जिस घर का कोना-कोना रिया की खनकती आवाज से गूँजता था,उसके कहकहों के साथ मानो घर की दीवारें भी मुस्कराती थीं,वर्षों से उसी घर की दीवारें भी उसकी याद में सिसकती हैं।
शरीर के घाव तो देर-सबेर भर ही जाते हैं,परन्तु मन के कुछ घाव ऐसे होते हैं,जो हरे ही रहते हैं।कुसुमजी के मन के घाव भी बीस वर्ष बीत जाने पर भी खुले ही हैं और सदैव टीसते रहते हैं।बड़े ही अरमानों से उन्होंने अपने दोनों बच्चों की परवरिश की।पति-पत्नी ने बेटी और बेटा दोनों को ही संस्कार और सामाजिक मूल्यों की शिक्षा दी।
जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही अचानक से बेटी रिया के रंग-ढ़ंग बदलने लगें।पढ़ाई से ज्यादा सजने-सँवरने में उसका मन लगने लगा।कुसुम दम्पत्ति जमाने की नई चलन समझकर बेटी रिया की ज्यादा टोका-टोकी नहीं करते।अकस्मात् एक दिन रिया किसी लड़के संग भाग गई। उनके पारिवारिक और सामाजिक जीवन में धब्बा लग चुका था,फिर भी माता-पिता बेटी की सलामती और खुशी की कामना कर रहे थे।परन्तु कुछ दिनों बाद ही रिया की आत्महत्या की खबर ने उन्हें तोड़कर रख दिया।उनकी जिन्दगी में दुहरा दुःख पहुँचा।एक तो प्यारी संतान जीवित नहीं रही,दूसरा उनके जीवन और मन में अमिट धब्बा घर कर बैठ चुका।
बेटी की एक नादानी ने उनके उपवन जैसे जीवन को काँटों की सेज बनाकर रख दिया।सचमुच जीवन में जब एक बार धब्बा लग जाता है,तो उसका मिटना दुरुह हो जाता है।
समाप्त।
लेखिका-डाॅक्टर संजु झा।
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