नालायक या लायक विवाह के लिए दोनों पक्षों की तरफ से हाँ होने के बाद विवेक ने सुगंधा से वादा लिया—
“मेरे माता-पिता को कभी कोई कष्ट न हो। बड़े भैया उनके साथ रहते हैं, इसका मतलब यह नहीं कि हमारे फर्ज पूरे हो गए हैं। जब कभी जिम्मेदारी उठानी पड़ी, तो मैं चाहता हूँ तुम पीछे न हटो। मेरे कदम से कदम मिलाकर चलो और उनके लिए दिल से करो। छोटा भाई बाहर सेट है, मतलब यह है कि जब भी आएगा, मेहमान की तरह आएगा। और हाँ, एक बात और—पिताजी ने अपनी छोटी-सी सरकारी नौकरी में हम तीनों पर बराबर मेहनत की है। यह मेरी लापरवाही रही या किस्मत का दोष, मैं दोनों भाइयों की तरह बहुत आगे नहीं जा पाया। इसलिए कल को तुम्हें किसी तरह की हीन भावना न हो, इसके लिए पहले से ही मैं साफ कर देना चाहता हूँ। शादी करना तो छोटी-सी प्राइवेट नौकरी पर, लेकिन दिल में तुम्हारे लिए भरपूर प्रेम रहेगा।”
सुगंधा पढ़ी-लिखी, होशियार लड़की थी। विवेक के पक्के और नेक इरादों से प्रभावित हो गई। अपनी पारिवारिक स्थिति को देखकर वह हर समझौते के लिए तैयार हो गई। विवाह के बाद कुछ दिन ससुराल में रहकर जल्दी ही पति देव के साथ कमाई की नई दुनिया में आ गई। बेशक कमाई ज्यादा नहीं थी, कई बार महत्वाकांक्षाओं को मारना पड़ता था, लेकिन उसकी छोटी-सी दुनिया में सुख, चैन और प्रेम सब था।
मध्यमवर्गीय परिवार से थी, तो हर परेशानी बचपन से बारीकी से देखती आई थी। बेशक पिताजी ने कमी होते हुए भी हर सुविधा दी, लेकिन आज उनसे विदा होने पर भी कर्मियों का अभाव था। अपने वादे के मुताबिक उसने तकलीफों का कभी रोना नहीं रोया। पति-पत्नी प्रेम से रहते, माता-पिता के पास अक्सर आते-जाते रहते।
वहाँ जाकर बस एक ही बात गलत लगती—बड़े भैया-भाभी को वे तुरंत पक्ष ले लेते। विवेक की उम्मीद सुगंधा से यही रहती कि हर हाल में चुप रहकर सहयोग करे। उसे बुरा भी लगता, तो बस कहकर दो दिन के लिए शांत हो जाता।
एक दिन पता चला कि भैया और भाभी के बीच अनबन से परेशान होकर भैया ने ट्रांसफर बाहर करवा लिया है। श्रवण कुमार विवेक के पास कोई दूसरा हाल न था। वह परिवार सहित माता-पिता के साथ रहने चला आया। सुगंधा भी अपने वादे के मुताबिक तन-मन-धन से सेवा में जुड़ गई।
कुछ दिन बीतने के बाद सास-बहू में विचारभेद शुरू हो गए। सुगंधा विरोध नहीं कर पाती, मन ही मन महसूस करती रह जाती। जिंदगी ढर्रे से चल पड़ी। कहीं कोई बदलाव नहीं। घर में बातें कम और तनाव ज्यादा रहने लगा।
“सब्ज़ी यह क्यों बनाई? अभी कहाँ जा रहे हो?”
