विशाल आज देर रात घर वापस आया तो बहुत खुश था।
उसे अपना बटुआ पकड़ते हुए बोला –
“लो कर लो अपनी मन की पूरी।
जो लेना है ले आओ।
इतने दिन से 8 तोले के हार के पीछे पड़ी थी,
वह भी अब आ ही जाएगा।”
2000 के नोटों की मोटी गड्डी रखी थी।
गीता खुश होकर बोली –
“किसी ऑर्डर का एडवांस मिला है क्या?”
तो वह बोला –
“नहीं… लॉटरी लगी।
टक्कर मार गया था।
सुनसान जगह थी तो टक्कर मारने वाला भी जल्दी से भाग गया होगा।
मैं गाड़ी से उतर कर उसे उठा ही रहा था कि मेरी नज़र उसके पर्स पर पड़ी,
जो जमीन पर गिरा पड़ा था।
बस… नोटों से भरे पर्स को देखकर मैंने सोचा,
इस आदमी से मेरा कोई लेना-देना भी नहीं है।
इसे बचाकर कोई इनाम मिलने वाला नहीं है।
अगर इन पैसों से उर्मिला को हार दिला दूँगा तो वह बहुत खुश हो जाएगी।
तो बस, उसके पर्स में से पैसे निकालकर फटाफट आ गया।”
उसकी बातें सुनकर गीता की आंखों से टप-टप आंसू गिरने लगे।
वह सोचने लगी –
“मेरी जिद ने विशाल को एक आदमी की जान बचाने से रोक लिया
और उसका ईमान भी डगमगा दिया।”
उसे अपने ऊपर बड़ी ग्लानि हुई।
वह रोते हुए बोली –
“मुझे कोई हार नहीं चाहिए।
बस अभी उलटे जाकर उस आदमी को बचा लो।
अभी ज्यादा देर नहीं हुई है।”
गीता की बातें सुनकर विशाल ने तुरंत पुलिस को फोन किया,
दुर्घटना के बारे में बताया
और गीता के साथ उसे बचाने के लिए चल दिया।
वे लोग वहां पहुंचे।
पुलिस भी आ चुकी थी।
फिर उस आदमी को अस्पताल पहुंचाया गया।
डॉक्टर ने जितना खर्चा बताया,
वह सब विशाल ने उसी पर्स से मिले पैसों से जमा कर दिया।
कई घंटे तक वे अस्पताल में ही रहे।
उस आदमी के घर वाले भी आ गए।
वे विशाल को बार-बार शुक्रिया अदा कर रहे थे।
सबकी निगाहें ऑपरेशन थिएटर पर ही लगी थीं।
जब डॉक्टर ने आकर मरीज की जान खतरे से बाहर बताई,
तो विशाल और गीता के दिल को बहुत सुकून मिला।
उनकी ग्लानि भी दूर हो गई।
फिर वे बचे हुए पैसे उसके घरवालों को देकर
अपने घर की ओर चल दिए।
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