रात के 12:30 बज चुके थे, पर भाग्यवती की आँखों से नींद गायब थी। लेटे-लेटे वह अतीत की यादों में खो गई। उसे वह दिन आज भी भली-भाँति याद है जब उसने तीसरी संतान के रूप में भी बेटे को जन्म दिया था। भाग्यवती और उसका पति धनपत दोनों उस दिन खुशी के मारे फूल-रहते थे। तीसरे बेटे राकेश के जन्म के समय पहला बेटा राजवीर 6 साल का और दूसरा बेटा राजेश 3 साल का था। उस दिन गाँव की सभी औरतें उसे बधाई देने आई थीं। गाँव में हर औरत भाग्यवती के भाग्य की तारीफ़ कर रही थी—“भाग्यवती के तीन-तीन बेटे हैं।” वे बोलीं कि वह तो बेटी की शादी और दहेज़ की सारी चिंताओं से बच गई है; बुढ़ापे में उसकी बहुत सेवा होगी—आख़िर तीन-तीन बेटों की माँ है।
उन दिनों भाग्यवती के चेहरे पर तीन बेटों की माँ होने का गर्व साफ झलकता था। वह अपने परिवार पर खूब इतराती—“मेरे पति पुलिस में हैं, ईमानदारी से कमाते हैं। दूसरों की तरह बेईमानी नहीं करते। फिर भी हमारी इतनी आमदनी है कि हम अपने बेटों को अच्छी शिक्षा दे सकेंगे। हम इन्हें बहुत पढ़ाएँगे—देखना, मेरे बेटे अच्छे-चाहे पदों पर नौकरी करेंगे।”
धनपत और भाग्यवती ने तीनों की छोटी-छोटी ज़रूरतें पूरी कीं। पढ़ाई से जुड़ी हर सुविधा दी। इसके बावजूद राजेश और राजवीर पढ़ाई में कमजोर ही रहे; केवल छोटे बेटे राकेश का मन पढ़ाई में था।
एक बार राजवीर के आठवीं कक्षा के परिणाम आने से पहले भाग्यवती ने बार-बार भगवान से यही प्रार्थना की—“भगवान, बस यह पास हो जाए।” जब राजवीर घर लौटा तो उसका उदास चेहरा देखकर माँ-बाप समझ गए—जो डर था वही हुआ; राजवीर फेल हो गया था।
अगले ही दिन राजवीर के लिए ट्यूशन लगा दिया गया। धनपत कभी-कभी खुद भी पढ़ाते रहे। पर घर वालों की लाख कोशिशों के बावजूद राजवीर का मन पढ़ाई में नहीं लगता था। जो पैसे उसे किताब खरीदने के लिए दिए जाते, वह उन्हीं पैसों से फिल्म देखने चला जाता। एक दिन धनपत को राजवीर की गणित की किताब में फिल्म की टिकट मिली। पिता ने कड़ाई से पूछा और एक थप्पड़ भी लगाया। राजवीर बार-बार यही कहता रहा—“मैं फिल्म देखने नहीं गया, मेरा दोस्त निकेतन स्कूल से भागकर फिल्म देखने गया था, उसने मेरी किताब में टिकट रख दी होगी।” धनपत ने बेटे की बात मान ली, पर राजवीर अब झूठ बोलने लगा और बुरी संगत भी करने लगा।
राजवीर ने बाद में सही राह छोड़ दी—दिन भर मस्ती, ताश, फिल्में; पढ़ाई से मन हट गया। जब राकेश भी 12वीं कक्षा में फेल हो गया और उसी के रास्ते पर चल पड़ा, तो माता-पिता के सपने एक-एक कर चूर हो गए। धनपत परेशान रहने लगा—नौकरी के कुछ वर्ष ही बचे थे और चिंता के बादल गहराने लगे।
