शिखा एक संयुक्त परिवार की छोटी बहू है जिसमें सास- ससुर, जेठ -जेठानी और वो पति-पत्नी हैं।
शिखा का कोई भाई नहीं है। वे दो बहनें ही हैं। वहाँ भी वह छोटी और दीदी बड़ी हैं।
शादी के समय तो सासु माँ ने यह कहकर सबको खुश कर दिया कि बहने हैं तो क्या हुआ? दामाद कौनसे बेटों से कम है? और
भाई बनना पडे तब भाई भी बन जाएंगे।
दरअसल, वे झूठ नहीं बोल रही थी। शिखा और उसके मायके वाले ही उनका मतलब नहीं समझे थे।
उन्हें पता था कि चाहे भाई बने या बहन।मेरा बेटा तो छोटा होने के कारण फायदे में ही रहेगा।
लेकिन, उनकी इस बात ने दोनों बहनों के दिमाग में एक अलग ही आइडिया दे दिया था।
वैसे भी, दीदीया हमेशा माँ और बड़ा भाई दोनों बन जाती हैं।
शिखा की दीदी भी एसी ही है।चाहे शादी के पहले हो या बाद में, हमेशा अपने बड़े होने का कर्तव्य बखुबी निभाया है।
अब तक मम्मी पापा भी थे।इसलिए, कहीं कोई कमीं नहीं थी। चार पांच साल पहले कुछ कुछ दिनों के अन्तर पर दोनो चल बसे। उन्होंने अपना सबकुछ बेटियों को ही दे दिया है।
इसमें भी दीदी ही मम्मी-पापा का ज्यादा ध्यान रखती थी।
शिखा के ससुराल वाले भी हिस्सा लेकर तो बहुत खुश हुए थे। लेकिन, जब मम्मी-पापा के लिए कुछ करने की बात आती या जब भी लगता कि मायके जायेगी, तो सब अचानक बिमार हो जाते और ज्यादा कोशिश करने पर गैरजिम्मेदार और मायका न छूटने के ताने देते ।
एसे में वह मदद नहीं कर पाई। लेकिन, दीदी ने इसे भी संभाल लिया।
इस बार दीदी के घर फंक्शन है और हर जगह की तरह मायरा भी बनता है।
मम्मी पापा होते तो कोई बात नहीं थी।
दीदी भले ही कुछ ना कहे। रहती तो वे भी ससुराल में ही हैं। और एसे तानों से भला कौन बच पाया है?
इसलिए, शिखा ने ही समीर से बात की और इस बार दीदी के लिए मायरा ले जाने का निर्णय लिया।
पहले तो समीर भी बड़े -छोटे और उचित- अनुचित का फर्क़ बताने लगे। लेकिन, जब उन्हें भाई की तरह लिया गया हिस्सा याद दिलाया गया तो समझ गए। फिर भी, पुत्र प्रकृति मम्मी-पापा को कन्वीन्स नहीं कर पाई।
पिछले पंद्रह दिन से ताने दे रही हैं मम्मी जी। लेकिन, उसने समीर पर छोड़ रखा था।
वैसे भी, एसी बातें बेटे समझाएं तो बात शांति पूर्वक समझ जाते हैं लोग।
लेकिन, समीर तो हाँ, हूँ और ठीक है !से आगे बढ़ ही नहीं पाते।
आज तो उसने भी शिखा पर ही छोड़ दिया।
शिखा आ ही रही थी कमरे में। इसलिए सुन चुकी थी।
हाँ, कहिए क्या बात है? उसने ही शुरुआत कर दी।
मम्मी कह रही है कि मायरा देने की क्या जरुरत है? दीदी बड़ी हैं। उल्टा ,वे पाप में पड़ेगी। मम्मी की ओर देखते हुए बोला समीर।
पाप! य़ह अच्छा बहाना है ना हर चीज़ से बचने का?
लेकिन, मेरी समझ में य़ह नहीं आता कि यह पाप बडों को, खासकर बहू के मायके वालों को ही क्यों लगता है?
य़ह पाप उन लोगो को क्यों नहीं लगता जो कन्या का दान लेते हैं। फिर ,भी उन्हीं को नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं जिनसे दान लेते हैं? य़ह पाप उन लोगो को क्यों नहीं लगता जो दान के नाम पर सबकुछ मांग कर ले लेते हैं और देने वाले को कंगाल, ग़रीब और पता नहीं क्या क्या कहते हैं? गुस्से से बोली शिखा।
मै एसा नहीं कह रही। तुम भाई होती तो अलग बात थी। बहन हो ,वह भी छोटी। अब परंपरा तो परंपरा है। इसलिए.... सासु मां बोलीं।
परम्परा तो यह भी है कि सास ससुर की सम्पत्ति मिले तो उनका ध्यान भी रखा जाता है।
परम्परा तो देने वाले के आगे झुकने की भी है।
रामायण देखी थी? राजा दशरथ इसलिए जनक को झुक कर प्रणाम कर रहे थे। क्योंकि, वे उनसे अपने पुत्रों के लिए कन्या दान ले रहे थे। आपने कभी निभाई य़ह परंपरा?
सासु माँ की ओर देखकर बोली शिखा।
बहन की बात में माँ बाप कहाँ से आ गए? मैंने कहा तो है तुम्हें, जरूरत के समय पीछे नहीं रहूंगा ।समीर ने समझाया।
वह जरूरत कब आएगी समीर? उनके जीते जी कभी आई नहीं।
समझो तो यह भी एक ज़रूरत का ही समय है।
अगर ,उन्होंने अपने दोनों दामादो को बेटे का दर्जा दिया है ।तो कर्तव्य एक का ही क्यों?
मेरी बहन तो भाई बनकर मेरे मायरे भरती है। लेकिन, उसका क्या? उसका भाई कौन बनेगा?वह मेरा मायका है।लेकिन, उसका मायका कहाँ है?
क्या बड़ी होना उसकी गलती है?
नियमानुसार तो पापा ने दोनों को बराबर दर्जा दिया है। तो मैं क्यों अपने कर्तव्य से पीछे हटू?
आप को नही पसंद तो कोई बात नहीं।मेरे पापा ने मुझे इस लायक बनाया है कि अपने फैसले पर खुद अमल कर सकूं ।
चाह्ती तो यह काम चुपचाप कर देती और आपको पता भी नहीं चलता। लेकिन, मैने सोचा। बता देती हूँ। मेरे अपने ही हैं।
चलो,कोई बात नहीं। कल बाज़ार जाउंगी खरिददारी के लिए। चाहो तो चल सकते हो। कहकर चली गई शिखा और मांग कर ली हुई बेइज्जती का स्वाद फैल गया था सबके मुह में।
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