वो मिठाई का डिब्बा

 "अरे सुधा, ज़रा देखना... कोई दरवाज़े पर है!"

रात के करीब आठ बजे थे। सुधा रसोई में थी, और दरवाज़े की घंटी बार-बार बज रही थी।

"कौन होगा इस वक़्त?" बड़बड़ाते हुए सुधा ने हाथ पोंछे और दरवाज़े की ओर बढ़ी।

जैसे ही दरवाज़ा खोला, उसकी आँखें हैरानी से फैल गईं। सामने उसके भाई मनोज और भाभी सविता खड़े थे, हाथ में एक मिठाई का डिब्बा लिए।

"भैया? भाभी? आप लोग? अचानक?"

"अंदर आने तो दोगी बहन!" मनोज हँसते हुए बोला और सविता ने हल्का सा मुस्कुराकर मिठाई का डिब्बा आगे बढ़ाया।

"शुभ दशहरा! सोचा बहन के हाथ की बनी चाय भी पी ली जाए और नाराज़गी भी खत्म की जाए..."

सुधा की आँखें भर आईं। दो साल हो गए थे, भाई-बहन की बात बंद थी। वजह? मामूली-सी, लेकिन अहम—माँ के इलाज के खर्च को लेकर कहासुनी हुई थी। मनोज की पत्नी सविता ने सुधा पर ताने कसे थे, और सुधा की जुबान भी तल्ख़ हो गई थी। बात बढ़ती गई, और फिर दीवारें बनती गईं।

"अरे अंदर आओ न! चाय क्या, आज तो गरमा-गरम पकौड़े भी बनेंगे।"
सुधा ने खुद को संभालते हुए कहा और दोनों को अंदर ले आई।

"कुश कहाँ है?" मनोज ने अपने भांजे के बारे में पूछा।

"पढ़ाई कर रहा है, दसवीं की बोर्ड क्लास है अब। बहुत समय से आप दोनों की बात करता है।"
सुधा ने धीरे से कहा।

सविता थोड़ा सकुचाई, "सुधा दी, मैं जानती हूँ मैंने उस दिन कुछ ज़्यादा कह दिया था… मैं बहुत शर्मिंदा हूँ। लेकिन तब माँ की तबीयत, बच्चों की चिंता... मैं खुद भी बहुत तनाव में थी।"

सुधा ने सविता का हाथ थाम लिया, "मैं भी बहुत कठोर हो गई थी, भाभी। लेकिन अब सोचती हूँ तो लगता है, घर में तो बस दो भाई-बहन ही बचे हैं... अगर हम ही रूठे रहेंगे तो त्योहार क्या काम आएँगे?"

"दीदी, ये मिठाई वाला डिब्बा सिर्फ मिठाई नहीं है, इसमें रिश्तों की मिठास भी लाना चाहते हैं," मनोज ने हँसते हुए कहा।

"और उस मिठाई में नमक न पड़ जाए, इसलिए पकौड़े तुम्हारे हाथों के चाहिए," सविता ने मुस्कुराते हुए कहा।

सुधा भी हँस पड़ी। तीनों रसोई में पहुँच गए। चाय, पकौड़े, मीठी यादें, और दिल की सच्ची बातें... जैसे सालों की दूरी उस एक शाम में पिघलती चली गई।

जब कुश बाहर आया और मामा-मामी को देखा, तो दौड़कर मामा के गले लग गया।
"मामा! आपने मेरी साइंस मॉडल की प्रदर्शनी तो देखी ही नहीं!"

"अब जब मिलना शुरू हुआ है, तो सब देखेंगे बेटा!" मनोज ने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा।

रात को विदा लेते वक्त सविता ने सुधा को गले लगाकर कहा,
"इस बार दीवाली की सफाई हम दोनों साथ में करेंगे, ठीक है?"

"ठीक है... लेकिन मुझसे पहले झाड़ू मत उठा लेना!" सुधा ने हँसते हुए कहा।


सीख:

रिश्तों में खटास आ सकती है, लेकिन सच्ची माफी और अपनापन उस खटास को फिर से मिठास में बदल सकते हैं।
त्योहार सिर्फ दीप जलाने का नाम नहीं, दिलों को जोड़ने का भी होता है।


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