एक दिन धनपत ने तीनों बेटों से कहा—“मैंने तुम्हें हर सुविधा दी, तुम्हारी हर ज़रूरत पूरी की। इसके बावजूद तुम तीनों ने मुझे और तुम्हारी माँ को निराशा के अलावा कुछ नहीं दिया। अब तुम लोग कोई काम-धंधा तलाश लो। ऐसे घर पर बैठे-बैठे क्या होगा? मैं और तुम्हारी माँ हमेशा तुम्हारा ध्यान रखने के लिए जिएँगे—नहीं।”
तीनों ने कोशिश की, पर कहीं अच्छी नौकरी नहीं मिली। भाग्यवती और धनपत बहुत दुखी रहे। भाग्यवती ने कहा—“हमें कुछ रास्ता निकालना होगा; महकमे में जुगाड़ करके बच्चों को काम पर लगाना चाहिए।” धनपत ने कहा—“मैंने कभी रिश्वत-खोरी नहीं की; मैं ऐसा नहीं कर सकता।” पर भाग्यवती ने कह दिया—“वे हमारे बेटे हैं, उनकी भलाई के लिए अगर सिद्धांत भी टेढ़े करना पड़े तो करेंगे।”
आखिरकार धनपत ने कुछ लोगों की मदद और रिश्वत के सहारे तीनों बेटों को पुलिस में सिपाही लगवा दिया। जब बेटे की नौकरी लग गई, तो गुजर-बसर की खुशी में मोहल्ले में मिठाई बाँटी गई—धनपत खुश भी हुआ और उदास भी। तीनों बेटों की शादी-व्याह भी बड़े हर्षोल्लास से हुए; घर में बहुएँ आईं और तब सारा घर खुशियों से भर गया। भाग्यवती के पैर जमीन पर टिक नहीं रहे थे—उसने सोच रखा था कि इन बेटों से बुढ़ापे में सेवा मिलेगी।
लेकिन कुछ ही दिनों बाद भाग्यवती का संसार टूट पड़ा—धनपत एक दुर्घटना में चल बसे। जिन बेटों से सेवा की आशा थी, वे पिता की मृत्यु के कुछ ही दिनों बाद अपनी-अपनी बीवियों को लेकर दिल्ली चले गए—उनकी पोस्टिंग वहीं थी। भाग्यवती कई घंटे रोती रही; अब वह अकेलेपन से जूझ रही थी। उसका स्वास्थ्य गिरने लगा। अकेले ही खाना बनाना और घर संभालना भारी लगने लगा। कई बार रात का बासी खाना सुबह खा लिया करती; कभी- कभी सुबह का बचा खाना रात में खा लेती। तबीयत बिगड़े तो कई दिनों तक भूखी रहती। इन दस वर्षों में किसी भी बेटे ने माँ को साथ रखना जरूरी नहीं समझा। कभी-कभी कॉल आ जाती, पर असल स्थिति वही थी—भाग्यवती अकेली थी।
कई बार भाग्यवती ने राजवीर से कहा—“बेटा, मेरा यहाँ मन नहीं लगता, एक-एक दिन मुश्किल से कटता है। कुछ दिन अपने पास बुला लो, तुम लोग तो मुझे भूल ही गए हो।” राजवीर ने कह दिया—“माँ, तुम यहाँ आओगी तो घर कौन संभालेगा? गाँव में ही रहना।” और फोन काट दिया। भाग्यवती के आँसू रुकने का नाम नहीं लेते थे।
एक बार जब भाग्यवती छत पर कपड़े सुखा रही थी, तो पानी से उसका पैर फिसल गया और वह छत से आंगन में गिर पड़ी। चीख सुनकर पड़ोसी दौड़े और उसे शहर के अस्पताल ले गए। गिरने से घुटने के ऊपर की हड्डी टूट गई। डॉक्टर ने इलाज के लिए 20,000 रुपए माँगे। पड़ोसी काका ने फोन कर तीनों बेटों को पुकारा—“बेटा, अपनी माँ को यहाँ से अस्पताल ले जाओ, इसका इलाज कराओ; यहाँ कौन इसकी देखभाल करेगा?” पड़ोसी की विनती पर छोटा बेटा राकेश भाग्यवती को दिल्ली लेकर आया। वहाँ आकर एक हफ्ते तक बेटे और बहू ने उसकी बहुत सेवा की—बहू पहले खाना खिला करती, भाग्यवती के कपड़े धोयी जाती, बालों में तेल लगाया जाता—खुशी-खुशी दिन बीते। 25 दिन गुज़र गए और भाग्यवती को लगा कि ठीक हो रही हूँ।
