"कभी-कभी परिवार को बिखरने से बचाने के लिए एक स्त्री को 'बुरी' बनना पड़ता है। क्या एक बहू का अधिकार मांगना हमेशा लालच होता है, या कभी-कभी यह एक डूबते हुए घर को बचाने की आखिरी कोशिश होती है?"
"नहीं आदित्य!" शिखा की आवाज़ में एक ऐसी दृढ़ता थी जो आज से पहले किसी ने नहीं देखी थी। "मैं माफ़ी नहीं मांगूंगी। पिछले तीन साल से मैं चुप थी, लेकिन अब और नहीं। क्या आपको पता है कि पिछले महीने मुन्नू की स्कूल फीस भरने के लिए मुझे अपने मायके से पैसे मांगने पड़े थे? क्या आपको पता है कि घर में राशन नहीं था और माँ जी ने पैसे देने से मना कर दिया था?"
महीने की पहली तारीख थी। शाम का वक्त था और घर के बाहर हल्की बारिश हो रही थी, लेकिन शर्मा निवास के अंदर का माहौल किसी तूफ़ान से कम नहीं था।
आदित्य ऑफिस से लौटा ही था। पसीने से लथपथ, कंधे पर बैग टांगे वह सीधा अपनी माँ, सुमित्रा देवी के पास गया। सुमित्रा जी सोफे पर बैठी माला जप रही थीं, लेकिन उनकी नज़रें बार-बार दरवाजे की तरफ उठ रही थीं। बेटे को देखते ही उनके चेहरे पर एक विजयी मुस्कान आ गई। यह पिछले पांच सालों का नियम था। आदित्य को तनख्वाह मिलती, वह घर आता और सीधे सफेद लिफाफा अपनी माँ के चरणों में रख देता। सुमित्रा जी उसे आशीर्वाद देतीं और फिर उस लिफाफे को अपनी अलमारी की उस तिजोरी में रख देतीं, जिसकी चाबी उनके पल्लू में बंधी रहती थी।
आज भी आदित्य ने जेब से लिफाफा निकाला। "माँ, ये लो इस महीने की तनख्वाह। इसमें बोनस भी है।"
सुमित्रा जी का हाथ लिफाफे की ओर बढ़ा ही था कि अचानक हवा के झोंके की तरह एक हाथ बीच में आया और लिफाफा झपट लिया।
यह हाथ शिखा का था। आदित्य की पत्नी और इस घर की बहू।
कमरे में सन्नाटा छा गया। सुमित्रा जी का हाथ हवा में ही रह गया। आदित्य हक्का-बक्का होकर अपनी पत्नी को देखने लगा।
"यह क्या बदतमीजी है शिखा?" सुमित्रा जी की आवाज़ कांपी, गुस्से और अपमान से। "बेटे की कमाई पर माँ का पहला हक होता है। तूने मेरे हाथ से पैसे छीनने की जुर्रत कैसे की?"
शिखा की आँखों में आंसू थे, लेकिन उसका चेहरा सख्त था। उसने लिफाफे को अपनी मुट्ठी में भींच लिया और बोली, "माँ जी, हक उसका होता है जो जिम्मेदारी समझता है। और अब बहुत हो गया। यह पैसा अब उस तिजोरी में नहीं जाएगा जहाँ से यह कभी वापस नहीं आता।"
आदित्य चिल्लाया, "शिखा! तुम अपनी हद पार कर रही हो। माँ से माफ़ी मांगो और पैसे वापस करो।"
"नहीं आदित्य!" शिखा की आवाज़ में एक ऐसी दृढ़ता थी जो आज से पहले किसी ने नहीं देखी थी। "मैं माफ़ी नहीं मांगूंगी। पिछले तीन साल से मैं चुप थी, लेकिन अब और नहीं। क्या आपको पता है कि पिछले महीने मुन्नू की स्कूल फीस भरने के लिए मुझे अपने मायके से पैसे मांगने पड़े थे? क्या आपको पता है कि घर में राशन नहीं था और माँ जी ने पैसे देने से मना कर दिया था?"