विवेक तो पहले रसोई में नहीं झाँकते थे, कभी बाहर का खाना पसंद नहीं करते थे। अब ना जाने कितने बेवजह के प्रश्न।
कहने का मतलब यह कि रोज़ के मनमुटाव विवेक के घर घुसने के बाद सर्दी बनने लगे। बहुत समझाने के बाद भी हाल न निकला तो उसने सुगंधा से ही चुप रहने की याचना की।
“देखो, बुजुर्ग बदलने की उम्मीद करना बेकार है। तुम मेरी धर्मपत्नी हो। मेरी परेशानी समझो और किसी भी तरह समस्या का हल निकालो। तीनों बेटे पिता को छोड़कर कैसे रह सकते हैं? भैया की पोस्टिंग बाहर है और छोटा आउट ऑफ इंडिया है। इनके बुढ़ापे में इन्हें अभी कहीं छोड़कर नहीं जा सकता। इस तरह घर के झमेले में पड़ा रहा तो अच्छी नौकरी भी ढूँढ नहीं पाऊँगा।”
सुगंधा समझ रही थी कि उसे हर हाल में सावधानी से सब बिठाना होगा। उसने हर बात का हल यही निकाला कि बहस करना या अपनी राय रखना ठीक नहीं। चुप रहकर सब करना। वह चुपचाप सब काम करती रहती, अपनी तरफ से सेवा में कोई कमी नहीं करती।
आज पिताजी का एक पुराना मित्र मिलने आया—
“अरे विवेक, तुम कब आए? वहाँ तो सुना था कि तुम्हारी अच्छी नौकरी लग गई थी। क्यों बेटा, नौकरी छोड़ दी?”
“मुझे यकीन था तुम इन्हें अकेला कभी नहीं छोड़ोगे।”
विवेक बोलने ही वाला था कि पिताजी बीच में बोल पड़े—
“बड़े का तबादला बाहर हो गया था, छोटा विदेश में है। एक यही था जो नौकरी छोड़ सकता था। हमने कहा यही रहो। थोड़ा कम भी मिलेगा तो क्या? घर-खर्च तो हम चला ही लेंगे। इस बहाने थोड़ी बचत भी हो जाएगी। वहाँ जितनी कमाई थी, सब खर्च हो जाती।”
विवेक पिता की शक्ल देखता रह गया। उसे लगा था कि पिता उसकी तारीफ करेंगे कि सब छोड़कर, अपनी नौकरी की परवाह न करके वह चला आया। लेकिन पिताजी ने उसकी मजबूरी और त्याग को इतना छोटा कर दिया कि विवेक की कमाई कम है, इसलिए उसे बुला लिया गया।
यह सब सुनकर भी उसके चेहरे पर एक मुस्कुराहट थी—वो मुस्कान, जो उसे खुद पर आ रही थी।
पिताजी की बीमारी के चलते लोग मिलने आते, बेटे-बहू की सेवा देखकर तारीफ़ भी करते। पर असली तृप्ति तो तब मिलती जब माता-पिता उनके त्याग को समझते।
सुगंधा बहुत चुपचाप काम में लगी रहती। समय के साथ जीना सीख गई थी। बहुत-सी बातों को नज़रअंदाज़ कर खुश रहने की कोशिश करती। अब एक बिटिया भी थी, आधा मन उसी में लग जाता।
जहाँ देखो हर समय कुछ न कुछ सुनाया जाता। उसने साथ बैठना कम कर दिया। अपने से ज़्यादा उसे अपने पति का ख्याल आता। एक दिन गुस्से में बोली—
“देखिए, सेवा करना अपनी जगह है। लेकिन जब सामने वाला आपके किए की कद्र न करे, तो वही सेवा बेवकूफ़ी लगती है। जानते हैं आप, मम्मी जी सबसे क्या कहती हैं? लोग हमें बेवकूफ़ समझने लगे हैं।”
विवेक मुस्कुराकर बोला—
“तुम क्या समझती हो, मैं इतना नादान हूँ कि सबका मन पढ़ना नहीं जानता? यह दुनिया और यहाँ के लोग सीधे नहीं होते। तुम सीधी चल रही हो, इसलिए तुम्हें बेवकूफ़ कह रहे हैं। पर जिस दिन तुम यहाँ से चली जाओगी, वही लोग कहेंगे—‘वो तो पराई थी, क्या सेवा करती! जब बेटा ही अपना फर्ज अदा न कर सका…’। इसलिए सुगंधा, किसी की बात को दिल से मत लगाओ। मुझे खुशी है कि तुम मुझे धर्मपत्नी के रूप में मिली हो। और पिताजी… वे बुजुर्ग हैं। ऐसा नहीं है कि मुझसे प्यार नहीं करते। वे मेरी स्थिति देखकर भड़ास निकालते हैं।”
इन्हीं दिनों मौसी सास आई हुई थीं। बहू को देखकर बहुत खुश हुईं—
“कैसे चुपचाप मन से सब काम करती है तेरी बहू! लाखों में एक है। बड़ी बात है दीदी, कुछ भी कहो।”
फिर पूछा—“बड़े का क्या हाल है और छोटा कैसा है?”
