भाभियों की गृहस्थी में ननद की भागीदारी

 जैसे - जैसे बढ़ई की आरी चल रही थी चेतना का दिल खून के आंसू रो रहा था . उसने बड़े चाव से कुशन लगे सिरहाने वाला पलंग पसंद किया था , पर ससुराल में आते ही उस पलंग की बखिया उधेड़ दी गयी . ननद श्वेता ने पलंग देखते ही मुंह बिचका दिया , " मम्मी कैसी पसंद है चेतना भाभी की ? ये चार दिन की चांदनी आज तो बड़ी जंच रही है , पर पहला बच्चा होते ही सब सड़ ही जाना है . लोगों के बच्चे शूशू करते हैं इन कुशन पर बैठकर " . सारे लोग ठहाके लगाने लगे और चेतना शर्म से गढ़ गयी . मगर बात वहीं खत्म नहीं हुई , अगले ही दिन बढ़ई बुलवा कर उसकी राय जाने बिना ही अर्चना जी ने छोटी बहू के पलंग पर आरी चलवा दी . रसोई में खड़ी चेतना अपनी भावनाएं दबाये आंसू पोंछ ही रही थी कि बड़ी भाभी अंजलि ने अपना सांत्वना भरा हाथ चेतना के कंधे पर रख दिया . वो तो आज तक यही सब सहती ही आ रही थी , अब चेतना के साथ भी इतिहास दोहराया जाने लगा . रतन विजय और अर्चना विजय की लाड़ली श्वेता सागर और साकेत की भी अतिप्रिय थी . सबसे छोटी भले ही थी पर घर में चलती सिर्फ उसी की थी .

जब अंजलि सागर से ब्याह कर घर में आयी तो श्वेता के तेवर और अंदाज देखकर दंग रह गयी 12 वीं में पढ़ रही श्वेता हर मसले पर बेबाकी से बोला करती थी . अंजलि क्या पहनेगी , कहाँ जायेगी या कब सोयेगी सारे निर्णय श्वेता के ही होते . अर्चना जी तो बस श्वेता की पुछल्ली बनी घूमती रहतीं . शादी के डेढ़ महीने बाद ही जब अंजलि को दिन चढ़ गये थे तो श्वेता ने पूरा घर सिर पर उठा लिया था . " हद कर दी भाभी आपने , कम से कम 6-8 महीने तो इंतजाम से रह लेती . अनपढ़ों की तरह आते ही बच्चा करने की पड़ गयी " , अंजलि तो जैसे सफेद पड़ गयी . 17 18 साल की रही होगी तब श्वेता , सास या ब्याही ननद होती तो भी ठीक था . श्वेता बड़बड़ाती रही और अर्चना जी हंसती रहीं .

रात को जब उसने सागर को सारा वाकया बताया तो उसने हंसी में बात उड़ा दी , " अरे नासमझ है अभी वो , उसकी नादानियां दिल पर मत लिया करो " . अंजलि भी मन मसोसकर रह गयी , श्वेता ऐसे ही ताने मारती रही और 9 महीने बाद नन्हा अंशुमन उसकी गोद में आ गया . खूब बड़ा फंक्शन किया रतन विजय जी ने पोते के नामकरण का . तोहफे भी काफी आये थे , श्वेता ने सारा सामान ड्राइंग रूम में रखवा लिया और खोल - खोल कर देखने लगी . सब कुछ देख लेने के बाद उसने कुछ कपड़े , खिलोने और अन्य तोहफे अंजलि की तरफ बढ़ा दिये और बाकी सामान नौकर से पैक करा कर स्टोर में भिजवाने लगी . साकेत ने उसके सिर पर चपत लगायी और बोला , " ये बाकी का सामान क्या तू इस्तेमाल करेगी ? " श्वेता दादीपने से बोली , " अरे नहीं जब मेरे बच्चे होंगे तो ये सामान उसके काम आयेगा " . अंजलि तो श्वेता को देखती ही रह गयी . अभी कॉलेज जाना शुरू किया ही था कि बच्चे का सामान भी जोड़ लिया . पर वो मुंह से कुछ नहीं बोली , श्वेता ऐसे ही हरकतें करती रहती और अंजलि सोचती कि शादी करके अपने घर चली जायेगी तो शांति मिल जायेगी . पर किस्मत को कुछ और मंजूर था .

श्वेता की शादी शहर के ही रोहन से हुई तो अंजलि ने भी अपनी किस्मत के आगे घुटने टेक दिए .