इसी बीच राजवीर और राजेश ने भी कुछ-चार बार आने-जाने का सिलसिला रखा। पर धीरे-धीरे राकेश ने इलाज नहीं कराया; भाग्यवती अभी भी लकड़ी की सहारे चल पाती। तभी एक शाम जब बेटे से पूछा गया—“अस्पताल कब लेकर जाओगे?”—तब भी कोई ठोस जवाब न मिला। रात में बेटा उसे गोद में उठाता, उसके बाल सहलाता और इतना सारा प्यार देता—फिर भी ठोस इलाज नहीं हुआ। भाग्यवती ने टीवी देखते हुए बेटे से कहा—“बेटा, मैं अब हमेशा तुम्हारे और बहू-बेटे के साथ रहूँगी। इतनी अच्छी परिवार को छोड़कर मैं गाँव अकेली क्यों जाऊँ? मैं अब वापस नहीं जाऊँगी।” इस पर राकेश और उसकी पत्नी अनीता खीजने लगे। अनीता ने कहा—“तुम तो कहती थी कि माँ की इतनी सेवा करो कि वह फिर चलने योग्य हो जाए; और जब वह धीरे-धीरे चलने लगेगी तो उसे वापस गाँव छोड़ आना। पर अब वह मेरी छाती पर मूँग डालना चाहती है—मैं एक दिन भी इसकी सेवा नहीं करूँगी।”
राकेश ने पत्नी को समझाने की कोशिश की—“अगर माँ को वापस नहीं ले आएँगे तो गाँव में हमारी क्या इज्जत रहेगी? राजवीर ने कहा था कि माँ को ले आओ तो मैं बाद में अपने घर पर ले जाऊँगा।” पर जब वे भाग्यवती को लेकर राजवीर के घर पहुंचे, तो राजवीर की पत्नी ने स्पष्ट शब्दों में कह दिया—“यह बुढ़िया मेरे घर में नहीं रहेगी; अगर यह रही तो मैं जहर खा लूँगी।।” भाग्यवती को लगा जैसे किसी ने उसने पर हजार कौंदे मार दिए हों; आँसू उसके गाल से बह निकले। उसने कहा—“राजवीर बेटा, मैं तुम्हें सुखी देखना चाहती हूँ। अगर मेरे यहाँ रहने से तेरे घर की सुख-शांति खतरे में पड़ती है तो मैं नहीं रहूँगी। तुम दोनों खुश रहो।” यह कहकर वह राजवीर के घर से चली आई।
राजेश के घर वह पास ही था—लगभग 50 कदम। राकेश को डर था कि कहीं राजेश या भाभी भी कुछ वैसा कह न दें। राजेश के घर में प्रवेश करते ही राकेश ने कहा—“भैया, हम बाहर कुछ दिन घूमने जा रहे हैं; इसलिए तुम्हें माँ को अपने पास रखना होगा।” राजेश के मन में यह खबर थी कि माँ अब वापस गाँव नहीं जाना चाहती—फिर भी वह मजबूरन माँ को रखने के लिए तैयार हो गया। पर राजेश के परिवार का व्यवहार अच्छा नहीं था—भाग्यवती के यहाँ रहना उन्हें अच्छा नहीं लगा। उनके बताने पर भाग्यवती का पोता अरुण, जो अभी आठ साल का था, अपनी दादी से बात ही नहीं करता था। भाग्यवती को यहाँ हफ्ते में एक बार नहाने दिया जाता; जब नहलाया जाता तो भी उसे अनादर से देखा जाता—जैसे रोज नहा कर दुल्हन बनना उसके लिए कोई आवश्यकता हो। भाग्यवती को बुरा लगने पर वह चुप रह जाती; अपने कपड़े खुद धोती; उसके बर्तन अलग रख दिए गए; उसकी चारपाई घर की बालकनी में रख दी गई। दिल्ली की गर्मी में वह पंखे के बिना सोने को मजबूर थी; सारी रात करवटें बदलती, मच्छरों से परेशान रहती, पसीने से भीग जाती। उसने यह सब अपमान सहते-सहते कई बार भगवान से प्रार्थना की—“हे भगवान, क्या तूने मुझे सिर्फ इतना दुख दिखाने के लिए जिंदा रखा? अब बर्दाश्त नहीं होता, मुझे अपने पास बुला ले।”
