प्रायश्चित

 अच्छे खाते-पीते घर की बेटी और बहू को इस हाल में देखूंगी, यह मैंने कभी नहीं सोचा था।

आज 30 साल बाद वापस इस शहर में ट्रांसफर होकर आने पर मैं बहुत खुश थी कि पुराने दोस्तों से मुलाकात होगी और बचपन की यादें ताज़ा होंगी।

पर चंदा दीदी को फटे-पुराने कपड़ों में सड़कों पर घूमते देखकर मैं अंदर तक हिल गई।

अपने मां-बाप की इकलौती औलाद, चंदा दीदी — अपने पिता की बहुत मन्नत-मुरादों का फल थीं।
ढलती उम्र की संतान को उन्होंने बहुत दुलार से बड़ा किया था।
उसकी हर ख्वाहिश पूरी की जाती थी।
अपने मां-बाप की आंख का तारा, चंदा दीदी ने आठवीं के बाद पढ़ाई छोड़ दी और घर पर ही रहीं।

दिनभर या तो वह सोती रहतीं, या खाती रहतीं, या मोहल्ले में इधर-उधर घूमतीं।
कभी पिता की दुकान पर जाकर नौकरों को डांट देतीं।
घरदारी सीखने और पढ़ने में तो उनकी रुचि ही नहीं थी।

मैं उस समय तीसरी कक्षा में पढ़ती थी।
चंदा दीदी हमारे मोहल्ले में ही रहती थीं।
हम बच्चों के साथ वह बहुत अच्छा व्यवहार करतीं।
हमें अक्सर कभी इमली, कभी मीठी गोलियां, और कभी अमरूद देतीं।

उनसे जुड़ी आखिरी याद बस यही है कि जब मैं मैट्रिक में थी तो चंदा दीदी का ब्याह हो गया।
फिर उनसे मुलाकात नहीं हुई।
उनका ससुराल भी संपन्न था।
पति भी अपने माता-पिता की इकलौती संतान थे।

आज उन्हें यूँ भटकते देख मैं समझ नहीं पा रही थी कि क्या करूं।
पति के साथ बीच बाजार में एक अधमरी-सी महिला का हाथ पकड़कर खड़े होना अजीब लग रहा था।
उनकी आंखों में सवाल थे।
सवाल तो मेरे मन में भी थे, जिनके जवाब सिर्फ वही दे सकती थीं।

चंदा दीदी मुझे पहचान गईं।
मनुहार करने पर वह मेरे साथ चलने को राज़ी हो गईं।
घर पहुँचकर मैंने उनसे नहाने का आग्रह किया।
वह मान गईं।
नहा-धोकर मेरे साफ कपड़े पहनकर, थोड़ा नाश्ता करने के बाद वे शांत मन से बोलीं –

“तुम्हें भी मैं पागल लग रही हूँ ना?”

“नहीं दीदी, ऐसा नहीं है,” मैंने कहा।
“पर आप इस हालत में क्यों घूम रही हैं?”

“मैं प्रायश्चित कर रही हूँ,” उन्होंने कहा।
“अपनी भूल का... ऐसी भूल, जिसने मुझे आज इस हालत में पहुंचा दिया।”

फिर उन्होंने कहना शुरू किया –

“मैं वही हूँ, जिसे हमेशा थाली में ढेर सारा खाना छोड़ने की आदत थी।
मैं वही हूँ, जो शादी के बाद दो लोगों के लिए चार लोगों का खाना बनाती और रोज बचा खाना फेंक देती।
मैं वही हूँ, जो कभी सुबह की सब्ज़ी-रोटी शाम को नहीं खाती थी।
मैं वही हूँ, जो दूसरों की बर्बादी रोकने की सलाह सुनकर मुंह फुला लेती थी।
मैं वही हूँ, जो पिता और पति के घर में हफ्ते में तीन दिन होटल का खाना खाती थी।
मैं वही हूँ, जिसकी रसोई में अनाज में कीड़े पड़ते रहते थे और मैं बेपरवाह रहती थी।

मैंने जीवन में सिर्फ मनमानी की।
पति ने मेरी हर गलती माफ़ की,
लेकिन बच्चों की परवरिश देखकर उन्हें लगा कि मैं उन्हें भी अपनी तरह बिगाड़ दूँगी।
इसलिए वे बच्चे लेकर मुझे छोड़ गए।

मुआवजे में जो रकम मिली,
वह भी मैंने कुछ ही सालों में बर्बाद कर दी।
मेरी फुहड़ता और ज़िद ने मुझे आज इस हालत में खड़ा किया है।
मैंने अपने ही कर्मों से अपनी यह जगह तय की है।

जितना झूठा मैंने छोड़ा,
जितनी बर्बादी मैंने की,
उससे एक आदमी की आधी ज़िंदगी गुजर सकती है।

आज रिश्तेदारों और लंगरों के भोजन पर जीवित हूँ।
कर्म का हिसाब भोग रही हूँ।
मैंने अन्न फेंका था,
आज उसी के लिए भिक्षा मांग रही हूँ।”

चंदा दीदी खामोश हो गईं।
मेरे पास भी कहने को कुछ नहीं था।


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