सवेरे-सवेरे बालकनी में बैठकर जैसे ही मीरा ने चाय का प्याला होठों से लगाया, ताजगी की झनझनाहट पूरे शरीर में फैल गई। मस्तिका तरोताजा हो गई; रात की सारी थकान फूल सी उड़ गई। अभी सूरज पूरी तरह उगा नहीं था, हल्की-सी गुलाबी आसमान में फैली हुई थी। ठंडी हवा के झोंकों ने जैसे ही गालों को छूआ, मीरा को बहुत सुकून मिला — क्यों न मिले, बेचैन तो वह हमेशा ही थी। आखिर बहुत कुछ कहा-सा कुछ दबा था; आज फिर चाय के साथ पुरानी यादें भी ताजा हो गईं। जीवन की 40 वसंत उसने देखे थे। तीनों भाइयों की इकलौती बहन थी। संपन्न, आदर्शवादी परिवार — पिता रामचरण शर्मा ने बेटी को कभी बेटे से कम नहीं माना; खूब पढ़ाया-लिखाया, कभी किसी चीज की कमी महसूस न होने दी। पर आदर्शों को घुट्टी में मिलाकर ऐसा पिला दिया गया था कि ‘पति ही नारी का परमेश्वर होता है और उसका घर वही होगा’।
मीरा ने खूब मन लगाकर पढ़ाई की। उम्र भी ढलती चली गई, उसकी सरकारी नौकरी लग गई। अब विवाह बढ़ने लगा, संस्कारी परिवार की खोज होने लगी, और एक शुभ मुहूर्त में मीरा का विवाह राकेश द्विवेदी के साथ हुआ। पति अच्छा कमाने वाला था। मीरा को सभी ने पलकों पर बिठाया हुआ था—आखिर कमाने वाली बहू थी, अच्छी तनख्वाह मिलती थी। कुछ बरस सब ठीक चला।
पर पहाड़ तब टूटा जब चार वर्ष बाद भी मीरा की संतान नहीं हुई। डॉक्टर परीक्षण से पता चला कि गर्भाशय में विकार के कारण वह कभी माँ नहीं बन सकेगी। निदान निश्चयी रहा—कोई उपचार संभव नहीं था। मीरा की ज़िन्दगी अचानक बदल गई। परिवार के हर सदस्य की नज़र में वह 'दोषी' बन गई; उसका गुनाह यही था कि वह वंश को आगे नहीं बढ़ा सकी। परिवार के लोग कहते—‘हम किसी को गोद भी तो लें सकते हैं’, पर वे इसे स्वीकार न कर सके।
मीरा अचंभित सी रह गई—क्या सच में किसी अजनबी का बच्चा हमारा वारिस कैसे कहलाएगा? राकेश ने लगभग चीखते हुए कहा था कि ऐसा व्यवहार उसे स्वीकार नहीं। मीरा असमंजस में थी कि क्या उपाय करें। वह अजनबी सी हो गई थी। जब और कोई रास्ता न रहा, तो उसने दिल पर पत्थर रखकर अलग होने का निर्णय लिया। पिता ने स्पष्ट कर दिया था कि यहाँ उसका कोई स्थान नहीं है; वे अब भाइयों के हिस्से पर ही पाल रहे हैं। उसके लिए घर पराया हो गया था—कोई जगह न थी जहाँ वह जा सके।
सो उसे स्थानांतरण मिलवाकर एक अजनबी शहर में नई दुनिया बसाने आना पड़ा। अब यह नौकरी और अकेलापन ही उसकी ज़िंदगी बन गए। वह फिर मीरा शर्मा बन गई और इसी में खुश रहना सीख रही थी। जीवन की एक परिक्रमा पूरी हुई।
रात में तेज़ खटखटाने की आवाज़ से मीरा की तंद्रा टूटी। दरवाज़ा धकेलते हुए लाचिमा अंदर घुसी; उसके साथ एक चार-पाँच वर्ष की नन्ही सी लड़की भी थी, जिसे वह संग लायी थी। लाचिमा हर रोज़ बिना पूछे ही मीरा को पूरे मोहल्ले की ख़बर दे दिया करती थी — चाहे सुने या न सुने, उसे कोई फ़र्क नहीं पड़ता था। सब कुछ बता देने से ही उसे चैन मिलता था। कुछ देर तक टैंग पसार कर आराम कर लेती, इधर-उधर की बातें बताती और गर्म चाय की चुस्की लेती—यह उसका रोज़ का रूटीन था। यह सब उसे मोहल्ले का रोचक चरित्र बना चुका था।
आज मीरा चुप-सा बैठी नन्ही और लाचिमा को देखकर बोली, “अरे लाची, तेरी बच्ची तो अभी बहुत छोटी है—यह किसकी लाई?”
