सच्चा उत्तराधिकारी

 बहुत पहले की बात है। एक कस्बे में एक प्रतिष्ठित शिक्षक, दीनदयाल जी, रहते थे। पूरे गांव में उनकी ईमानदारी, दयालुता और सरलता के किस्से मशहूर थे। उनके तीन बेटे—सूरज, दीपक और राजू—और एक बेटी—मधु—थी।

दीनदयाल जी का अचानक देहांत हो गया। पूरे गांव में शोक की लहर दौड़ गई। उनके बेटे पिता के अंतिम संस्कार की तैयारी करने लगे।
तभी, अचानक मोहल्ले के एक पुराने साहूकार, हरिराम, अंतिम यात्रा में आकर सबके सामने बोले—
"रुको! दीनदयाल ने मुझसे दस हज़ार रुपये कर्ज लिया था। जब तक मेरा कर्ज नहीं मिलता, मैं इनकी अर्थी को श्मशान नहीं जाने दूंगा!"

पूरा गांव सन्न रह गया।
सूरज बोला—"हमारे पिताजी का कर्ज है, हमें क्या? हम तो नहीं भर सकते।"
दीपक और राजू ने भी समर्थन कर दिया—"पिताजी जानते थे किससे कर्ज लिया, हमें क्यों जिम्मेदारी सौंप दी?"
कुछ ही देर में दीनदयाल जी के सगे भाइयों और रिश्तेदारों ने भी हाथ खड़े कर दिए—"जब बेटों को फर्क नहीं पड़ता तो हम क्यों भरें?"

गांव में चर्चा शुरू हो गई—
"क्या जमाना आ गया है, बेटे पिता के शव के लिए भी जिम्मेदारी नहीं उठा रहे!"

यह सब खबर जैसे ही मधु तक पहुँची, वो अपने ससुराल से दौड़ी-दौड़ी अपने मायके पहुंची।
बाबा की अर्थी के पास पहुंचते ही उसने साहूकार के सामने अपने हाथ की चूड़ियां, गहने और जो भी पैसे थे, सब निकालकर उसके पैरों में रख दिए और बोली—
"बाबा, मेरी सारी जमा-पूंजी ले लीजिए, अगर फिर भी कुछ बाकी रहे तो मैं खुद अपनी मेहनत से आपका पूरा कर्ज चुकाऊंगी, लेकिन मेरे पिताजी की अंतिम यात्रा को मत रोकिए।"

साहूकार के चेहरे पर गहरी मुस्कान आ गई। वह बोला—
"बेटी, असली उत्तराधिकारी वही है, जो अपने बुजुर्गों की लाज रख सके।
असल में, तुम्हारे बाबा ने वर्षों पहले मेरी मदद की थी, मेरी बेटी की शादी के वक्त उन्होंने चुपचाप मुझे रकम दी थी। बिना किसी दस्तावेज, बिना ब्याज के। मैं जब भी लौटाने आता, वो मुस्कुरा कर टाल देते—‘बेटी की शादी में मदद को हिसाब मत बनाओ!’
आज मैंने यह नाटक इसलिए किया ताकि देख सकूं, उनकी असली संतान कौन है—जिन्हें वाकई अपने पिता की इज्जत प्यारी है।
तुमने साबित कर दिया, बेटियां भी बेटे से कम नहीं।"

साहूकार ने मधु को रकम लौटा दी और पूरे गांव के सामने उसे गले लगा लिया।
दीनदयाल के बेटे सिर झुकाए खड़े रहे, जबकि पूरे गांव ने मधु की तारीफ की—
"सच्चा वारिस वही है, जो बड़ों की इज्जत और जिम्मेदारी समझे।"

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