पिताजी बीच में बोल पड़े—
“दोनों बहुत होनहार हैं। अच्छी कमाई करते हैं। उन्होंने मेरी मेहनत सफल कर दी। शान से कह सकता हूँ, दोनों लायक हैं। उनके ऊपर पैसा लगाया था, तो आज उन्होंने सर उठाने लायक रखा है।”
मौसी सास ने कहा—
“जीजाजी, लायक तो विवेक है। बड़ा वाला तो बीमारी की हालत में भी आपको छोड़ चला गया। और इसे देखो—अपना सब छोड़कर सेवा में जुटा है।”
पिताजी बोले—
“देखो सालिन साहिबा, सेवा करता है तो उसका मेवा भी मिलता है। दोनों लायक निकल गए। हमने तो इस पर उतनी मेहनत भी नहीं की थी। कुछ बनता तो यह कौन-सा रुकता? शुरू से नालायक था, कभी किसी की नहीं सुनी। आज यहाँ है तो हमारी वजह से है। तो पैसे बचा लेता है। यह न होता तब भी हम समर्थ थे अपनी व्यवस्था करने में।”
सुगंधा सब सुन रही थी। जानती थी—जो अपने ही बच्चे के प्रेम और त्याग को न समझे, वे उसके लिए और क्या कह सकते हैं। उसे विवेक के लिए बहुत तकलीफ हुई। मन तो आया कि अभी के अभी उसे लेकर यहाँ से चली जाए।
मौसी सास फिर बोलीं—
“कुछ भी कहो, ऐसे बच्चे आज के समय में मिलना मुश्किल है। तुम्हारी किस्मत अच्छी है, दीदी।”
फिर उन्होंने सुगंधा से कहा—
“बहू, और तुम्हारी कोई बात होती नहीं दिखी। सब ठीक है न? तुम तो कहीं आती-जाती भी नहीं। तुम्हारे मन की पढ़ाई सिर्फ मैं कर सकती हूँ।”
सुगंधा के मन का गुबार फूट पड़ा—
“आप ही सोचिए, नालायक बेटे की बहू कैसे लायक हो सकती है? नाराज़ बहू नहीं हूँ मैं। पति ने कहा—‘माता-पिता अकेले हैं, तो उनके साथ चलो।’ तो बिना विरोध सब मानती गई। कभी कोई बात पसंद नहीं आई, तो पति से कहा। लायक बेटे ने माता-पिता के सामने मुँह बंद रख, बिना विरोध के चुपचाप रहने को कहा। मैंने वो भी किया। हालात से समझौता कर चुप रहना सीख गई। पर बेटा सब कुछ करने के बाद भी ‘नालायक’ ही रहा। तो मैं कैसे ‘लायक’ हो सकती हूँ? उनके त्याग, सेवा और फर्ज का यही सिला मिला। अगर समय रहते ही समझती तो आज अफसोस यह है कि यह ‘नालायक’ मैं तब दिखाई होती, जब सब कुछ छोड़-छाड़कर यहाँ आने को तैयार हुई थी।”
बहू की बात सुनकर सास-ससुर के चेहरे का रंग उड़ गया। आज से ‘नालायक बहू’ सचमुच ‘नालायक’ हो चुकी थी, क्योंकि वह अपनी अंतरात्मा की आवाज़ को रोक न पाई।
लेकिन फिर भी, वह चुपचाप अपने फर्ज अदा करने में लग गई।
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