"सास को लगता था कि पैसे की लगाम कसकर वो बहू को मुट्ठी में रख सकती है, लेकिन उसने यह नहीं सोचा था कि जिस दिन बहू ने अपनी 'कमाई' का पहला गहना उसके कदमों में रखा, उस दिन सास का अहंकार और तिजोरी का ताला, दोनों एक साथ टूट जाएंगे..."
सुबह के दस बज रहे थे। डाइनिंग टेबल पर नाश्ता लगा हुआ था, लेकिन घर में एक अजीब सा तनाव पसरा हुआ था। सृष्टि अपनी सास, गायत्री देवी के सामने सिर झुकाए खड़ी थी। उसके हाथ अपनी साड़ी के पल्लू में कसकर बंधे हुए थे, जैसे वह खुद को बिखरने से रोक रही हो।
"माँ जी , वो... अगले हफ्ते मेरी मौसी की बेटी की शादी है। मुझे शगुन के लिए और कुछ अपनी तैयारियों के लिए पांच हजार रुपये चाहिए थे," सृष्टि ने बहुत हिम्मत जुटाकर, दबी हुई आवाज़ में कहा।
गायत्री देवी ने चाय की चुस्की ली और अखबार से नज़रें हटाए बिना कहा, "पाँच हजार? अभी पिछले महीने ही तो तुमने करवा चौथ पर नई साड़ी ली थी। और शगुन के लिए तो तुम्हारे पास वो लिफाफे रखे होंगे जो पिछले साल दिवाली पर रिश्तेदारों ने दिए थे। उनका इस्तेमाल कर लो। हर छोटी-छोटी बात पर पैसे खर्च करने की आदत अच्छी नहीं होती, सृष्टि।"
सृष्टि का चेहरा फक पड़ गया। "लेकिन माँ जी , वो साड़ी तो आपने पसंद की थी, वो तो भारी थी। शादी में पहनने के लिए मुझे कुछ हल्का चाहिए था। और शगुन के लिफाफे... वो तो आपने उसी दिन मुझसे ले लिए थे कि 'मैं संभाल कर रखती हूँ'।"
गायत्री देवी ने अब अखबार नीचे किया। उनकी आँखों में एक सख्त सवाल था। "तो? मैं संभालती हूँ तो घर ही चलता है न? देखो सृष्टि, मोहित (सृष्टि का पति) दिन-रात मेहनत करके कमाता है। इसका मतलब ये नहीं कि हम पैसे पानी की तरह बहा दें। तुम पढ़ी-लिखी हो, एम.ए. पास हो, तुम्हें तो और समझदार होना चाहिए। खैर, मैं देखती हूँ, शाम को मोहित आएगा तो बात करूँगी।"
सृष्टि चुपचाप वहां से चली गई। कमरे में आकर वह बिस्तर पर गिर पड़ी और रोने लगी। यह सिर्फ आज की बात नहीं थी। शादी के तीन साल हो गए थे, और सृष्टि को ऐसा लगता था जैसे वह इस घर की बहू नहीं, बल्कि एक आश्रित (dependent) है। मोहित एक मल्टीनेशनल कंपनी में मैनेजर था, ससुर जी को अच्छी पेंशन मिलती थी, लेकिन घर की तिजोरी की चाबी गायत्री देवी के पल्लू में ही बंधी रहती थी।
मोहित अपनी माँ का भक्त था। उसे लगता था कि माँ जो करती हैं, घर की भलाई के लिए करती हैं। अगर सृष्टि कभी शिकायत करती, तो मोहित हंसकर टाल देता—"अरे सृष्टि, माँ घर की बड़ों हैं, उन्हें मैनेज करने दो। तुम्हें जो चाहिए, मिल तो जाता है न?"