धीरे - धीरे 10 साल गुजर गये , अंजलि की बेटी सोम्या और श्वेता के जुड़वा बच्चे भी हो गये . श्वेता डिलीवरी के बाद अस्पताल से सीधे अर्चना जी के पास ही आयी क्योंकि सास से तो वो 4 दिन भी नहीं निभा सकी थी . 7 महीने की सोम्या और 5 साल के अंशुमन के साथ कैसे अंजलि ने श्वेता के बच्चों का भी काम किया वो भी नहीं जानती . शायद भगवान ने ही उसमें कोई शक्ति भर दी थी . पर उसकी कद्र किसी ने नहीं की . आज भी घर में श्वेता का ही राज चलता था . वो जब चाहे अंजलि को जलील कर देती थी . हर किसी के आगे गाती फिरती कि मेरे बच्चे तो मम्मी ने ही पाल दिये और किसी की तो मुझे जरूरत भी नहीं पड़ी . अभी साकेत की शादी में भी वो सिर्फ काम संभालती रह गयी और सारा लेनदेन वगैरह अर्चना जी ने श्वेता के ही जिम्मे रखा . अंजलि चेतना का दर्द बहुत अच्छे से समझ पा रही थी , पर उसने आज तक अपने लिए मुंह नहीं खोला था चेतना को तो वो क्या ही सहारा देती

शादी को दो साल होने आ गये और चेतना की ओर से कोई खुशखबरी नहीं आयी तो आदतन श्वेता ने ताने मारने शुरू कर दिये , " अरे अब क्या हनीमून ही मनाती रहोगी भाभी . भइया की उम्र का तो लिहाज करो " . चेतना खून का चूंट पीकर रह गयी . अंजलि ने चेतना को तसल्ली दी और श्वेता के लिए नाश्ते - पानी का इंतजाम करने लगी . ईश्वर के आशीर्वाद से दो महीने बाद ही चेतना के पैर भारी हो गये . साकेत ने खुशी से झूमते हुए श्वेता को खबर दी तो श्वेता ने साकेत को भी नहीं बख्शा , " बधाई हो भइया , बालों में डाई लगाने के दिनों में ही सही बाप तो बन ही गये " . साकेत को श्वेता का व्यवहार बहुत अखर गया . दरअसल साकेत की लव मैरिज थी , विजातीय चेतना से शादी के लिए दोनों के घर वालों को मनाते उनकी उम्र थोड़ी ज्यादा ही निकल गयी थी . साकेत ने खिसिया कर फोन रख दिया और चेतना के मनपसंद गोलगप्पे लेने चला गया . होली तक तो सब बढ़िया रहा , पर होली निकलते ही भारत में भी कोरोना का खतरा मंडराने लगा और सरकार ने लॉक डाउन घोषित कर दिया .

एक महीना तो हंसते - खेलते गुजर गया पर लगातार अनियमित दिनचर्या और गलत खानपान से रतन विजय बीमार पड़ गये . 2-4 दिन तो अपने शहर में ही इलाज हुआ लेकिन एक रात पैरालाइसिस के अटैक ने रतन विजय को कोमा में पहुंचा दिया . सागर और साकेत ने बड़ी मुश्किल से दिल्ली जाने का इंतजाम किया . लॉक डाउन के चलते वहाँ भी बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ा . लंबे इलाज के बाद रतन विजय जी ठीक होने लगे . उन्हें घर वापस लाया गया और वहीं उनकी फीजियोथैरेपी और अन्य इलाज शुरू हो गये . धीरे - धीरे जीवन सामान्य हुआ तो लेकिन घर की आर्थिक स्थिति थोड़ी डांवाडोल हो गयी . व्यापार तो अनलॉक के बाद भी मंदा ही था और पापा का इलाज बहुत मंहगा पड़ रहा था . अंजलि और चेतना ने अर्चना जी को बिना बताये अपने कुछ गहने भी सागर साकेत को सोंप दिये थे . कुल मिलाकर कर चारों कंधे से कंधा मिलाकर गृहस्थी को साधे हुए । थे .

दो महीने में चेतना की डिलीवरी भी होने को थी . अचानक घर का फ्रिज़ खराब हो गया तो ये आकस्मिक खर्चा सभी को अखर गया . मैकेनिक को बुलवाया तो वो भी जवाब दे गया कि अब आपको फ्रिज़ बदलना ही पड़ेगा . काफी मशक्कत से घर का खर्च चल रहा था , नया फ्रिज खरीदना एकदम से संभव नहीं हो पा रहा था . सागर की बड़ी बुआ अपने भाई को देखने आयीं तो उनके सामने जिक्र चल पड़ा . उन्होंने नया फ्रिज़ अभी खरीदा था और अपना पुराना निकालना चाह रही थीं . सागर साकेत ने थोड़ा हिचकते हुए बुआ से वो फ्रिज़ खरीदने की इच्छा व्यक्त की तो वो सहर्ष तैयार हो गयीं . उन्होंने उसके रुपये भी बड़ी नानुकुर के बाद लिए . बुआ ने ट्रांसपोर्ट से फ्रिज़ भेज दिया और काम वापस पटरी पर आ गया .