सुमित्रा जी सोफे से खड़ी हो गईं। "झूठी कहीं की! मैंने कब मना किया? मैं तो बस यह कहती हूँ कि फालतू खर्चा मत करो। मैं पैसे जोड़ रही हूँ, तुम लोगों के भविष्य के लिए ही तो।"
"भविष्य?" शिखा कड़वाहट से हंसी। "कौन सा भविष्य माँ जी? वो भविष्य जो आपके छोटे बेटे, यानी मेरे देवर रोहन के जुए और शराब में उड़ रहा है?"
यह सुनते ही सुमित्रा जी का चेहरा पीला पड़ गया। आदित्य को जैसे सांप सूंघ गया हो। "क्या बकवास कर रही हो तुम?"
"बकवास नहीं, सच कह रही हूँ आदित्य," शिखा ने अपनी अलमारी से एक डायरी निकाली और टेबल पर पटक दी। "यह देखिए। यह है उस 'भविष्य' का हिसाब। हर महीने आपकी तनख्वाह का आधा हिस्सा माँ जी चुपके से रोहन को भेज देती हैं, जो मुंबई में मॉडलिंग के नाम पर ऐश कर रहा है। और बाकी बचे पैसों से वो अपनी बेटियों, यानी आपकी बहनों के लिए सोने के गहने बनवा रही हैं ताकि समाज में उनकी नाक ऊंची रहे। और यहाँ? यहाँ हम एक-एक रुपये के लिए तरस रहे हैं। आदित्य, आपकी शर्ट के कॉलर घिस चुके हैं, मुन्नू के जूते फट गए हैं, और मुझे अपनी बीमारी के इलाज के लिए छह महीने से टालना पड़ रहा है।"
सुमित्रा जी चिल्लाईं, "तू मेरे बेटे को मेरे खिलाफ भड़का रही है! रोहन मेरा बेटा है, अगर उसे ज़रूरत है तो मैं क्यों न दूं? और बेटियों को देना क्या गुनाह है?"
"देना गुनाह नहीं है माँ जी," शिखा ने सिसकते हुए कहा, "लेकिन घर की नींव खोदकर दूसरों के महल बनाना गुनाह है। आदित्य दिन-रात मेहनत करके अपनी हड्डियां गलाते हैं, इसलिए नहीं कि रोहन क्लबों में पार्टियां करे। वो इसलिए कमाते हैं ताकि उनका परिवार, उनका बच्चा सुरक्षित महसूस करे। लेकिन आपने इस घर को खोखला कर दिया है।"
आदित्य अभी भी विश्वास नहीं कर पा रहा था। वह माँ की तरफ मुड़ा, "माँ, क्या शिखा सच कह रही है? क्या पिछले महीने जब मुझे कार की सर्विसिंग के लिए पांच हज़ार चाहिए थे और आपने कहा था कि पैसे नहीं हैं, तब आपने रोहन को दस हज़ार भेजे थे?"
सुमित्रा जी चुप रहीं। उनकी चुप्पी ने सब बयां कर दिया।
शिखा ने एक गहरा सांस लिया और कहा, "आदित्य, आज मैं यह पैसे अपने ऐश-ओ-आराम के लिए नहीं रख रही। मैं इसे इसलिए रख रही हूँ क्योंकि अब इस घर का मैनेजमेंट मैं संभालूंगी। माँ जी, आप बुज़ुर्ग हैं, आपका सम्मान सिर आँखों पर। आपको खाने-पीने, दवा-दारू या किसी भी चीज़ की कमी नहीं होगी। लेकिन 'कैश' अब आपके हाथ में नहीं रहेगा।"
सुमित्रा जी ने रोना-पीटना शुरू कर दिया। "हाय राम! कलयुगी बहू आ गई। जीते जी मुझे मक्खी की तरह दूध से निकाल फेंका। आदित्य, तू खड़ा-खड़ा देख रहा है? यह औरत मेरी बेइज्जती कर रही है और तू चुप है?"