मिल तो जाता था, लेकिन अपनी ही ज़रूरत के लिए दस बार सफाई देने के बाद। वह 'स्वाभिमान' कहाँ से लाए जो हर बार उसे गिरवी रखना पड़ता था? सृष्टि को अपनी डिग्रियां, अपनी पढ़ाई सब बेकार लगने लगी थी। शादी से पहले वह एक स्कूल में पढ़ाती थी, लेकिन गायत्री देवी ने यह कहकर नौकरी छुड़वा दी थी कि "हमारे घर की बहुएं बाहर धक्के नहीं खातीं, हमारे पास भगवान का दिया बहुत है।"
उस शाम एक घटना घटी जिसने सृष्टि के अंदर कुछ बदल दिया।
सृष्टि के मायके से फोन आया। उसकी माँ की तबीयत अचानक बिगड़ गई थी और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा था। सृष्टि के पिता रिटायर्ड थे और भाई अभी पढ़ाई कर रहा था। उन्हें पैसों की सख्त ज़रूरत थी। सृष्टि की माँ ने संकोच करते हुए कहा, "बेटा, अगर हो सके तो मोहित से कहकर दस हजार रुपये भिजवा दे। तेरी बुआ के आते ही लौटा देंगे।"
सृष्टि का दिल बैठ गया। उसे पता था कि मोहित मना नहीं करेगा, लेकिन उसे पैसे मांगने के लिए फिर गायत्री देवी के पास जाना होगा। और गायत्री देवी... वो दस सवाल पूछेंगी।
शाम को जब मोहित आया, तो सृष्टि ने डरते-डरते बात छेड़ी।
"मोहित, माँ बीमार हैं। उन्हें दस हजार की ज़रूरत है। प्लीज, अभी ट्रांसफर कर दो।"
मोहित ने फोन निकाला ही था कि गायत्री देवी वहां आ गईं। "क्या हुआ? किसके पैसे?"
"वो माँ बीमार हैं..." सृष्टि ने कहा।
गायत्री देवी के माथे पर लकीरें खिंच गईं। "अरे, अभी तो पिछले महीने तुम्हारे भाई की फीस के लिए पैसे भिजवाए थे। तुम्हारे मायके वाले तो हमें एटीएम समझ बैठे हैं क्या? बीमारी है तो सरकारी अस्पताल में दिखाएं न। प्राइवेट में लूटने का क्या मतलब?"
सृष्टि को लगा जैसे किसी ने उसके गाल पर तमाचा मारा हो। उसकी बीमार माँ के लिए ऐसी बातें?
"माँ जी , वो इमरजेंसी है," सृष्टि की आवाज़ कांप रही थी।
"होगी इमरजेंसी," गायत्री देवी ने कठोरता से कहा। "मोहित, अभी घर में एक्स्ट्रा कैश नहीं है। और हर बार दामाद से पैसे मांगना शोभा नहीं देता। उन्हें कहो कि कहीं और से इंतज़ाम करें।"
मोहित ने माँ की तरफ देखा, फिर सृष्टि की तरफ। वह हमेशा की तरह 'मौन' रह गया। उसने फोन वापस जेब में रख लिया। "सृष्टि, माँ सही कह रही हैं। अभी थोड़ा टाइट हाथ है। तुम कहो तो मैं अपने दोस्त से पूछूं?"
सृष्टि ने एक शब्द नहीं कहा। उसने बस मोहित की आँखों में देखा—उस कायरता को देखा जिसे वह अब तक 'संस्कार' समझती आ रही थी। वह कमरे से बाहर निकल गई। उसने अपनी एक पुरानी सोने की अंगूठी, जो उसे उसकी दादी ने दी थी, चुपके से निकाल कर अपनी सहेली को दी और उसे बेचकर पैसे अपनी माँ को भिजवाए।
उस रात सृष्टि सो नहीं पाई। आंसुओं की जगह अब उसकी आँखों में एक अंगार था। उसने तय कर लिया था कि अब वह उस हाथ के सामने कभी हाथ नहीं फैलाएगी जो उसकी मजबूरी का तमाशा बनाता हो।
