान बनती तो नकली हीरे सबके गले में होते।
असल पहचान होती है आपके आत्मसम्मान और सहजता में।


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