आदित्य असमंजस में था। एक तरफ उसकी जन्म देने वाली माँ थी, और दूसरी तरफ उसकी पत्नी, जो कड़वा ही सही, पर सच बोल रही थी।
उस रात घर में चूल्हा नहीं जला। शिखा अपने कमरे में रोती रही। उसे बुरा लग रहा था। वह ऐसी नहीं थी। उसे बड़ों का अपमान करना पसंद नहीं था। लेकिन जब पानी सिर से ऊपर चला जाए, तो तैरना ही पड़ता है, चाहे हाथ-पैर मारने पड़ें।
अगले तीन महीने घर का माहौल बहुत तनावपूर्ण रहा। सुमित्रा जी ने शिखा से बात करना बंद कर दिया। वो पड़ोसियों से शिखा की बुराई करतीं, "डायन है मेरी बहू, मेरे बेटे की कमाई हड़प ली।" शिखा सब चुपचाप सुनती।
लेकिन शिखा ने घर का नक्शा बदल दिया। उसने सबसे पहले आदित्य का हेल्थ इंश्योरेंस करवाया। मुन्नू को ट्यूशन लगवाया। घर का राशन अब वक्त पर आता था। उसने थोड़े-थोड़े पैसे बचाकर आदित्य के लिए एक नई बाइक भी बुक कर दी, जिसकी उसे बहुत ज़रूरत थी।
फिर एक दिन, जिसकी शिखा को आशंका थी, वही हुआ।
रात के 11 बजे फोन की घंटी बजी। फोन मुंबई से था। रोहन पुलिस थाने में था। किसी बार में झगड़ा हो गया था और उसने नशे में किसी का सिर फोड़ दिया था। सामने वाली पार्टी केस रफा-दफा करने के लिए दो लाख रुपये मांग रही थी, वरना रोहन को जेल हो जाती।
सुमित्रा जी के हाथ-पैर फूल गए। वो दौड़कर अपनी तिजोरी के पास गईं, लेकिन तिजोरी खाली थी। पिछले तीन महीनों से उसमें एक पैसा नहीं गया था। और उससे पहले के सारे पैसे तो वो रोहन को ही लुटा चुकी थीं।
वो रोते हुए आदित्य के पास आईं। "बेटा, मेरे रोहन को बचा ले। पुलिस उसे मार डालेगी। कुछ कर बेटा, मुझे दो लाख रुपये चाहिए।"
आदित्य ने सिर पकड़ लिया। "माँ, मेरे पास इतने पैसे कहाँ हैं? शिखा घर चलाती है, उसके पास जो बचता है वो बैंक में डाल देती है। एकदम से दो लाख कहाँ से आएंगे?"
सुमित्रा जी ने शिखा की तरफ देखा। उनकी आँखों में अब गुस्सा नहीं, लाचारी थी। वह जानती थीं कि उन्होंने शिखा के साथ कितना बुरा बर्ताव किया है। उन्हें उम्मीद नहीं थी कि शिखा मदद करेगी।
शिखा चुपचाप उठी और अंदर कमरे में गई। थोड़ी देर बाद वह एक चेकबुक और कुछ कागजात लेकर बाहर आई।
"आदित्य, यह फिक्स्ड डिपॉजिट के कागज़ हैं जो मैंने पिछले तीन साल में अपनी छोटी-मोटी ट्यूशन की कमाई और पिछले तीन महीने की आपकी बचत से बनाए थे। और यह चेक है," शिखा ने चेक सुमित्रा जी के हाथ में रखा।
सुमित्रा जी सन्न रह गईं। "तू... तूने यह पैसे रोहन के लिए दिए हैं? उस रोहन के लिए जिसे तू नफरत करती है?"
शिखा ने सुमित्रा जी के हाथ अपने हाथों में लिए और बोली, "माँ जी, मैं रोहन से नफरत नहीं करती, मैं उसकी आदतों से नफरत करती हूँ। और सबसे बड़ी बात, वह इस घर का बेटा है। अगर वह जेल गया, तो बदनामी सिर्फ उसकी नहीं, पूरे परिवार की होगी। आपकी होगी, आदित्य की होगी। मैं इस घर की बहू हूँ, इस घर की इज़्ज़त पर आंच कैसे आने दे सकती हूँ?"