अगले दिन से सृष्टि का व्यवहार बदल गया। उसने घर का काम वैसे ही किया, लेकिन अब वह दोपहर में सोती नहीं थी। उसने अपना पुराना लैपटॉप निकाला। वह हिंदी साहित्य में एम.ए. थी और उसकी लेखन शैली बहुत अच्छी थी। उसने ऑनलाइन कंटेंट राइटिंग और फ्रीलांस अनुवाद (Translation) का काम ढूंढना शुरू किया।
शुरुआत मुश्किल थी। उसे छिपकर काम करना पड़ता था। दोपहर में जब गायत्री देवी सो जाती थीं, सृष्टि की उंगलियां कीबोर्ड पर दौड़ती थीं। रात को जब मोहित सो जाता, वह जागकर आर्टिकल पूरे करती।
पहला महीना बीता। उसके अकाउंट में 8,000 रुपये आए। वो रकम छोटी थी, लेकिन सृष्टि के लिए वह करोड़ों से ज्यादा थी। यह उसकी 'आज़ादी' की पहली किश्त थी। उसने उन पैसों से अपने लिए कुछ नहीं खरीदा, बस उन्हें संभाल कर रखा।
समय बीतता गया। सृष्टि की मेहनत रंग लाने लगी। उसका काम पसंद किया जाने लगा। उसे बड़े प्रोजेक्ट्स मिलने लगे। छह महीने के अंदर वह घर बैठे-बैठे 30-40 हजार रुपये कमाने लगी। लेकिन घर में किसी को इसकी भनक नहीं थी। गायत्री देवी अब भी उसे छोटी-छोटी चीज़ों के लिए टोकती थीं, और सृष्टि अब बिना बहस किए चुपचाप सुन लेती थी, क्योंकि अब उसे उन पैसों की 'भूख' नहीं थी। उसका आत्मविश्वास लौट आया था।
दिवाली का त्यौहार आया। गायत्री देवी की आदत थी कि दिवाली पर वे घर के रिनोवेशन और गिफ्ट्स का पूरा बजट खुद तय करती थीं।
इस बार उन्होंने मोहित से कहा, "मोहित, इस बार घर की पुताई रहने देते हैं। महंगाई बहुत बढ़ गई है। और हाँ, सृष्टि के लिए कोई भारी साड़ी मत लेना, पिछली वाली ही नई रखी है। बस एक शगुन का लिफाफा दे देना।"
सृष्टि पास ही खड़ी रंगोली बना रही थी। उसने सुनकर भी अनसुना कर दिया।
शाम को पूजा का समय था। घर मेहमानों से भरा हुआ था। गायत्री देवी अपनी नई बनारसी साड़ी में सबको अपनी अंगूठियों और गहनों का प्रदर्शन कर रही थीं।
आरती के बाद, बड़ों का आशीर्वाद लेने की रस्म शुरू हुई। मोहित ने गायत्री देवी के पैर छुए और उन्हें एक शॉल गिफ्ट किया।
गायत्री देवी ने नाक सिकोड़ी। "अरे, यह कलर तो मेरे पास है। खैर, लाया तो है।"
तभी सृष्टि आगे बढ़ी। उसने सास के पैर छुए और एक छोटा सा मखमली बॉक्स उनकी हथेली पर रख दिया।
गायत्री देवी ने हैरान होकर बॉक्स खोला। अंदर एक सोने का पेंडेंट था, जिस पर 'ओम' बना हुआ था। वह काफी भारी और सुंदर था।
गायत्री देवी की आँखें फटी रह गईं। मेहमान भी देखने लगे।
"अरे वाह! बहुत सुंदर है," पड़ोस की चाची बोलीं। "गायत्री भाभी, बहू तो बहुत कीमती तोहफा लाई है।"
गायत्री देवी ने तुरंत मोहित की तरफ देखा और फुसफुसाते हुए गुस्से में कहा, "तुझे मना किया था न फिजूलखर्ची करने से? मुझसे बिना पूछे तूने इसे इतने पैसे क्यों दिए? और दिए भी तो इसने यह क्यों खरीदा?"
मोहित भी हैरान था। "माँ, मैंने तो सृष्टि को एक रुपया भी नहीं दिया। मुझे तो पता भी नहीं कि यह कब लाई।"
कमरे में सन्नाटा छा गया। गायत्री देवी ने सृष्टि की तरफ देखा। "तो फिर? यह कहाँ से आया? तूने अपने मायके से पैसे मंगवाए क्या? हमारी नाक कटवाने का इरादा है?"
