"मम्मी, प्लीज़ आप नीतू से ऐसे मत बोला करो… हर बार वही बात, वो अब बहू नहीं, इस घर की बेटी है!"
बेटा शिवम अपनी माँ विनीता जी से प्यार से बोला ।
विनीता जी रसोई में खड़ी रोटियां बेल रही थीं, लेकिन शिवम की बात सुनते ही उन्होंने बेलन ज़ोर से पटका, "बेटा, तुम नहीं समझोगे… सास हूं, कोई गुड्डी-गुड़िया का खेल नहीं है ये घर चलाना।"
शिवम चुपचाप अपने कमरे में चला गया, पर उसके शब्द विनीता जी के कानों में गूंजते रहे।
विनीता जी ने जीवन में बहुत कुछ सहा था। पति विनीत जी सरकारी नौकरी में थे, और रिटायरमेंट के कुछ साल पहले ही इस दुनिया से चले गए थे। बच्चों को अकेले पाला, बेटा डॉक्टर बना और बेटी की भी शादी कर दी। पर अब जब बहू नीतू इस घर में आई, तो उन्हें लगता था कि जिम्मेदारी छूट जाएगी। लेकिन जैसे-जैसे नीतू घर संभालने लगी, विनीता जी का नियंत्रण छूटने का डर गहराने लगा।
हर काम में दखल देना, रोटियों की गोलाई, सब्जी की नमक-मिर्च से लेकर दाल के तड़के तक—विनीता जी की आदत बन चुकी थी।
नीतू भी अब चुप नहीं रहती थी। पढ़ी-लिखी लड़की थी, कामकाजी भी, लेकिन फिर भी हर दिन एक नया ताना, एक नई टिप्पणी उसे तोड़ रही थी।
एक शाम नीतू ऑफिस से लौटकर सीधे अपने कमरे में चली गई। शिवम ने बताया कि वो बहुत थकी हुई है और शायद बुखार भी है। विनीता जी ने बिना कुछ कहे खुद रसोई संभाली।
अचानक, रोटियों की खुशबू में घुली नीतू की खाँसी की आवाज़ उन्हें बेचैन कर गई।
पहली बार उन्होंने दरवाज़ा खटखटाया और अंदर जाकर पूछा, "बहू तबियत ठीक नहीं लग रही तुम्हारी , मैं खिचड़ी बना देती हूं?"
नीतू ने चौंकते हुए उनकी ओर देखा, "मम्मी जी, आप?"
"हां… मां हूं ना, अब इतना हक तो है," विनीता जी मुस्कुराईं।
उस दिन पहली बार बहू ने अपने सिर को सास के कंधे पर टिकाया था।
धीरे-धीरे विनीता जी ने खुद में बदलाव लाना शुरू किया। सुबह उठकर छत पर योग करने लगीं, अपने पुराने शौक – बुनाई और किताबों की ओर लौटीं। बहू के साथ मिलकर रसोई में काम बांटने लगीं और बात-बात पर टोका-टाकी छोड़ दी।
नीतू अब हर त्योहार पर विनीता जी से पूछकर तैयारी करती, उनकी पसंद की मिठाइयाँ बनाती। सास-बहू अब सहेलियां बन गई थीं। शिवम के लिए ये किसी सपने से कम नहीं था।
शिवम और नीतू ने विनीता जी के लिए एक सरप्राइज़ प्लान किया। पुराने एलबम से विनीत जी की तस्वीर को सजाकर फूलों से घेर दिया और पूरा घर सजा दिया।
शिवम ने माइक उठाया और सबके सामने कहा,
"आज पापा को गए 10 साल हो गए… लेकिन आज मैं कहना चाहता हूं कि मम्मी ने अकेले जो ये घर संभाला… और अब जो बदलाव लाकर इसे फिर से एक खुशहाल घर बनाया—वो किसी हीरो से कम नहीं।"
नीतू ने आगे बढ़कर विनीता जी का हाथ पकड़ा और कहा,
"मम्मी जी, आप जब मुस्कुराती हैं, तो सारा घर रोशन हो जाता है। मुझे सबसे ज्यादा गर्व इस बात का है कि मेरी सास मेरी सबसे अच्छी दोस्त बन गई हैं।"
विनीता जी की आँखों से आँसू बह रहे थे, लेकिन इस बार वे आँसू खुशी और आत्म-स्वीकार के थे।
उन्होंने कहा,
"आज मुझे समझ में आया कि खुद से प्यार करना क्या होता है। जब मैं सास नहीं, सिर्फ एक इंसान बनकर जियी… तभी मैंने जीना सीखा।"
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