सुमित्रा जी की आँखों से पश्चाताप के आंसू बह निकले। वो जिस बहू को 'लुटेरी' और 'घर तोड़ने वाली' समझ रही थीं, उसने ही आज घर की इज़्ज़त बचाई थी। उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ। वो समझ गईं कि जो पैसा वो 'ममता' के नाम पर रोहन पर लुटा रही थीं, उसने रोहन को अपाहिज बना दिया था। और जिस सख्ती को वो शिखा की 'बदतमीजी' समझ रही थीं, वो असल में एक कड़वी दवा थी जो घर को बचाने के लिए ज़रूरी थी।
सुमित्रा जी ने चेक मेज पर रख दिया।
"नहीं बहू," सुमित्रा जी ने आंसू पोंछते हुए कहा। "अब और नहीं। अगर आज हम उसे बचा लेंगे, तो कल वह फिर कोई गुनाह करेगा। उसे अपनी गलती की सजा भुगतने दो। उसे पता चलने दो कि पैसे पेड़ पर नहीं उगते।"
"लेकिन माँ..." आदित्य ने कुछ कहना चाहा।
"चुप रह आदित्य," सुमित्रा जी ने सख्ती से कहा। "तेरी बीवी सही थी। मैं अंधी हो गई थी पुत्र-मोह में। आज मुझे समझ आया कि घर तिजोरी में रखे पैसों से नहीं चलता, बल्कि सही फैसलों से चलता है। शिखा ने आज मेरी आंखें खोल दीं।"
सुमित्रा जी ने शिखा को गले लगा लिया। "मुझे माफ़ कर दे बेटी। मैं तुझे पहचान नहीं पाई। तूने मेरे हाथ से पैसे नहीं छीने थे, तूने तो मेरे बेटे का भविष्य बर्बाद होने से बचाया था। आज से यह घर, यह तिजोरी और हम सब... तेरी जिम्मेदारी हैं।"
उस रात, शर्मा निवास में फिर से शांति थी। यह शांति डर या तनाव की नहीं, बल्कि समझदारी और विश्वास की थी। आदित्य ने गर्व से अपनी पत्नी को देखा। उसे महसूस हुआ कि लक्ष्मी सिर्फ वो नहीं होती जो धन लाती है, असली गृहलक्ष्मी वो होती है जो धन का सही उपयोग करके घर को सुरक्षित रखती है।
अगले दिन, रोहन को जमानत तो मिल गई, लेकिन सुमित्रा जी ने साफ कह दिया कि अब उसे एक भी पैसा नहीं मिलेगा। उसे खुद कमाना होगा। और यह सब मुमकिन हुआ शिखा के उस एक साहसिक कदम की वजह से, जिसे दुनिया ने 'बदतमीजी' का नाम दिया था।
सच ही कहा है, कड़वी दवा पीने में मुश्किल जरूर होती है, लेकिन वही जान बचाती है।
कहानी का सार:
दोस्तों, यह कहानी हमें सिखाती है कि परिवार में हर बार जो मीठा बोलता है, वही हमारा हितैषी नहीं होता। कभी-कभी कड़वे फैसले लेने वाले लोग ही हमारे सच्चे रक्षक होते हैं। एक पत्नी जब घर की बागडोर संभालती है, तो उसका मकसद किसी पर राज करना नहीं, बल्कि अपने परिवार को सुरक्षित रखना होता है। पैसे कमाना आसान है, लेकिन उसे सही जगह खर्च करना और बचाना ही असली समझदारी है।
प्रश्न आपके लिए:
क्या शिखा का तरीका सही था? क्या एक बहू को सास के हाथ से आर्थिक नियंत्रण लेना चाहिए अगर सास गलत फैसले ले रही हो? या बड़ों का सम्मान हर हाल में ऊपर होना चाहिए? अपनी राय कमेंट में जरूर लिखें।
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