रिश्ता वही सोच नयी

 शादी के पंद्रह वर्ष बीत जाने पर भी मीरा के पति निशांत का व्यवहार उसके प्रति जस का तस था। बात-बात पर निशांत का मीरा को जली कटी सुनाना और कि ये कहना मेरा घर है तुम्हारा नहीं,यहां सिर्फ मेरी ही चलेगी उसको अंदर तक चोट पहुंचा जाता।अब बच्चे भी बड़े हो रहे थे घर के तनाव का असर उन पर भी पड़ रहा था।वो अब इन सबसे बाहर आना चाहती थी। अपनी जिंदगी को अपने अनुसार जीना चाहती थी। आज उसने बहुत सोच समझ के साथ पति को उनके ही तरीके से समझाने का एक तोड़ निकाल ही लिया।

शनिवार का दिन था।पति का सप्ताह में पांच दिन का काम होता था तो वो घर पर ही थे।अपनी आदतानुसार किसी बात पर उनके मुंह से अपने घर की बात निकल ही गई पर आज मीरा उस स्थिति से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार थी। जैसे ही उन्होंने ऐसा कुछ बोला वैसे ही मीरा उस समय सफाई कर रही थी वो उसे वहीं छोड़कर अपने कमरे में जाकर बैठ गई। ऐसे ही खाने का भी समय हो गया पर उसने आज कुछ ना बनाया जब पति ने पूछा तो कहा आपका घर, आपकी रसोई जो मन करे वो बनाएं,खाएं और हम जैसे मेहमानों को भी खिलाएं।अब तो पतिदेव की सिट्टी-पिट्टी गुम। उसे तो वैसे भी कुछ बनाना ना आता था। ये तो बस शुरुआत थी। अब कुछ दिन बाद मीरा के पतिदेव निशांत ने अपने कुछ दोस्तों को खाने पर आने का निमंत्रण दिया था।अपनी आदत के अनुसार वो मीरा को फिर हुकुम देने लगें और कहने लगे कि मेरे घर में मेरे सभी दोस्त का सम्मान होना चाहिए,खाना बहुत बहुत अच्छा बनना चाहिए।

उनकी ये मेरा घर वाली बात सुनकर मीरा ने बड़े अनोखे अंदाज़ में कहा कि अब घर आपका है तो खाने के व्यंजन की लिस्ट से लेकर सारी सजावट और खाने को बनाने की ज़िम्मेदारी तो आपकी होनी चाहिए। ऐसा कहकर वो बड़ी अदा से मुस्कराते हुए कॉफी का कप लेकर बालकनी में बैठ गई। अब आगे भी कभी निशांत के इस तरह के व्यवहार पर  मीरा की इस तरह की प्रतिक्रिया से,निशांत के पास भी बोलने के लिए शब्द नहीं रह जाते थे। अब धीरे-धीरे निशांत को भी समझ आने लगा था कि बात-बात पर जली कटी सुनाना और पुरुष होने के नाते घर पर सिर्फ अपना ही अधिकार जमाना किसी भी खुशहाल गृहस्थी का आधार नहीं हो सकता क्योंकि पति-पत्नी एक सिक्के के दो पहलू होते हैं। मीरा ने भी रिश्ता वही और सोच नई की तर्ज़ पर अपनी गृहस्थी की गाड़ी को पटरी पर ला दिया था।

डॉ पारुल अग्रवाल,

नोएडा


एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