साप्ताहिक अवकाश के दिन जब श्वेता अपने पति और बच्चों के साथ पापा को देखने पहुंची तो फ्रिज़ देखते ही उसकी भ्रकुटियां तन गयीं . वो दनदनाती हुई सागर के पास जा पहुंची और हाथ फैलाकर बोली , " भाई 1,20,000 / - रुपये चाहिए अभी के अभी " . सागर तो पसीने - पसीने हो गया . आज तक बहन को किसी चीज के लिए मना नहीं किया था . इतनी बड़ी रकम आज के समय में तो मुश्किल ही निकल पायेगी . चेतना की डिलीवरी में भी काफी खर्चा आयेगा सो दोनों भाई डिलीवरी का पैसा अलग बचाकर चल रहे हैं . अपनी लाचारी कपाता हुआ सागर बोला " गडिया दतने पैसे तो क्यों चाहिए ? मेरे पास अभी इतना इंतजाम नहीं हो सकेगा . अगर दस बीस हजार से काम चल जाये तो मैं कोशिश कर सकता हूँ " . " मुझे पैसे की कोई जरूरत नहीं है बस ये कबाड़ा घर से हटाकर यहाँ मल्टी डोर फ्रिज़ लाकर रखना है . मैं पहले ही मॉडल पसंद कर चुकी हूँ , बस पेमैंट करके उठवाना है " , श्वेता आंखें मटकाती हुई बोली . सागर ने चैन की सांस ली और बेफिक्र होकर बोला , " अरे गुड़िया अभी तो ये वाला लगा ही लिया है , एक आध साल में देखेंगे नये फ्रिज़ का . तू परेशान मत हो " . श्वेता की तो आवाज़ तेज ही होती जा रही थी , " क्यों एक आध साल में क्यों , इस कबाड़े को आज ही बाहर फेंको . मम्मी आपने ऐसा होने कैसे दिया ? आपको अच्छे से पता है कि मेरा वो वाला फ्रिज़ लेने का कितना मन था " . अब साकेत से रहा नहीं गया , " अगर तेरा इतना मन है तो अपने घर के लिए खरीद ले , हमारा अभी इतना मंहगा लेने का कोई प्रोग्राम नहीं है .

" " ये घर भी तो मेरा ही है . तुम तो रहने ही दो साकेत भइया , भाभी के चमचे " , श्वेता ने साकेत को झिड़की दी . सागर का सब्र भी जवाब देने लगा , " गुड़िया ये तू कैसे बोल रही है ? साकेत भी तेरा बड़ा भाई है . जब मैं तुझे बराबर इशारा दे रहा हूँ कि अभी हमारी आर्थिक स्थिति बिगड़ी हुई है , पापा की बीमारी , लॉक डाउन का व्यापार पर असर और फिर चेतना की डिलीवरी भी सिर पर है . तू कोई छोटी बच्ची तो नहीं जो हमारी परिस्थिति समझ नहीं पा रही है " . " ये परिस्थिति का नाटक मेरे आगे मत खेलना भइया . कल ही तुम दोनों जवाहर ज्वैलर्स पर अपनी बीवियों की शॉपिंग कर रहे थे , मैंने खुद देखा था . मेरे पापा मम्मी को उल्लू बनाकर कैसे अपनी तिजोरियां भर रहे हो ना दोनों मैं सब जानती हूँ " , श्वेता तो सरासर बदतमीजी पर उतर आयी .

अंजलि से पति की बेज्जती बर्दाश्त नहीं हुई और वो श्वेता को समझाने के लिहाज से बोली , " श्वेता तुम्हें कोई गलतफहमी हुई .... " . श्वेता ने अंजलि का हाथ कसकर पकड़ लिया और आंखें तरेरती हुई बोली , " तुम इस घर के मामलों से दूर ही रहो तो अच्छा है समझी . ये भोलेभाले होने का नाटक अपने पति को दिखाना मेरे सामने तुम्हारी दाल नहीं गलेगी " . " सटाक " एक पल को ड्राइंग रूम में सन्नाटा छा गया . श्वेता अपना गाल पकड़े खड़ी रह गयी और अर्चना जी अपना सिर . सागर दहाड़ता हुआ बोला , " ये थप्पड़ इस बात का एहसास दिलाने के लिए है कि अंजलि और चेतना इस घर की बहुएं हैं और इस घर के हर मसले पर बोलने का हक तुमसे ज्यादा रखती हैं . ये तुम्हारी भाभियों की गृहस्थी है जिसमें तुम्हारी भागीदारी अति को पार कर चुकी है .

रोहन जी आज जो कुछ हुआ उसके लिए माफी चाहूंगा पर उम्मीद है कि अगली बार जब ये इस घर में आयेगी तो घर की बेटी की तरह आयेगी , मालकिन की तरह नहीं . अगर तुमने वक्त रहते अपनी सीमा समझी होती तो आज इस तरह जलील नहीं होना पड़ता .रोहन श्वेता और बच्चों को लेकर चले गये और घर के सभी सदस्य अपने कामों में व्यस्त हो गये . बस अर्चना जी ही अपनी गलती पर पछताती रह गयीं , "

अगर उन्होंने समय रहते श्वेता को सही सीख दी होती तो आज उसकी इतनी बेज्जती नहीं हुई होती . उनकी शह में ही श्वेता बेलगाम होकर भाभियों की गृहस्थी में हस्तक्षेप करती रही और अंत में मुंह की खाकर लौट गयी .


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