सृष्टि ने बहुत शांत स्वर में, लेकिन पूरे आत्मविश्वास के साथ सबके सामने कहा, "नहीं माँ जी । मायके से तो बेटियां लेती हैं, उन्हें कर्ज़दार नहीं बनातीं। और मोहित से भी मैंने नहीं मांगे।"
"तो फिर? चोरी की है?" गायत्री देवी चिल्लाईं।
"मेहनत की है, माँ जी ," सृष्टि ने मुस्कुराते हुए कहा। "पिछले छह महीनों से मैं फ्रीलांस राइटर और ट्रांसलेटर का काम कर रही हूँ। यह मेरी अपनी कमाई है। मेरी 'गाढ़ी कमाई'। मैंने सोचा कि जिस घर में रहती हूँ, वहां अपनी पहली बड़ी कमाई से घर की लक्ष्मी (सास) का सम्मान करूँ।"
पूरा हॉल सन्न रह गया। मोहित अविश्वास से अपनी पत्नी को देख रहा था। उसे आज सृष्टि के चेहरे पर वो तेज़ दिख रहा था जो पिछले तीन सालों में कहीं खो गया था।
गायत्री देवी के हाथ से वो बॉक्स लगभग फिसलने ही वाला था। जिस बहू को वो 100 रुपये के लिए भी तरसाती थीं, जिसे वो 'अनपढ़' और 'घर की चारदीवारी तक सीमित' समझती थीं, आज उस बहू ने अपनी कमाई से उनकी बोलती बंद कर दी थी। यह पेंडेंट सिर्फ सोना नहीं था, यह सृष्टि के 'आत्मसम्मान' का तमगा था।
सृष्टि ने अपनी बात जारी रखी, "माँझी, मुझे पता है आपको लगता है कि पैसों पर नियंत्रण रखने से परिवार जुड़ता है। लेकिन विश्वास मानिए, जब एक औरत को अपनी छोटी-छोटी खुशियों के लिए हाथ फैलाना पड़ता है न, तो परिवार जुड़ता नहीं, बल्कि उसका मन परिवार से टूट जाता है। मैंने यह काम इसलिए शुरू नहीं किया कि मुझे पैसों का लालच है, बल्कि इसलिए किया ताकि मुझे अपनी माँ के इलाज के लिए या अपनी स्वाभिमान की रक्षा के लिए किसी के सामने गिड़गिड़ाना न पड़े।"
गायत्री देवी की नज़रें झुक गईं। उन्हें वो दिन याद आ गया जब उन्होंने सृष्टि की बीमार माँ के लिए पैसे देने से मना कर दिया था। आज उसी बहू ने उनके मान-सम्मान को सबके सामने बढ़ाया था।
मेहमानों में से किसी ने ताली बजाई। धीरे-धीरे सब ताली बजाने लगे। "वाह बेटा! बहुत खूब। आजकल की बहुएं ऐसी ही होनी चाहिए, आत्मनिर्भर।"
उस रात, पूजा के बाद गायत्री देवी सृष्टि के कमरे में आईं। सृष्टि अपना लैपटॉप बंद कर रही थी।
गायत्री देवी ने वो पेंडेंट मेज पर रखा।
"क्या हुआ माँ जी ? पसंद नहीं आया?" सृष्टि ने पूछा।
"नहीं," गायत्री देवी ने भारी आवाज़ में कहा। "पेंडेंट बहुत सुंदर है। पर यह मेरे गले में नहीं, तेरे गले में शोभा देगा। यह तेरी मेहनत की जीत है।"
फिर उन्होंने अपनी कमर से वो चाबियों का गुच्छा निकाला, जो उनकी सत्ता का प्रतीक था, और उसे मेज पर रख दिया।
"सृष्टि, मुझे माफ़ कर दे। मुझे लगा था कि मैं तुझे दबाकर रखूँगी तो घर अच्छे से चलेगा। पर मैं भूल गई थी कि लक्ष्मी को कैद नहीं किया जाता, उसका सम्मान किया जाता है। आज तूने मुझे आईना दिखा दिया। यह चाबियां रख, और हाँ... कल से तुझे छिपकर काम करने की ज़रूरत नहीं है। उस सामने वाले कमरे को तू अपना ऑफिस बना ले।"
सृष्टि ने सास के पैर छुए, और इस बार गायत्री देवी ने उसे दिल से गले लगाया। मोहित दरवाजे पर खड़ा मुस्कुरा रहा था। उसे अपनी गलती का एहसास भी था और पत्नी पर गर्व भी।
सृष्टि ने साबित कर दिया था कि नारी की असली शक्ति उसकी आवाज़ ऊँची करने में नहीं, बल्कि खुद को इतना सक्षम बनाने में है कि उसकी खामोशी और कर्म शोर मचा दें। उस दिन उस घर से 'याचक' (मांगने वाली) बहू की विदाई हुई और एक 'स्वावलंबी' (आत्मनिर्भर) बेटी का गृहप्रवेश हुआ।
कहानी का सार:
आर्थिक स्वतंत्रता (Financial Independence) एक औरत के लिए सिर्फ पैसे कमाना नहीं, बल्कि अपना खोया हुआ आत्मसम्मान वापस पाना है। परिवार में सामंजस्य ज़रूरी है, लेकिन किसी को इतना मजबूर मत करो कि वो अपनी ही नज़रों में गिर जाए। जब एक बहू अपने पैरों पर खड़ी होती है, तो वो घर को बांटती नहीं, बल्कि और मज़बूत बनाती है।
सवाल आपके लिए:
क्या आपको भी लगता है कि हर घरेलू महिला को, चाहे घर में कितनी भी संपन्नता हो, आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना चाहिए? क्या 'हाउसवाइफ' होना उसे अपनी जरूरतों के लिए पैसे मांगने पर मजबूर करता है? अपने विचार कमेंट बॉक्स में ज़रूर लिखें।
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