जब उसके पोते अरुण के मित्र आते, तो वे कहते—“दादी, तू छत पर जा; तुझे देखकर हमारे दोस्त मेरा मजाक उड़ाएँगे।” भाग्यवती नम आँखों से छत पर चली जाती; घंटों धूप में बैठकर पसीने से तर-तर हो जाती और आँसू बहते रहते थे। भाग्यवती ने कई बार राजेश से कहा कि उसे राकेश के घर छोड़ आएँ—तब राजेश कहता—“वह बस नौटंकी कर रही है; उसके कारण क्या मिला? पहले वह तभी यहाँ आई थी; अब क्यों कह रही है कि उसे यहाँ से हटाओ?” और कहता—“कल ले जाऊँगा, अभी मेरे पास वक्त नहीं।”
एक दिन राजेश अपने घर से राकेश के घर आया। वहाँ राकेश और अनीता दोनों थे। मैन को देखते ही राकेश ने कहा—“अभी तो तुम यहाँ से गए 20 दिन भी पूरे नहीं हुए और तुम इतनी जल्दी यहाँ चली आई? हमने तुम्हारी खूब सेवा की; अब हम और नहीं कर सकते। तुम कितनी स्वार्थी हो—हम सब पर बोझ बन गई हो। हमने सोचा कि थोड़ी चलने लायक हो जाएगी तो गाँव भेज देंगे; पर तुमने हमेशा रहने का निश्चय कर लिया।” भाग्यवती ने निराश आँखों से कहा—“बेटा, मुझे गाँव छोड़ आओ; मैं किसी का बोझ नहीं बनना चाहती। तुमने मेरी देखभाल नहीं करवाई; इस टूटे पैर से ही मैं घसीट लूँगी। तुम और तेरी बीवी ने एक महीना सेवा की और फिर सब छोड़ दिए; मैं तुम्हारा एहसान नहीं मांगती।”
तभी राजवीर आ पहुँचा और बोला—“वह घर तो हमारा भी था, हमने उसे बेच दिया क्योंकि हमें पैसे चाहिए थे। हमें तो वहाँ रहना ही नहीं था—तुम हो मेहमान कुछ दिनों की। अगर हम पर बोझ नहीं बनना चाहती तो कहीं जाकर क्यों नहीं मर जाती?” भाग्यवती का चेहरा रो-रो कर लाल हो गया। तीनों बेटों के होने के बावजूद उसे ऐसा लगा जैसे उसने सब कुछ खो दिया है; वह दुनिया की भीड़ में अकेली रह गई। गाँव की औरतों की बातें बार-बार उसके कानों में गूंजती रहीं—“भाग्यवती की बुढ़ापे में बहुत सेवा होगी; आखिर तीन-तीन बेटे हैं।”
भाग्यवती का दिल टूट चुका था। उसने अपनी इज्जत और अस्तित्व दोनों खोए सी पहचाना। वह सोचती—यही भाग्य है मेरा? वह खुद को कमरे में अकेला पाती और बार-बार पूछती—“क्यों मुझे जिंदा रखा गया?”
समय का पहिया आगे बढ़ा। भाग्यवती की सेवा करने में जितना गुनहगार तय किया गया, उतना कुछ भी नहीं बदला। पर भाग्यवती ने किसी को दोष नहीं दिया। उसने अपने भीतर की पीड़ा को सह कर जीना सीख लिया। वह चुपचाप अपने फर्ज अदा करने लगी; अपने बच्चों के लिए प्रार्थना करती रही—भले ही वे उसे गलत समझें, पर वह फिर भी उनका कल्याण चाहती थी।
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