लाचिमा सहज मुद्रा में बोली, “पहले चाय बना लीजिए, फिर पीते-पीते सब सुनाएँगे।” और फिर वह बोलने लगी—“बीवीजी, आप तो जानती हो कि मेरा मामला प्राइवेट क्लिनिक में पहरेदारी का है। एक रात एक मर्द और बेटी आए अपने क्लिनिक में प्रसव करवाने के लिए। बेटी को प्रसव की पीड़ा थी और बच्ची हुई। आधी रात को दोनों चला गए; सुबह जब मेरा मर्द उठा तो देखा नवजात बच्ची अकेली पड़ी थी। डॉक्टर साहब को जगाया गया; उन्हें पूरा किस्सा समझ में आ गया। पाँच साल बाद उस मर्द ने उसे छोड़ दिया, तो बच्ची वापस यहीं भेज दी गई। पता नहीं किसका पाप है, पर इंसान की औलाद ही ईश्वर है। कहानी यहीं ख़त्म नहीं हुई—वह उठी और काम पर चली गई।”
मीरा पास बैठी अपनी कहानी को गौर से सुन रही थी। पता नहीं कितनी बातों को समझी या नहीं, पर उसकी मुखमुद्रा उदास हो गई। मीरा को उस पर प्यार आया। उसने उसे पास बुलाया और ध्यान से देखा—बड़ी-बड़ी काली आँखें, पतला नैन-भौं, उजला रंग—सचमुच परी जैसी लग रही थी। नन्ही में सब कुछ था; यदि कुछ नहीं था तो था ‘भाग्य’।
लाचिमा बोली, “बीवीजी, बुरा मत मानिएगा, मैं आपकी निंदा नहीं कर रही, पर आप जैसे समझदार लोग अपनी उम्र निकल जाने पर बच्चों को कूड़े में फेंक दें तो पुण्य और पाप का क्या हिसाब होगा? अगर मैं उसका ब्याह कर दूँ तो पापी कहां जाएगा? तुम्हारे भगवान का न्याय कहाँ है?” मीरा की बोलती बंद हो गई। लाचिमा अनपढ़ होकर भी इतनी गहरी बात कह गई थी—सच ही कहा उसने।
मीरा का मन काँप उठा; उसमें कड़वाहट फैल गई। कुछ करने का मन नहीं हो रहा था, पर नन्ही के विचार को वह झटक भी नहीं पा रही थी। पूरा दिन वह बस उसी के बारे में सोचती रही। बहती आँखों में शायद अपनी संतान का सुख ढूँढ रही थी। आज मीरा का मन बहुत उथल-पुथल में था; वह एक महत्वपूर्ण निर्णय लेना चाहती थी। सोचने लगी—क्यों न नन्ही को गोद ले लिया जाए? यह विचार उसके मन में मस्ती और उथल-पुथल दोनों मचा गया। बड़े-बड़े पुण्य, धर्म और कर्म करने से किसी एक के जीवन को तो संवार दिया जा सकता है—यह बोझ वह उठा सकती थी; वह खुद भी बेसहारा थी।
इतने विचारों के बीच लाचिमा और नन्ही घर के भीतर आईं। उसे देखकर मीरा की आँखें चमक उठीं—“लाची, आज तू कम रहना, चाय बना, तुझसे कुछ कहना है।” चाय पीते हुए मीरा ने बात छेड़ी—“लाची, तू नानी को किसी को गोद क्यों न दे दे? तेरा भी बोझ हल्का हो जाएगा और नन्ही को भी अच्छा परिवार मिल जाएगा।”
लाचिमा थोडा हैरान-सा बोली—“बीवीजी, हम गरीब जरूर हैं, पर बच्चों को भेजते नहीं। आप इसे गोद लेना चाहती हैं?” मीरा की आँखें अविश्वासी निगाहों से लाचिमा को कुछ देर तक देखती रहीं। फिर लाचिमा बोली—“नहीं, बीवीजी, मैंने तो यूँ ही तुझे मनाने के लिए कहा था। पर तू ठीक कहती है। मैं तेरी भावनाओं की इज़्ज़त करती हूँ—तू अपने मर्द से पूछ लो, उसका क्या विचार है। फिर हम कानूनी तौर पर सारी कार्यवाही कर लें।”
मीरा ने कहा कि वह कुछ वर्षों के लिए नन्ही को इस वातावरण से दूर रखना चाहती थी ताकि जीवन की कड़वी यादें उसे पूरी तरह भूल जाँय। आज नन्ही को भेजना उदास कर रहा था, पर अचानक उसे एहसास हुआ कि नन्ही का जाना जरूरी है—नए माहौल में वह कुछ और तरीके सीख लेगी और अपने आप को भी बदल लेगी। और फिर डरना क्या, कभी-कभी मीरा उसे मिलती भी रहेगी। मीरा का तूफ़ान मानो थम गया हो; सब तैयारी हो गई। मीरा ने नन्ही को कई हिदायतें दीं—कैसे रहना है, क्या खाना है, कैसे व्यव्हार करना है—और वादा किया कि वह मिलने आती रहेगी।
नानी का ध्यान उसकी बातों से अलग कहीं और था; नन्ही और पलखें उसकी ओर देख रही थीं। मीरा सहज भाव से बोली—“नही, मैं कितनी देर से सब समझा रही हूँ और तुम ध्यान तक नहीं दे रही हो। क्या सोच रही हो? क्या समझी?” नन्ही ने प्यार से अपनी छोटी बहन को गले लगाया और आँखों में चमक लेकर बोली—“हाँ, क्या कह सकती हूँ नानी—मैं तो तुम्हारे साथ रहूँगी।”
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